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मौत के दो साल बाद आया भाकपा माओवादी के अरविंद जी का वीडियो, सारे राज से उठा पर्दा

Ranchi : भाकपा माओवादी के सेंट्रल कमेटी के सदस्य देव कुमार सिंह उर्फ अरविन्द जी कभी बूढ़ा पहाड़ इलाके के लिए खौफ के पर्याय हुआ करते थे. पुलिस ने भी 1 करोड़ का इनाम अरविंद जी पर रखा था.

मार्च 2018 में अरविंद जी की हार्ट अटैक से मौत हो गयी थी. लेकिन मौत के बाद उनके मृत शरीर का कोई फोटो या वीडियो सामने नहीं आया था.

इस कारण उनकी मौत भी एक सस्पेंस ही लगी रही थी. कहा जा रहा था कि पुलिस को गुमराह करने के लिए ही मौत की खबर फैलायी गयी. लेकिन अरविंद जी की मौत के बाद नक्सलियों ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इसकी पुष्टि की थी.

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लेकिन अब अरविंद जी की मौत के दो साल बाद मृत शरीर का वीडियो सामने आया है. उसमें नक्सली उनके जीवन के बारे में बता रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि अरविंद जी की मौत से तीन महीने पहले तबीयत ज्यादा खराब थी. जिसके बाद मार्च 2018 में मौत हो गयी थी.

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लंबे समय से बीमार थे अरविंद जी


भाकपा माओवादी की सेंट्रल कमेटी के सदस्य अरविंद जी कई महीनों से बीमार थे. और बूढ़ा पहाड़ के इलाके में दो वर्ष से भी अधिक समय से जमे हुए थे.

अरविंद जी को झारखंड-बिहार के कई बड़े नक्सल हमलों का मास्टर माइंड माना जाता था.

वे माओवादियों के बिहार-झारखंड, उत्तरी छत्तीसगढ़ कमेटी के टॉप कमांडर थे. देवकुमार सिंह उर्फ अरविंद जी बिहार के जहानाबाद जेल ब्रेक, कटिया हमला, डुमरिया हमला, पूर्व सांसद इंदर सिंह नामधारी के काफिले पर हमला समेत कई बड़े घटनाओं के मुख्य आरोपी थे.

कई दशकों तक माओवादी गतिविधियों में सक्रिय रहे अरविंद जी

मूलत: बिहार के जहानाबाद के रहने वाले अरविंद जी पटना विश्वविद्यालय में विज्ञान के विद्यार्थी रह चुके थे. अरविंद जी कई दशकों तक माओवादी गतिविधियों में सक्रिय रहे.

अरविंद जी को पकड़ने के लिए पुलिस ने कई बार बूढ़ा पहाड़ के इलाके में अभियान भी चलाया, लेकिन सफलता नहीं मिली.

अरविंद जी की बीमारी के कारण माओवादियों ने इलाके में सुधाकरण (सरेंडर कर चुका है) को कमांडर बना कर भेजा था.

अरविंद जी के नेतृत्व में ही नक्सलियों ने 2006-07 में देश में पहली बार बिहार के जहानाबाद जिले में जेल ब्रेक किया था और 300 से अधिक कैदियों को छुड़ाया था.

2013 में कटिया हमले में 17 जवान शहीद हुए थे और अरविंद जी के कहने पर ही शहीद जवान के पेट में बम लगाया गया था. अरविंद जी माओवादियों के थिंक टैंक और मास्टर प्लानर थे.

अरविंद जी की सुरक्षा में करीब 100 से 150 नक्सली हमेशा तैनात रहते थे और उनका एक अपना घोड़ा दस्ता था.

बताया जाता है कि अरविंद जी का घोड़ा उन्हें देखकर पहचान जाता था और सवारी के दौरान वह बैठकर अरविंद जी को चढ़ाता था.

एके-47 और रॉकेट लॉन्चर से लैस आठ नक्सली कमांडो हमेशा उनकी सुरक्षा में तैनात रहते थे.

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नौ राज्यों की पुलिस को थी अरविंद जी की तलाश

बिहार के जहानाबाद जिले के रहने वाले अरविंद जी भाकपा माओवादी पोलित ब्यूरो के सदस्य थे. नौ राज्यों की पुलिस को उनकी तलाश थी.

वह आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड में संगठन के लिए काम कर चुके थे. मौत से पहले वो लातेहार, गुमला, लोहरदगा, गढ़वा और पलामू इलाके में सक्रिय थे.

सालों से झारखंड पुलिस के लिए अरविंद जी चुनौती बने हुए थे.

2011 में झारखंड को बनाया था अपना ठिकाना

भाकपा माओवादी के पीएलजीए मारक दस्ते के सक्रिय सदस्य रहे अरविंद जी 2011 में सेंट्रल कमेटी के सदस्य बनकर झारखंड आये थे.

कई कुख्यात माओवादियों के साथ उन्होंने बूढ़ा पहाड़ को ठिकाना बनाया. ताबड़तोड़ नक्सली वारदातों को अंजाम देकर वे चर्चा में आये थे.

मार्च 2016 में आंध्र प्रदेश का कुख्यात माओवादी सुधाकरण भी अपनी पत्नी नीलिमा (दोनों सरेंडर कर चुके हैं) के साथ लातेहार आये थे.

झारखंड पुलिस ने इन दोनों के खिलाफ अभियान तेज किया, तो अरविंद जी लातेहार के कुमंडी जंगल पहुंचे. 2013 में मुठभेड़ में 11 जवानों को ढेर कर पहली बार चार जवानों का पेट चीरकर उसमें बम प्लांट कर दिया था.

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