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2100 तक हिमालय के दो तिहाई ग्लेशियर पिघल जायेंगे,  हिंदुकुश इलाके में भयावह जल संकट  पैदा होगा

हिंदुकुश हिमालय इलाका 3500 किलोमीटर तक फैला हुआ है. यह पहाड़ अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, इंडिया, म्यांमार, नेपाल और पाकिस्तान में फैले हुए हैं. हिमालय के ऊंचे ऊंचे ग्लेशियर से दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण 10 नदियां निकलती हैं. इन नदियों में गंगा, सिंधु, येलो रिवर, इरावती मेकॉन्ग, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, व्यास, रावी जैसी बड़ी नदियां हैं

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NW Desk : 2100 तक हिमालय के दो तिहाई ग्लेशियर पिघल जायेंगे.  इसकी वजह से नदियों में पानी तेजी से घट जायेगा और इससे हिमालय के आसपास के इलाकों में पानी का संकट खड़ा हो जायेगा. हिंदुकुश हिमालय की तमाम चोटियां बर्फविहीन हो जायेंगी. ऐसी आशंकाएं हमारे सामने हैं. बता दें कि  दुनिया में तीसरे ध्रुव के रूप में जाने जाने वाले हिमालय पर ग्लोबल वार्मिंग का जबरदस्त प्रभाव पड़ रहा है. हिंदुकुश हिमालय को लेकर हुए एक ताजा अध्ययन के अनुसार पेरिस समझौते के तहत ग्लोबल वार्मिंग को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित किये जाने के लिए कदम उठाने के बावजूद तापमान में 2.1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी इस शताब्दी के अंत तक होगी. इसका असर हिमालय के ग्लेशियर पर पड़ेगा. अगर ऐसा हुआ तो इस इलाके के दो तिहाई ग्लेशियर पिघल जायेंगे और हिमालय में रहने वाले 25 करोड़ पहाड़ी लोग और इसी के साथ 165 करोड़ ऐसे लोग जो हिमालय के आसपास रहते हैं, उन पर बुरा असर पड़ेगा. अध्ययन के अनुसार अगर जलवायु परिवर्तन को काबू में रखने वाले मौजूदा कदम असफल रहते हैं तो इस समय के उत्सर्जन के मुताबिक सन 2100 तक हिमालय के दो तिहाई ग्लेशियर पिघल जायेंगे.

इसकी वजह से नदियों में पानी तेजी से घट जायेगा और इससे हिमालय के आसपास के इलाकों में पानी का संकट खड़ा हो जाएगा. इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के फिलिप्स वेस्टर का कहना है कि यह ऐसी जलवायु त्रासदी होगी जिसे आपने कभी सुना नहीं होगा. उनके अनुसार ग्लोबल वार्मिंग का मौजूदा ट्रेंड इस तरीके का है कि इससे हिंदुकुश हिमालय की तमाम चोटियां बर्फविहीन हो जाएंगी.

हिंदुकुश हिमालय इलाका 3500 किलोमीटर तक फैला हुआ है

हिंदुकुश हिमालय इलाका 3500 किलोमीटर तक फैला हुआ है. यह पहाड़ अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, इंडिया, म्यांमार, नेपाल और पाकिस्तान में फैले हुए हैं. हिमालय के ऊंचे ऊंचे ग्लेशियर से दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण 10 नदियां निकलती हैं. इन नदियों में गंगा, सिंधु, येलो रिवर, इरावती मेकॉन्ग, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, व्यास, रावी जैसी बड़ी नदियां हैं. इनमें हिमालय के ग्लेशियर से आ रहा पानी पूरे साल बहता रहता है. अगर हिमालय के ग्लेशियर सूख जाएंगे तो इन नदियों में 12 महीने पानी नहीं रहेगा. एक अध्ययन में कहा गया है कि हिंदुकुश हिमालय में 500 गीगा वाट बिजली पैदा करने का सामर्थ्य है. इससे एक अरब लोगों के घरों में बिजली की सप्लाई दी जा सकती है. लेकिन इस इलाके में रहने वाले ज्यादातर लोग पारंपरिक ईंधन का इस्तेमाल करते हैं जिससे ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा मिलता है, लिहाजा इस तरफ ध्यान दिए जाने की जरूरत है.

  ग्लोबल वार्मिंग को रोकना आसान नहीं होगा

नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट में सीनियर साइंटिस्ट रहे प्रोफेसर सैयद मसूद अहमद के अनुसार आईपीसीसी की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग को रोकना आसान नहीं होगा. वायुमंडल में मानवीय गतिविधियों की वजह से ग्रीनहाउस गैसें लगातार बढ़ रही है. प्रोफेसर सैयद मसूद अहमद इन दिनों राजधानी दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्रों को ग्लोबल वार्मिंग की खतरों से रूबरू करा रहे हैं. उनका कहना है कि पेरिस समझौते को अक्षरशः लागू करने के बावजूद 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी तो सिर्फ 2030 तक हो जायेगी. अमेरिका और चीन जैसे बड़े औद्योगिक देश जब तक ग्लोबल वार्मिंग को रोकने की जिम्मेदारी से बचते रहेंगे, तब तक यह समस्या बनी रहेगी.

भूगर्भ शास्त्र के मुताबिक हिमालय पर्वत श्रृंखला 7 करोड़ साल पहले बननी शुरू हुई थी. हिमालय पर्वत के ग्लेशियर बदलते मौसम के लिहाज से काफी संवेदनशील है. 1970 से इस इलाके में मौजूद ग्लेशियर पर ग्लोबल वार्मिंग के असर को लगातार रिकॉर्ड किया जा रहा है.  हिमालय में मौजूद तमाम बड़े ग्लेशियर लगातार तेजी से पिघल रहे हैं. धीरे धीरे कई ऐसे इलाके जहां पर हमेशा बर्फ रहती थी, वहां से बर्फ पूरी तरह से हटनी शुरू हो गई है. हिमालय के वातावरण में आ रहे पर्यावरण के इन बदलाव का असर दिखना शुरू हो गया है. ग्राउंड वाटर पर काम करने वाले साइंटिस्ट डॉक्टर शकील अहमद ने बताया कि निश्चित तौर पर हिमालय पर ग्लोबल वार्मिंग का असर पड़ रहा है.

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