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गांवों का गणराज्य क्यों नहीं…!

झारखंड में ‘ग्राम गणराज्य’ की पुरातन व्यवस्था के बरक्श गणतंत्र की अवधारणा को समझिए

SUDHIR PAL

पता है कि समय का पहिया जो एक बार आगे बढ़ गया है, फिर उसका पीछे लौटना नामुमकिन है. चाहकर भी हमारे हाथों में कुछ नहीं आता है. फिर भी संकट की घड़ी में अपने अतीत,अपनी जड़ों को टटोलना जरूरी है. संकट की घड़ी आत्म-मंथन की घड़ी है. सही आत्म-मंथन अपने अतीत और वर्तमान को नंगी आंखों से देखने का साहस देता है. हमारा गणतंत्र आज संकट के जिस भयावह दौर से गुजर रहा है, वहां स्मृतियों की दुनिया को देखना, परखना और अतीत के फैसलों मूल्यांकन जरूरी है.

संविधान सभा के सदस्यों को संबोधित करते हुए जवाहर लाल नेहरु ने कहा था कि इस सभा का पहला दायित्व भारत को संविधान प्रदान करके स्वतंत्र घोषित करना है. भूखी जनता के लिए भोजन तथा कपड़ों का प्रबंध करना और भारत के प्रत्येक व्यक्ति को अधिकतम अवसर मुहैया कराना है ताकि वह अपनी क्षमता के अनुसार भरसक विकास कर सके.

संविधान सभा के सामने यह दायित्व था कि वह ऐसा संविधान तैयार करे जो सामाजिक क्रान्ति के अंतिम लक्ष्य और राष्ट्रीय जन-जागरण के उद्देश्य को पूरा कर सके. इस सामाजिक क्रान्ति को आगे बढ़ाने या कम से कम इसकी गुंजाइश रखने के लिए राजनीतिक संस्थाओं का रूप किस तरह का होना चाहिए था.

सभा के सामने एक विकल्प था, गांव और उसकी पंचायत व्यवस्था पर आधारित संविधान और उस पर खड़ी ‘गांधीवादी’किस्म की अप्रत्यक्ष विकेन्द्रित सरकार की व्यवस्था. गांधी की दृष्टि में गांव सामाजिक संगठन की इकाई की तरह थे, जिसमे पंचायत सरकार का तथा ग्रामोद्योग उपभोक्ताओं की जरूरतों तथा खेत-खलिहान और खाध्य आपूर्ति का दायित्व संभाल सकते थे. उन्हें अगता था कि इस आधार पर एक ऐसे राज्य और वर्गहीन समाज की रचना की जा सकती थी जिसमें प्रधान मंत्रियों या सरकार की कोई जरूरत ही नहीं रहेगी.

गांधीवादी संविधान का मसौदा

गांधी के एक शिष्य श्रीमन नारायण अग्रवाल ने स्वतंत्र भारत के लिए एक गांधीवादी संविधान-‘A Gandhian constitution For Free India’ का मसौदा तैयार किया. अग्रवाल द्वारा रचित संविधान के इस मसौदे में ग्राम पंचायत को राजनीति की बुनियादी इकाई के रूप में रखा गया था. इसके सदस्यों के निर्वाचन का अधिकार गांव के व्यस्कजनों को दिया गया था. चौकीदार, पटवारी,पुलिस तथा स्कूलों को पंचायत के अधिकार क्षेत्र में रखा गया था. भू-राजस्व के आकलन और संग्रह, सहकारी खेती के निरीक्षण, सिचाईं तथा ऋण की दरों तथा खादी व अन्य ग्राम उद्योगों का अधिकार भी पंचायत के ही पास था.

ग्राम पंचायत के ऊपर अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित निकायों की एक पदानुक्रमिक व्यवस्था बनाई गयी थी जिसमें पहले स्थान पर तालुक (प्रखंड) और जिला पंचायतों को रखा गया था. क्रम के अनुसार इनसे निचली पंचायतों के सरपंच इनके पदेन सदस्य होते थे. तालुक और जिला पंचायतों की भूमिका परामर्श देने तक सीमित थी. इस प्रस्ताव के अनुसार जिला और म्युनिसिपल पंचायतों के सदस्यों को प्रांतीय पंचायत द्वारा चुना जाना था. अखिल भारतीय पंचायत का गठन प्रांतीय अध्यक्षों द्वारा किया जाना था. राज्य और सरकार की जिम्मेदारी इसी अखिल भारतीय पंचायत के अध्यक्ष को दी गयी. इसका स्वरुप मंत्री पद जैसा था. प्रांतीय पंचायतों को परिवहन, सिचाईं,प्राकृतिक संसाधन तथा सहकारी बैंकों का दायित्व सौंपा गया जबकि राष्ट्रीय पंचायत को प्रतिरक्षा, मुद्रा, कस्टम, राष्ट्रीय उद्योगों को चलाने तथा प्रान्तों की आर्थिक विकास योजनाओं के समन्वय की जिम्मेदारी दी गयी. गांधी की मान्यता रही है कि अच्छा शासन देने वाला राज्य वही होता है जो सबसे कम हस्तक्षेप करता है,इसलिए सरकार का आकार न्यूनतम रखा जाय और विकेंद्रीकरण को उसका अनिवार्य लक्ष्य बनाया जाए.

संविधान सभा के सदस्यों के सामने गांधीवादी संविधान के विकल्प के तौर पर यूरोपीय तथा अमेरिकी परम्परा का संविधान था. और वह एक ऐसी संवैधानिक परम्परा से आता था जिसके आदर्श पूरी तरह अलग प्रकार के थे. यूरो-अमेरिकी संविधानों में सीधे निर्वाचित सरकार की व्यवस्था की गयी थी. सभा के सदस्यों को निर्णय करना था कि भारतीय समाज की संरचना को बुनियादी तौर पर बदलने के लिए जिस सामाजिक क्रान्ति की जरूरत थी वह पारम्पारिक संस्थाओं के रास्ते आएगी या उसके लिए गैर-पारम्परिक संस्थाओं का विकल्प चुना जाएगा.

कैबिनेट मिशन यह मानकर चला था कि भारत अपने संविधान के लिए 1935 के भारत अधिनियम से प्रेरणा लेगा परन्तु उसमें इस बात की गुंजाईश भी रखी गयी थी कि अगर विशेषज्ञ समिति चाहे तो वह संविधान सभा को अप्रत्यक्ष और पंचायत सरकार की व्यवस्था करने का सुझाव भी दे सके.लेकिन समिति ने संसदीय सरकार की संस्थाओं पर विचार किया और अनुशंसा की कि संविधान को एक ढीला-ढाला संघ होना चाहिए.

गांवों का गणराज्य इसलिए जरूरी है

संविधान के मसौदे में गांव नहीं था. राजेन्द्र प्रसाद ने लिखा था-‘संविधान को गांव से शुरू करके केन्द्र तक पहुंचना चाहिए, इस देश में आज तक गांव ही बुनियादी इकाई रहे हैं और आगे भी रहेंगे. लेकिन बावजूद इसके पंचायतों को अप्रत्यक्ष सरकार की व्यवस्था का आधार बनाने पर सहमति नहीं बनी. पंचायत का समर्थन करने के बावजूद लोगों का संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों में दृढ़ विश्वास था. बड़ी मुश्किल से पंचायतों को नीति-निर्देशक तत्व के तौर पर स्वीकार किया गया.

लेकिन 70  सालों बाद भी यदि 60 फीसदी से ज्यादा लोगों के आंसू नहीं पोछें जा सके हैं और व्यवस्था के प्रति लोगों का भरोसा टूटा है तो कम से कम विकल्प पर चर्चा तो की ही जानी चाहिए. फिर लोगों से व्यवस्था होगी या व्यवस्था से लोग होंगे. आज भी गांव में बसर करने वालों की संख्या शहरों की तुलना में तिगुना है. आर्थिक  तौर पर संवृद्ध होने का संकेतक जी डी पी में कृषि का योगदान 17 से 18 प्रतिशत है. आज भी सबसे ज्यादा रोजगार कृषि क्षेत्र में ही हैं. कृषि में लगभग 53 फीसदी लोग काम करते हैं. 2019-20 के करेंट प्राइस के आधार पर कृषि का जीडीपी में योगदान 3, 257, 443 करोड़ का है. लेकिन हमारी राजनीतिक और प्रशासनिक ढाँचे का स्वरूप कुछ ऐसा है कि संसाधनों का बड़ा हिस्सा शहरी और सशक्त लोगों के पास ही सिमट जाता है.

झारखंड के ‘गांव गणराज्य’ को समझिए

क्या गांवों का गणराज्य वाकई असंभव था? खूंटी जिले के कुछ ग्राम प्रधानों के साथ उनकी स्वशासी व्यवस्था को समझने का मौका मिला. ईमानदारी से देखें तो इनकी व्यवस्था में विधायिका है, कार्यपालिका है और न्यायपालिका भी. देश के ज्यादातर हिस्सों में समाज के कामकाज के लिए कोई ना कोई व्यवस्थागत ढांचा सदियों से रहा है. झारखण्ड के आदिवासी इलाकों में स‌माज को संगठित और सुचारू रूप से चलाने के लिये इनकी अपनी पारम्परिक सामाजिक स्वशासन व्यवस्था थी. इसी शासन व्यवस्था के द्वारा वे अपने स‌माज में घटित सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक सांस्कृतिक और आपराधिक मामलों का निपटारा करते हैं.

ग्राम प्रधानों ने बताया कि मुंडा गांव  का प्रधान होता है. गांव की शासन व्यवस्था में इनकी प्रमुख भूमिका होती है. यह बाहरी कार्यों या मामलों में गांव का प्रतिनिधित्व करता है. गांव के प्रशासनिक , न्यायिक तथा सामजिक कार्यों का दायित्व लेता है. गांव की बैठकी की अध्यक्षता करता है. गांव की मालगुजारी (कर) वसूलता है और कर्मचारी के माध्यम से अंचल कार्यालय में जमा करता है. आजादी से पहले यह अंचल कार्यालय के बदले अपने क्षेत्र के पड़हा राजा/मानकी को और पड़हाराजा/मानकी ठाकुर के माध्यम से महाराजा को देता था.

पाहन, मुंडा का स‌हायक होता है. मुंडा की अनुपस्थिति में पाहन ही गांव के स‌भी कार्यों को करता है. पुजारी पाहन गांव के पर्व-त्योहारों में पूजा-पाठ करता है. पुजारी पाहन के बिना कोई भी धार्मिक पर्व-त्योहारों का पूजा-पाठ नहीं होता है.

महतो मुंडा और पाहन का स‌हायक होता है. यह गांव में सूचना जारी करने का काम करता है. मुंडा के आदेश की स‌मूचे गांव में यह किसी व्यक्ति विशेष को सूचना देना इनका प्रमुख काम है. गांव के बाहर की सूचना को भी मुंडा तक पहुंचाना इनका काम होता है. पुजारी पाहन को भी यह स‌हायता करता है.

कई गांवों (लगभग 12 से 20) को मिलाकर जो स‌ंगठन बनता है उसे पड़हा कहते हैं. पड़हा राजा पड़हा का प्रधान है. कुछ मुंडा क्षेत्रों में पड़हा राजा को मानकी भी कहा जाता है. मुंडा क्षेत्र में पहले 12 पड़हा थे, लेकिन अब 22 पड़हा हैं. जिन विवादों या मामलों को गांव के मुंडा द्वारा नहीं सुलझाया जा स‌कता है, इन मामलों को अन्य स‌हयोगियों के साथ सुलझाना पड़हा राजा का काम है.

22 पड़हा में एक राजा होता है. ठाकुर पड़हा राजा के कामों में स‌हयोग के लिये एक ठाकुर होता है. इसे सहायक भी कह स‌कते हैं. दीवान राजा का मंत्री होता है जो राजा के हुक्म को आगे अमल में लाता है. किसी स‌भा के लिये दीवान को आदेश देता है और दीवान आगे की कार्रवाई करता है. दीवान दो प्रकार के होते हैं- क. गढ़ दीवान, ख. राज दीवान. गढ़ दीवान – यह गढ़ के अंदर के क्रियाकलापों में शामिल होता है. राज दीवान – राज दीवान गढ़ के बाहर क्रियाकलापों में शामिल होता है.

स‌भा में बहस करने का काम लाल करते हैं, जैसे- जिरह करना. एक प्रकार के वकील के स‌मान होते हैं. लाल तीन प्रकार के होते है- क. बड़लाल, ख. मझलाल, ग. छोटेलाल. ये तीनों लाल निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

पुरोहित शुद्धीकरण का कार्य करता है. जब कोई व्यक्ति स‌माज विरोधी काम करता है जो जाति या गोत्र के विरुदध होता है तब उसे दण्ड मिलने के बाद शुद्धीकरण के बाद ही उसे स‌माज में दोबारा मिला लिया जाता है. दण्ड नहीं देने पर उस व्यक्ति का स‌ामाजिक बहिष्कार किया जाता है. घटवार दण्ड में मिली सामग्री को बांटता है. दण्ड की सामग्री या रुपया-पैसा उनके जिम्मे रहता है. चवार डोलाइत स‌भा में हाथ-पैर धुलाने का काम करता है.पान खवास स‌भा में चूना-तम्बाकू बांटने वाला व्यक्ति है.

सिपाही  (बरकदाज) दीवान के आदेश पर गांव-गांव में नोटिस तामिल करता है. दारोगा सभा  की कार्यवाही में स‌भा का नियंत्रण करता है. यह स‌भा में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों की जांच-पड़ताल तक करता है कि कहीं कोई हथियार तो नहीं छिपाया है.पाण्डेय स‌भा के कागज-पत्रों को रखने की जिम्मेदारी लेता है. यह राजा के आदेश का नोटिस भी जारी करता है.

चलो लौट चलें फिर गांवों की ओर

कमोबेश हर जनजातीय समुदाय की अपनी पारंपरिक स्वशासी व्यवस्था है और सरकार द्वारा समानान्तर व्यवस्थाएं कायम किये जाने के बाद भी इनका आस्तित्व बचा हुआ है. इन संस्थाओं की सामाजिक स्वीकार्यता जबरदस्त है. गांव से लेकर गांवों के समूह तक इन परम्परागत संस्थाओं की श्रृंखला है. गांधी पंचायतों के आधार पर जो व्यवस्था कायम करना चाहते थे वह सैंकड़ों सालों से खासकर आदिवासी इलाकों में कायम है. अपनी जरूरतों के हिसाब से कालक्रम में इनकी भूमिकाएं भी बदलती रही हैं. ऐसे समय में जब देश का लोकतंत्र कारपोरेटपरस्त हो गया हो, इस गणतंत्र दिवस पर हमारे देशज ‘गण’ के लिए देशज ‘तंत्र’ क्या हो सकता है, विचार करना चाहिए. जैसे अमेरिका के जीवाश्म वैज्ञानिक स्टीफन जे गोल्ड ने कहा था कि अगर विकास के पहिये को पीछे घुमाकर छोड़ दिया जाए, तो शायद प्रकृति दुबारा इंसान को जन्म  ना दे. बिलकुल इसी तर्ज समय के पहिये को घुमाने का अवसर मिले तो आप-हम सब कहेंगे-कोई मेरे बीते हुए दिन लौटा दे.

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

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