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बंद को असंवैधानिक कहना लोकतांत्रिक नहीं

बंद या हड़ताल असंवैधानिक नहीं होता है

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Faisal Anurag

बंद या हड़ताल असंवैधानिक नहीं होता है. यह जनता, राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का लोकतांत्रिक अधिकार है कि जिन नीतियों से वह सहमत नहीं हैं या जिन नीतियों को वह जनविरोधी मानते हैं, उसके खिलाफ शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रतिरोध का तरीका अपनायें. लोकतंत्र की प्रक्रिया में बंद की अहम भूमिका है. 5 जुलाई को प्रस्तावित विपक्षी दलों के बंद को लेकर झारखंड प्रशासन और भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह का रूख अपनाया है, क्या वह लोकतांत्रिक है ?  रांची जिला प्रशासन अपनी सीमाओं का उल्लंघन कर बंद को असंवैधानिक (चार जुलाई को रांची से प्रकाशित सभी हिंदी अखबरों में रांची डीसी और एसपी का बयान छपा है) बता रहा है. जिला प्रशासन का यह नजरिया भारतीय जनता पार्टी द्वारा बंद को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद सामने आया है. दोनों के रूख और भाषा एक जैसे हैं. तो क्या प्रशासन भारतीय जनता पार्टी के एजेंट के रूप में कार्य कर रहा है. यह सवाल उठना लाजिमी है. बंद के दौरान संभावित हिंसा को रोकने का उपक्रम करना तो समझ में आने वाली बात है, लेकिन प्रशासन का बयान भी जब राजनीतिक बयानबाजी जैसा हो तो प्रशासन की निष्पक्षता पर विपक्ष का सवाल उठाना गैरवाजिब भी नहीं है.

भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के खिलाफ आहूत बंद को लेकर झारखंड सरकार की बेचैनी साफ नजर आ रही है. आखिर ऐसा क्यों है ?  भारतीय जनता पार्टी सरकार में है. लेकिन जब वह विपक्ष में थी तो खूब बंद का आह्वान करती थी, तब उसे क्यों नहीं लगता था कि वह गैर संवैधानिक कदम उठा रही है. यह सवाल कई लोग सोशल मीडिया पर पूछ रहे हैं. सरकार में रहने पर एक नजरिया और विपक्ष में रहने पर दूसरा रूख रखना लोकतंत्र की मर्यादा को धूमिल ही करता है.

भारत में आजादी की लड़ाई के दौरान तो विरोध के साधन विकसित हुए हैं, उसमें बंद की अपनी भूमिका है. आजादी के बाद भी बंद के आह्वान ने लोकतंत्र को मजबूत बनाने में अहम रोल निभाया है. इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता के खिलाफ जनता के पास जो लोकतांत्रिक हथियार हैं, उन्हें छीनना लोकतंत्र के लिए ही घातक साबित हो सकता है. भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन यहां लोकतांत्रिक समाज बनाने के लिए अभी लंबे संघर्ष की जरूरत है. विरोध के तरीकों को किसी भी हालत में सीमित किए जाने से गैर संवैधानिक विरोध के दरवाजे खुल सकते हैं. जो आगे चलकर एक खतरनाक रूप अपना सकता है.

सरकार और सत्तारुढ़ दल यदि अपने संशोधन को सही मानती है, तो उसे जनता के विवेक पर भरोसा रखना चाहिए और उसे जनता से बंद को विफल करने का आह्वान करना चाहिए. लेकिन उसने दमन का रास्ता अपना लिया है. बार-बार अदालती आदेशों का जिक्र किया जाता है. लेकिन अदालतों के अनेक फैसले हैं, जिसमें कई तरह के अंतरविरोध हैं. झारखंड हाईकोर्ट ने हिंसा और जनमाल की क्षति होने की जबावदेही बंद आयोजकों के लिए तय किया है. सुप्रीम कोर्ट के दो फैसले भी बंद को लेकर है. 1997 का एक फैसला केरल हाईकोर्ट का भी है, जिसे सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस वर्मा की बेंच ने जायज करार दिया था. इसमें कहा गया है कि बंद बुलाने से नागरिकों के स्वतंत्र गतिविधियों पर असर पड़ता है. इससे उनके कामकाज करने का अधिकार भी प्रभावित होता है. कोर्ट ने आगे कहा है कि इसपर  विधायिका को कानून बनाना चाहिए. अगर वह ऐसा नहीं कर पाती है, तो कोर्ट का यह दायित्व है  कि वह नागरिकों  के अधिकारों की सुरक्षा करे और उनकी स्वतंत्रता निश्चित करे. इसमें कोर्ट ने कहीं नहीं कहा है कि बंद असंवैधानिक है. यह भी कोर्ट ने आज तक साफ नहीं किया है कि स्ट्राइक, बंद और हड़ताल में क्या अंतर है.

इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस वाईबी चंद्रचूड़ की बेंच की यह टिप्पणी 01 अप्रैल 2017 की टिप्पणी भी महत्वपूर्ण है. जिसमें बेंच ने साफ कहा है कि हड़ताल या बंद कभी भी असंवैधानिक नहीं हो सकता है. विरोध करने का अधिकार एक कीमती संवैधानिक अधिकार है. हम कैसे कह सकते हैं कि बंद असंवैधानिक होता है. इस तरह इस बेंच ने पूर्व की बेंच की टिप्पणी पर अपनी राय दी है.

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इस संदर्भ में कोर्ट ने ऐसा स्पष्ट नहीं किया है कि बंद या हड़ताल असंवैधानिक है. इस दौरान होने वाली हिंसा के खिलाफ कोर्ट ने कई बार तल्ख टिप्पणी की है. प्रशासनिक दायित्व बनता है कि वह हिंसा की रोकथाम का हर उपाय करें. लेकिन इस क्रम में उसके किसी भी प्रकार की दमनात्मक कार्रवाई से बचना चाहिए. भारत में पिछले कई सालों से लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं को लेकर यह बहस की जा रही है कि उसमें क्षरण हो रहा है और उसे कमजोर बनाने का कार्य भी सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है. खासकर जब कभी जमीन का मामला उठता है, तो सरकारों की भूमिका पर कॉरपोरेट परस्त होने और उसके पक्षकार की भूमिका साफ दिखती है. यह सवाल पूछा जा रहा है कि झारखंड में शिक्षा या स्वास्थ्य की कितनी योजनाएं जमीन के अभाव में लंबित हैं, यह सरकार स्पष्ट करे. यह भी सवाल उठा है कि जब झारखंड में तेजी से स्कूलों के विलयीकरण की प्रक्रिया की जा रही है, तब भूमि अधिग्रहण संशोधन की क्या महत्ता रह जाती है. आमतौर पर झारखंड में लबे समय से जबरन अधिग्रहित की गयी जमीन और उससे होने वाले विस्थापन ने लोगों के मन में गहरा संदेह पैदा किया है. सरकार का दायित्व है कि वह अपने कानून के प्रति जनता के मन में उठने वाले संदेहों और सवालों का निदान करें.

झारखंड सरकार और सत्तारुढ़ दल को एसे माहौल के निर्माण से भी बचना चाहिए, जिससे आमजन में निराशा और लाचारी की भावना पैदा हो. प्रशासन जिस तरह की भूमिका निभा रहा है, उससे माहौल में दहशत ही पैदा हो रहा है ओर यह सकात्मक लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं है.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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