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बेरोजगारी के आंकड़ों का सवाल केंद्र सरकार के लिए परेशानी का सबब

मोदी सरकार कोई भी विश्वसनीय आंकड़ा नौकरियों के संदर्भ में समिति के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया है.

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Faisal Anurag

रोजगार के सवाल पर केंद्र सरकार के लिए मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति   मुसीबत कर बायस बन गयी है. संसदीय समिति ने रोजगार के सवाल पर रिपोर्ट को अंतिम रूप दे दिया है. इस रिपोर्ट को संसद में पेश किया जाना है. मोदी सरकार संसदीय समिति के सवालों का ठीक से जबाव नहीं दे पायी है. मोदी सरकार कोई भी विश्वसनीय आंकड़ा नौकरियों के संदर्भ में समिति के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया है. समिति परंपरागत सर्वेक्षण के तरीकों को सही मानती है.  जीडीपी के संदर्भ में भी सरकार और प्राक्कलन समिति के मतभेद की चर्चा आम रही है. भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के नेता मुरली मनोहर जोशी इस कमेटी के अध्यक्ष हैं. द वायर में इस बाबत स्वाति चतुर्वेदी ने तथ्योघाटन किया है.

जल्द ही संसद में पेश की जाने वाली कमेटी की रिपोर्ट लोकसभा चुनाव के ठीक पहले मोदी सरकार के लिए राजनीतिक परेशानी खड़ा कर सकती है. प्रधानमंत्री के उन दावों को इस रिपोर्ट से चुनौती मिलेगी, जिसमें मोदी ने रोजगार के क्षेत्र में अपनी सरकार की उपलब्ध्यिों को प्रस्तुत किया है. भारत में किसान और रोजगार के सवाल अन्य किसी भी सवाल की तुलना में लगातार जोर पकड़ते जा रहे हैं. रोजगार नहीं मिलने के कारण युवाओं में गहरी निराशा भी है. सवर्णों को दस फीसद आरक्षण दे कर मोदी सरकार ने सवर्ण युवाओं की नाराजगी को दूर करने का जो कदम उठाया है, उसमें जोशी कमेटी की रिपोर्ट भाजपा की आकांक्षा को प्रभावित कर सकता है. केवल 2018 में ही एक करोड़ 10 लाख लोगों को नौकरियों से निकाले जाने की बात चुनावी माहौल में सरकार के लिए संकट का कारण बना हुआ है. कमेटी की रिपोर्ट के संदर्भ में जो बातें छनकर बाहर आ रही हैं, उसमें सरकार पर आकड़ों को छुपाने और उससे खुलवाड़ करने की बात भी की जा रही है. रिपोर्ट में जो चर्चा हुई है, उसमें सरकार के आंकड़ों और सदस्यों की बातों में कोई मेल नहीं है.

समिति के भाजपा सदस्यों ने भी जो सवाल उठाये हैं उससे सरकार की किरकिरी ही हो रही है. सरकार नौकरियों की संख्या में बढ़ाने की बात करती रही है. समिति में इसपर गंभीर चर्चा हुयी है. समिति में अधिकांश सदस्य सरकार के दावे को सही नहीं मानते हैं. समिति के सदस्यों का कहना है कि सरकार के आंकड़े और समिति के पास जो आंकड़ें हैं, उसमें मेल नहीं है. मोदी सरकार के मंत्रियों ने पिछले दिनों दावा किया है कि मुद्रा लोन की बढ़ती संख्या और इपीएफओ में हुए पंजीकरण के आंकड़े बताते हैं कि सरकार ने बड़ी संख्या में रोजगार प्रदान किया है. लेकिन राष्ट्रीय नमूना मोदी सरकार ने एनएसएसओ के आंकड़ों को सार्वजनिक किया ही नहीं हैं. 2011-12 में उसके आंकड़े आखिरी बार सार्वजनिक किए गए थे. हर पांच साल पर इसके आंकड़े देश की आर्थिक गतिविधियों की वास्तविकता को उजागर करते रहे हैं.

2018 में सरकार को इसके आंकड़े सार्वजनिक होने चाहिए थे, जिसे सरकार ने अब तक जारी नहीं किया है. मोदी सरकार पर आंकड़ों के हेराफेरी करने और छुपाने का आरोप अनेक अर्थशास्त्री समय समय पर लगाते रहे है. आर्थिक जानकार केंद्र सरकार के जीडीपी संबंधी आंकड़ों की वास्तविकता पर भी सवाल उठाते रहे हैं. इस संदर्भ में आधार वर्ष में किए गए बदलाव को लेकर अर्थशास्त्रियों में तीखा मतभेद है और दुनिया के स्तर पर नए जीडीपी आंकडों की वास्तविकता को लेकर संशय प्रकट किया जाता रहा है. हालांकि भारत सरकार का वित्त मंत्रालय जीडीपी संबंधी नए आधार वर्ष को तर्कसंगत ठहराने की पुरजोर कोशिश करता है. लेकिन इस आधार वर्ष से असहमत अर्थशास्त्री कहते  रहे हैं कि इन आंकड़ों और रोजगार की वास्तविक जमीनी हालात के बीच कोई तालमेल नहीं है. ससंदीय समिति के रिपोर्ट भी इसकी ही पुष्टी करते नजर आ रहे हैं. 2016-17 में श्रम ब्यूरो ने जो अंतरिम रिपोर्ट जारी की थी, वह भी तस्दीक करती है कि पिछले चार साल में रोजगार के क्षेत्र संकुचित हुए हैं. हालांकि भारत सरकार ने श्रम ब्यूरो की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन रिपोर्ट के अनेक अंश सार्वजनिक क्षेत्र में लीक हुए हैं, और वो ही बता रहे हैं कि बेरोजागारी बेहद गंभीर स्थिती में है और उसमें लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है. भारत सरकार ने श्रम ब्यूरो के सर्वेक्षण की प्रक्रिया को ही अब बंद कर दिया है. इसे लेकर भी अनेक सवाल उठे हैं. कहा जा रहा है कि भारत सरकार सर्वेक्षण के तमाम तरीकों पर अंकुश लगा रही है. खासकर उनपर जो देश की आर्थिक हालत की वास्तविकता को उजागर करते हैं. एनएसएसओ और श्रम ब्यूरो के संदर्भ में केंद्र के रूख इसकी पुष्टि ही करते हैं. अब भारत सरकार के लिए मुरली मनोहर जोशी ही संकट पैदा कर रहे हैं, जिन्होंने नरेंद्र मोदी के लिए वाराणसी की लोकसभा सीट को खाली कर इलाहाबाद से चुनाव लड़ने का फैसला किया था.

मोदी सरकार पर अनेक लोग आंकड़े उपलब्ध नहीं कराने की बात करते रहे हैं. दूसरी ओर मोदी सरकार कहती रही है कि रोजगार के संदर्भ में उसके पास 2012 के एनएसएसओ के ही आंकड़े हैं. समिति के रूझान को देखते हुए भाजपा और मोदी सरकार रिपोर्ट आने के बाद होने वाले नुकसान का सामना करने की रणनीति बनाने में लगी हुई है. सूत्रों का दावा है कि जोशी ने भाजपा के ही तीन सासदों का वह पत्र कमेटी की रिपोर्ट का हिस्सा बनाया है, जो सरकारी दावे को चुनौती देते हुए उसके दावे में की गयी गलतबयानी पर केंद्रित है. बेरोजगारी के सवाल को विपक्ष ने अपने चुनावी एजेंडा  का केंद्र बना रखा है. राहुल गांधी लगातार इस सवाल को उठा रहे हैं. कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल मानते हैं कि अगले चुनाव में किसानों और बेरोजगारी का सवाल महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

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