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जंगल के रक्षक आदिवासियों को SC का फैसला कर देगा लहूलुहान, आंदोलन की राह पर झारखंड के आदिवासी

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  • आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत समुदायों के साथ हुआ ‘ऐतिहासिक अन्याय’ फिर होगा शुरू, जंगल पर देशी-विदेशी कॉरपोरेट घरानों की है नजर
  • मोदी सरकार शीर्ष न्यायलय के फैसले को बदलने के लिए अध्यादेश लाये, कॉरपोरेट के हाथ में जंगल जाने नहीं देगी देश की जनता

Pravin Kumar

Ranchi: आदिवसी और जंगल का रिश्ता खून के रिश्ते से भी ज्यादा गहरा है. अंग्रेजों के जमाने से ही वन संपदाओं पर उपनिवेशिक शासकों ने पूरा कब्जा जमा लिया था. यह सिलसिला वन अधिकार कानून के आने के पूर्व तक कायम रहा. अंग्रेज़ी शासनकाल की समाप्ति के बाद सत्तासीन हुई आज़ाद भारत की सरकार ने भी प्राकृतिक संपदा की इस लूट को बरकरार रखा और आर्थिक राजनैतिक ढांचे में किसी प्रकार का कोई भी बुनियादी परिवर्तन नहीं किया. जंगल व अन्य प्राकृतिक संपदा पर आश्रित समुदायों के स्वतंत्र एवं पूर्ण अधिकार के लिए जब वनाधिकार कानून बना तो देश भर के आदिवासी समुदाय में एक उम्मीद जगी थी.संसद ने 18 दिसंबर 2006 को सर्वसम्मति से अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून, 2006 पारित किया था. 31 दिसंबर 2007 को इसे जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे भारत में लागू करने की अधिसूचना जारी की गयी थी. इसके बाद भी वन विभाग आदिवासियों को पट्टा देने में रोड़े अटकता रहा. फिर भी कुछ भूमि का पट्टा आदिवासी समुदाय को मिला. लेकिन ग्रामसभा के अनुमोदन से जितनी जमीन के रकबा के लिए आवेदन दिये गये थे, उससे कम ही मिली.

संयुक्त बिहार के समय बिहार सरकार ने फॉरेस्ट कॉरपोरेशन बना कर वर्तमान झारखंड के वन क्षेत्र में फलदार वृक्ष के स्थान पर सागवान वृक्ष लगाने का काम शुरु किया गया था. जिसके विरोध में सारंडा और पोड़ाहाट वन क्षेत्र के आदिवासी सरकार के विरोध जंगल की रक्षा के लिए खड़े हो गये थे. जंगल में मौजूद फलदार वृक्ष से जंगल क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी और झारखंडी समुदाय की आजीविका निर्भर थी. ऐसे में महुआ, आम, कटहल, चार जैसे वृक्षों को काटने के लिए रोका और अपनी शहादत दी थी. कोल्हान के आदिवासी सरकार के फैसले के विरोध में खड़े हो गये थे. सरकार ने भी विरोध के दमन में कोई कसर नहीं छोड़ी.

जंगल बचाने के आंदोलन के दमन के लिए दर्जनों छोटे-बड़े गोलीकांड को अंजाम दिया गया. लेकिन प्रतिरोध के स्वर देखते हुए सरकार को भी अपने फैसले से पीछे हटना पड़ा था. शीर्ष न्यायालय के फैसले के बाद फिर झारखंड के आदिवासी इलाके में सरकार के खिलाफ आक्रोश की चिंगारी नजर आने लगी है. वनाधिकार कानून को वन विभाग के द्वारा सही रूप में अनुपालन नहीं होने का आक्रोश तो पहले से आदिवासी समुदाय में मौजूद था. ऊपर से 20 फरवरी को दिया गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी आदिवासी समुदाय को आंदोलन की राह पर खड़ा कर रहा है.

झारखंड,छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओडिशा, आदिवासी बाहुल्य राज्य हैं. अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 16 प्रदेशों की 11 लाख से ज्यादा की आदिवासी जनता के सामने घर के साथ-साथ उनकी आजीविका पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया है. मामले की अगली सुनवाई की तारीख 27 जुलाई है. इस तारीख तक राज्य सरकारों को अदालत के आदेश से आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करने का काम शुरू कर देना होगा.

क्या कहते हैं पूर्व सांसद शैलेन्द्र महतो

पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने आदिवासियों पर ऐतिहासिक अन्याय को बढ़ाने का काम किया है. 1976 के दौर में भी फॉरेस्ट कॉरपोरेशन बनाकर बिहार सरकार ने जंगल में फलदार वृक्ष काटकर सागवान लगाना शुरू किया था. जिसके खिलाफ सारंडा और पूरा पोड़ाहट वन क्षेत्र के आदिवासी मूलवासियों ने संघर्ष किया था. उस दौर में दर्जनों छोटे-बड़े गोलीकांड को सरकार ने आजंम दिया. इचाहातू में 6 नवंबर 1978 को गोली कांड हुआ, 25 नवंबर 1978 सेरेंगदाग गोलीकांड, 8 सितंबर 1980 में गुवा गोलीकांड को सरकार ने अंजाम दिया. कोर्ट के फैसले ने फिर से जंगल को पूंजीपतियों के हाथ में सौंपने की तैयारी शुरू कर दी है. न्यायालय के फैसले ने आदिवासियों की आजीविका और आवास छीनने का काम किया है. न्यायालय के फैसले के विरुद्ध फिर से आदिवासी समाज को खड़ा होना होगा. लोकतंत्र में देश चलाने का काम न्यायालय को नहीं करना चहिए. फैसले के बाद भी वन क्षेत्र में रहनेवाले लोग अपना गांव और जंगल नहीं छोड़ेंगे.

‘गांव छोड़ब ना ही-जंगल छोड़ब ना ही’

दयामनी बारला, सामाजिक कार्यकर्ता

फैसले पर दयामनी बरला ने कहा कि सुप्रीम कोट के एक फैसले ने जंगल में रहने वाले आदिवासियों की अस्मिता और जिंदगी पर गहरा असर डालेगा. केंद्र सरकार ने आदिवासियों का पक्ष नहीं रखा. केंद्र की इस भूमिका से आदिवासी बेहद नाराज हैं. हजारों सालों से जंगलों के बीच रहनेवाले आदिवासी बेदखल होने की कल्पना से सिहर जा रहे हैं. अमेरिका और अफ्रीका में खदानों और जंगलों पर अधिकार के लिए आदिवासियों को न केवल लहूलुहान कर दिया गया, बल्कि उनका बड़े पैमाने पर जेनोसाइड भी हुआ. वनाधिकार कानून के समय यह वायदा किया गया था कि आदिवासियों के खिलाफ जो ऐतिहासिक अन्याय हुआ है, यह कानून उस पर मामूली मरहम है. अब जब आदिवासी बेदखल होंगे, तो क्या ये ऐतिहासिक अन्याय नहीं होगा.

कोलेबिरा विधायक विक्सल कोंगाड़ी

वन अधिकार कानून से जो भरोसा आदिवासी समाज को सरकार के प्रति आया था, वो अब खोता जा रहा है. फैसले के बाद आदिवासी समाजों के भीतर इस सवाल को लेकर भारी बेचैनी है. जंगलों की विविधता को खत्म करने और उस पर कब्जा करने के लिए देशी-विदेशी कॉरपोरेट घरानों में होड़ लगी हुई है. जड़ी-बुटी के नाम पर भी जंगलों को लूटा जा रहा है. आदिवासियों ने जान देकर जंगलों की रक्षा की है. आदिवासी समाज के इस संकट को यदि तुंरत हल नहीं किया गया तो इसका बहुत गहरा असर होगा. आदिवासी जनसंगठन पूछ रहे हैं, क्या मोदी सरकार अपनी गलती सुधारेगी और अध्यादेश लाकर जंगलों से हाने वाली इस संभावित बेदखली को रोकेगी.

SC का फैसला नौंवी अनुसूची का उल्लंघन – जॉर्ज मोनोपोली

जॉर्ज मोनोपोली,संयोजक, झारखंड वन अधिकार मंच

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए झारखंड वन अधिकार मंच के जॉर्ज मोनोपोली ने कहा कि वनाधिकार कानून को अधिनियमित किया गया तथा जंगल में निवास करने वाले प्रत्येक परिवार को चार एकड़ भूमि इस कानून के द्वारा देने का वचन दिया गया था. जबकि ग्रामसभा के अनुमोदन के बाद भी अनुमंडल स्तर पर व्यक्तिगत और सामुदायिक पट्टा देने में कोताही वन विभाग के द्वारा बरती गयी है. जो पट्टा मिला है, उसमें भी भूमि का क्षेत्र काफी कम कर दिया गया है. ऐसे में यह फैसला वन क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों को खत्म करने के समान है. सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला नौवीं अनुसूची का उल्लंघन है.

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