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टीटीपीएस को एमडी के लिए करना होगा कोर्ट के आदेश का इंतजार, इधर संयंत्र का हो रहा बंटाधार

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: टीटीपीएस (तेनुघाट थर्मल पावर स्टेशन) को एक अदद एमडी का इंतजार पिछले चार सालों से है. छह बार एमडी को लेकर सरकार ने इंटरव्यू किया है. आखिरी इंटरव्यू की कैंडीडेट वाली लिस्ट गवर्नर के यहां धूल खा रही है. बताया जा रहा है कि लिस्ट में जिनके नाम हैं उनमें एके सिन्हा की सबसे प्रबल दावेदारी मानी जा रही है. लेकिन सच यह है कि बगैर कोर्ट के आदेश के एमडी का सलेक्शन हो ही नहीं सकता है. दरअसल पांचवीं बारवाले इंटरव्यू में जिन लोगों के नाम लिस्ट में थे, उनमें से एक पीपी साह भी थे. पीपी साह डीवीसी चंद्रपुरा में कार्यरत हैं. लिस्ट में नाम होने की वजह से झारखंड सरकार के ऊर्जा विभाग ने डीवीसी से पीपी साह की विजिलेंस रिपोर्ट मांगी.

पीपी साह पर क्या लगे थे आरोप

डीवीसी की विजिलेंस रिपोर्ट में पीपी साह पर कुछ अनियनितताओं के आरोप थे. इसी आरोप का हवाला देते हुए सरकार ने उन्हें एमडी की कुर्सी पर नहीं बिठाया. ऐसा होने पर पीपी साह ने हाइकोर्ट में मामले को लेकर रिट दायर की. सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट का आदेश आया कि जब-तक कोर्ट का किसी तरह का फैसले इस मसले को लेकर नहीं आ जाता, किसी तरह की नियुक्त एमडी पद को लेकर नहीं हो सकती. ऐसे में भले ही सरकार ने छठी बार विज्ञापन निकाल पर एमडी पद के लिए इंटरव्यू ले लिया हो. लेकिन एमडी पद पर बिना कोर्ट के आदेश के किसी तरह का कोई फैसला नहीं लिया जा सकता.

साह ने कोर्ट में जाने से पहले क्या बनाया आधार

टीटीपीएस के लिए पांचवीं बार 25 नवंबर 2017 को इंटरव्यू लिया गया. इससे पहले पीपी साह ने विजिलेंस से 18 अक्टूबर 2017 को क्लियरेंस लिया था. इंटरव्यू के बाद जब लिस्ट में पीपी साह का नाम शामिल हुआ तो, ऊर्जा विभाग ने डीवीसी से विजिलेंस रिपोर्ट मांगी. रिपोर्ट में जो आरोप लगे वो एक महीना पहले के आरोप हैं. सीवीसी और सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामले को लेकर गाइडलाइ तैयार की है. उस गाइडलाइन के तहत कहा गया है कि बड़े पदों पर नियुक्तियों के लिए छह महीना पहले तक के आरोपों का संज्ञान नहीं लिया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश में कहा गया है कि अगर छह महीना पहले के आरोपों पर संज्ञान लेते हुए नियुक्तियां रोकी जाएगी तो किसी भी पद पर नियुक्ति संभव नहीं है. इसी को आधार बना कर पीपी साह हाइकोर्ट गए हैं. अब सभी की नजर हाइकोर्ट के आदेश पर टिकी है. कोर्ट के आदेश के बाद ही टीटीपीएस के एमडी का नाम तय हो सकेगा.

इधर टीटीपीएस का हो रहा बंटाधार

फिलवक्त टीटीपीएस की एक यूनिट ही काम कर रही है. एक यूनिट से 200-208 मेगावट बिजली की सप्लाई हो पाती है. कोयले की कमी से संयंत्र कई बार ठप हो चुका है. डिसिजन लेनेवाले अधिकारी की कमी से संयंत्र की हालत लगातार खस्ता होते जा रही है. यही हालात रहा तो वो दिन दूर नहीं कि राज्य के एक मात्र बिजली बनाने वाले संयंत्र पर ताला लग जाए. ऐसे और भी कई वजहें हैं जिनसे संयंत्र का बंटाधार हो रहा है. जानिए वो कौन सी वजहें हैं.

  •  BHEL को प्लांट के सभी विभागों की मरम्मत का जिम्मा दिया गया है. प्लांट में इलेक्ट्रिकल, बॉयलर, टरबाइन, ईएफपी, ऐश हैंडलिंग जैसे विभाग हैं. इन सभी विभागों की मरम्मती BHEL करता है. लेकिन हर विभाग की मरम्मत अलग-अलग करता है. BHEL मनमानी कीमत पर यह काम करता है. अमूमन एक विभाग की मरम्मत के लिए विभाग की तरफ से BHEL को एक करोड़ रुपए सर्विस चार्ज दिए जाते हैं. 25 लाख के करीब पार्ट्स पर खर्च होता है. हर विभाग से पेमेंट अलग-अलग होता है. फिर भी हर वक्त प्लांट की स्थिति खस्ता बनी रहती है. प्लांट के शीर्ष अधिकारियों ने कभी भी ये पहल नहीं की कि पूरे प्लांट की मरम्मत का जिम्मा एक साथ BHEL को दे दिया जाए.
  •  किसी भी थर्मल पावर में बिजली उत्पादन में बॉयलर की भूमिका अहम होती है. टीटीपीएस में लगा बॉयलर राम भरोसे चल रहा है. इसमें इतने लिकेज हैं कि बॉयलर को मुकम्मल हवा मिल ही नहीं पा रही है. लिकेज होने की वजह से एनर्जी बन ही नहीं पाती है. जिस वजह से बॉयलर लोड नहीं ले पाता है. इसे दुरुस्त करने के लिए प्रबंधन ने कभी कोई कदम नहीं उठाया.
  • जब से प्लांट में काम शुरू हुआ है, उस समय से एक बार भी यूएटी (यूनिट ऑक्जलरी ट्रांस्फरमर) की सर्विसिंग ही नहीं हुई है. जिससे करोड़ों रुपए में खरीदा गया ट्रांस्फारमर खरीदने के बाद से ही बेकार पड़ा हुआ है. मामूली ट्रांस्फारमर को भी अगर चार्ज नहीं किया जाए तो वो खराब हो जाता है. इसकी सर्विसिंग कराने में प्रबंधन ने कभी कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी.
  • थर्मल पावर स्टेशन में सबसे बड़ी समस्या बिजली उत्पादन के बाद बच गए छाई से होती है. हर पावर स्टेशन में इसे डिस्पोज करने की कोई ना कोई व्यवस्था होती है. लेकिन टीटीपीएस में ऐश (छाई) डिस्पोज करने की प्रक्रिया पर प्रबंधन जरा भी गंभीर नहीं दिखता, जिस वजह से छाई बहकर पास की नदियों में जाकर मिल रहा है.
  • टीटीपीएस को सीसीएल की तरफ से सप्लाई होने वाला कोयला अमूमन काफी घटिया क्वालिटी का होता है. सीसीएल से टीटीपीएस 3500 कैलोरी की क्षमता वाला कोयला डिमांड करता है. लेकिन सीसीएल काफी लो क्वॉलिटी का कोयला टीटीपीएस को सप्लाई करता है. बकाया होने की वजह से टीटीपीएस प्रबंधन कभी भी सीसीएल से इस बात पर ऐतराज नहीं जताता है.
  •  पुराना डीजी होने की वजह से टीटीपीएस में एक बड़ा हादसा टला. टीटीपीएस को इस घटना के बाद करीब 200 करोड़ का घाटा हुआ. दूसरा कोई भी प्रबंधन होता तो इस बात से सबक लेकर प्लांट में नया डीजी लाता. जबकि नए डीजी के विभाग की तरफ से प्लांट प्रबंधन को पहले से ही आवेदन दिया हुआ था. इसके उलट प्रबंधन ने हादसे के लिए कनिय अधिकारियों पर कार्रवाई की और उसी विभाग के सीनियर अधिकारी को प्रमोशन देकर जीएम बना दिया गया. आज भी प्लांट में नए डीजी को लेकर कोई गंभीर नहीं है.
  • टीटीपीएस की चिमनी की प्लांट बनने के बाद से ही कभी सफाई नहीं की गयी. इससे चिमनी के ऊपर चढ़ने के रास्ते में छाई जम जाने की वजह से कोई चिमनी पर अब चढ़ ही नहीं सकता. राम भरोसे चिमनी काम कर रही है. किसी भी दिन टीटीपीएस की चिमनी काम करना बंद कर सकती है.

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