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उज्जवला योजना महिलाओं के लिए बनी टीयर गैस, महंगाई के कारण लकड़ी और पत्तों में खाना बना रहीं ग्रामीण महिलाएं

स्वच्छ ईंधन, बेहतर जीवन की परिकल्पना धाराशायी

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Chhaya

Ranchi: महिलाओं को सम्मान मिले और सशक्त हों, इसके लिए केंद्र सरकार की ओर से साल 2016 में ‘प्रधानमंत्री उज्जवला योजना’ की शुरूआत की गयी. राज्य में भी बीपीएल परिवारों को चिन्हित कर एलपीजी गैस सिलेंडर वितरित किया गया. योजना को दो साल हो चुके हैं, विभिन्न चरणों में बीपीएल महिलाओं के बीच गैस वितरण किया गया, जो अभी तक जारी है. इन दो सालों में ही गैस के दाम में भी काफी इजाफा हुआ है. जिससे अब ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं के रसोई से गैस सिलेंडर बाहर होते दिख रहा है. बात करते हुए महिलाओं ने बताया कि जब गैस सिलेंडर के लिए चयनित किया गया तो लगा कि गैस मिल तो जायेगा, लेकिन इसे अब भरायेंगे कैसे. क्योंकि गैस की कीमत कभी भी हमारे बस की नहीं रही. सिर्फ महिलाओं ने ही नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों के पुरूषों ने भी गैस सिलेंडर इस्तेमाल करने की बात से इंकार किया. हालांकि ईंधन की कीमत को लेकर विभिन्न स्तरों पर विरोध जताया गया है.

छह माह में एक बार भरा रहे गैस

रांची से सटे ग्रामीण क्षेत्र सोसो, नवासोसा, चटकपुर की महिलाओं से बात करने के दौरान कई महिलाओं ने कहा कि गैस तो मिल गया, लेकिन जला के क्या करेंगे, इतनी महंगाई है कि एक बार भराने के बाद छह माह तक सोचना पड़ता है. ऐसे में छह-छह महीने में गैस भरा रहे हैं. पतरागोंदा निवासी खुदी देवी ने कहती हैं कि गैस का इस्तेमाल कभी कभी ही करते हैं. ऐसे में लकड़ी, कोयला और पत्ता जला के ही खाना बना लेते हैं.

रोज कमाने खाने वाले 1000 रुपये में कहां से भरायेंगे गैस

मंगरा उरांव ने बताया कि वे मजदूरी करते हैं, वह भी बाजार में काम मिला तो ठीक नहीं तो बैठे रहते हैं. ऐसे में प्रति माह 1000 रुपये देकर गैस कैसे भरवायें. जब पहली बार गैस दिया गया, तब से इसका कम ही इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि परिवार को पता है कि गैस भराने में हम सक्षम नहीं हैं.

नहीं मिल रही सब्सिडी

निशा गाड़ी ने बताया कि लगभग एक साल पहले उसके परिवार को गैस सिलेंडर दिया गया. साथ ही बताया गया था कि गैस भराने के बाद खाता में सब्सिडी पैसा चला जायेगा. उन्‍होंने बताया कि एक साल में दो बार गैस भराये हैं. लेकिन, अभी तक एक भी सब्सिडी पैसा खाता में नहीं आया है.

आसानी से मिलते है पत्ते, लकड़ी और कोयला

इन महिलाओं ने बताया कि गैस में एक हजार रूपये देना पड़ता है, वह भी इसका सब्सिडी नहीं मिलता. इसके बजाय आस-पास के इलाकों में दो घंटे घुमने से तीन-चार दिन जलाने के लिए लकड़ी और पत्ते जमा कर लेते हैं. जिसके लिए पैसे भी नहीं देने पड़ते. वहीं कोयला भी आसानी से खरीदा जा सकता है. इन महिलाओं ने बताया कि दिन भर तो मजदूरी और काम में समय बीतता है, ऐसे में घर में दो बार ही चुल्हा जलता है. गैस महंगा है इससे अच्छा है कि पत्ता जलायें. अब गैस के दाम इस कदर बढ़ रहे हैं कि गांव की महिलायें मिट्टी के चुल्हों को ही पसंद कर रही हैं.

होती है कई बीमारियां

योजना की शुरूआत देश के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए की गयी. घरेलू गैस की जगह परंपरागत ईंधन के इस्‍तेमाल से महिलाओं की सेहत पर होने वाले दुष्‍प्रभाव की जानकारी देते हुए डा पीके सिन्हा ने बताया कि जीवाष्म ईंधन के प्रयोग से कई बीमारियां हो सकती हैं. विशेषकर श्‍वांस संबधी बीमारियां होना लाजमी है. इन बीमारियों में दमा, खांसी, फेफड़ा में एलर्जी समेत अन्य बीमारियां है.

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