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‘आदिवासी समाज को तय करना होगा कौन उनका हित चाहता है, कौन नहीं’

तीनों केंद्रीय सरना समिति की विचारधारा अलग-अलग

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Ratan Trikey

आज रांची में तीन केन्द्रीय सरना समिति है. तीनों केन्द्रीय सरना समिति की विचारधारा व सोच में अंतर है. कुछ लोग खुद चलना चाहते हैं. कुछ को कुछ ताकतें चला रही हैं. कुछ स्वतंत्र रूप से समाज को खुद ले जाना चाहते हैं समाज को आगे बढ़ता देखना चाहते है. अब आदिवासी समाज को तय करना है कि कौन सरना समिति हित, सौहार्द चाहता है.

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(1) अजय तिर्की (कांटाटोली निवासी) जिन्होंने केन्द्रीय सरना समिति को रजिस्टर्ड कर 1960 कानून के तहत NGO का रूप दिया.
(2) अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद (पंजीकृत) स्व: कार्तिक बाबा की अगुवाई में स्थापित व शुरू की गई सरना समिति जिसे समाज ने मान्यता बहुत पहले ही दे दी है. जिसके आज के अध्यक्ष भी अजय तिर्की हैं और ये भी सरना कोड की वकालत कर रहे हैं.
(3) एक केन्द्रीय सरना समिति ये भी है जिसके अध्यक्ष फुलचंद तिर्की हैं. और ये भी सरना कोड की मांग कर रहे हैं और ईसाई धर्म अपना लिए आदिवासियों के आरक्षण को खत्म करने की मांग कर रहे है.
तो तीन सरना समितियां हैं. तीनों की सोच और कार्यप्रणाली में जमीं-आसमां का अंतर है और समाज एक है. आप आंकिये कि किस केन्द्रीय सरना समिति की बात पर आदिवासी समाज विश्वास करें. क्या बाबा कार्तिक के द्वारा स्थापित केन्द्रीय सरना समिति के कदमों चिन्हों पर चले या उस केन्द्रीय सरना समिति जो NGO बन चुका है या फिर कुछ चंद साल में बनाया गया केन्द्रीय सरना समिति जिसे फुलचंद तिर्की चला रहे हैं. वैसे कई छोटी-छोटी सरना समितियां भी हैं जो गांव, टोले, मुहल्ला स्तर पर सक्रिय है. लेकिन कोई गतिविधि नहीं. बस समिति है. जिसे पार्टी संगठन वाले लोग चंदा या पैसे देकर जब चाहे खरीद लेते हैं. इन्हीं सरना समितियों में कई भाग/ गुट हैं जो अलग-अलग मतों में बंटे हैं. कोई गुट सरना धर्म कोड की मांग करता है कोई गुट हिंदू धर्म मानता है. यही कारण है कि गुट बन अलग-अलग हो चुकी है सरना समितियां.

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पहली बात: मैं भी कई सरना समितियों का संरक्षक हूं, वो इसलिये नहीं कि मैं नेतागिरी करता हूं. बल्कि इसलिये कि मेरी अगुवाई में कई सरना स्थल, कई सतभरी, कई हड़गड़ी, कई मसना, महली मसना, मुंडा मसना, छौवा मसना, कई भुतखेता, डाली कतारी, पत्थलगड़ी की जमीन भी. वो तो समाज में बहिरागत आबादियों और गैरझारखंडियों ने और सभी धर्म के दलालों /ठेकेदारों ने हम आदिवासियों को तोड़-बांटकर रखा. नहीं तो आज का झारखंड कुछ और होता. मैं इनसब बातों को इसलिये बता रहा हूं कि आज यह जरूरी है. ताकि आज का युवा समझ सके. जबसे मैं जानता हूं राँची में पहले एक ही केन्द्रीय सरना समिति हुआ करती थी जिसके अध्यक्ष श्री अजय लिंडा हुआ करते थे. तब भी विवाद हुआ था और अजय तिर्की कांटाटोली निवासी ने खुद को अलग करते हुए केन्द्रीय सरना समिति को NGO बनाकर रजिस्टर्ड संस्था बना लिया. बाद में केन्द्रीय सरना समिति के सचिव उमाचरण भगत ने मामले को सुलझाने का प्रयास किया. बता ते चलूं कि इस आपसी एकता को बचाये रखने में मुझे भी रखा गया. कई दौर की बैठकें हुई. उमाचरण भगत, अजय लिंडा और कई गणमान्य ने इसपर काम किया. पर मामला बना नहीं. आजसू ( ये आजसू नहीं) के कई सजग साथियों ने भी पहल की थी. लेकिन उस वक्त भी अजय तिर्की ने नहीं माना. हमलोग जानते थे कि कुछ ताकतें नहीं चाहती थी कि सरना धर्म के नाम पर आदिवासी जमा हों. बस यही तो चाहती थी तोड़क शक्तियां, और आज भी यह हो नहीं रहा कराया जा रहा है.
(सारे तथ्य सहीं है कहीं भी ९/६ नहीं आज जवानों को बताना जरूरी है)

रतन तिर्की झारखंड आंदोलन से जुड़े रहें हैं. यह लेख उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है.

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