Opinion

कोरोना को इस तरह परास्त कर रहा है आदिवासी जीवन का स्वावलंबी तरीका

 

  Ghanshyam

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आदिवासी जीवन मूल्य में प्रकृति के साथ सघन रिश्ता, पशुधन के साथ सांस्कृतिक संबंध और श्रम के साथ जीवंत लगाव का विशेष महत्व रहा है. तीनों के बीच अन्योन्याश्रय संबंध रहा है. और इन के समायोजन से ही निकलती है इनकी आजीविका.  मसलन भोजन-पानी, आवास को उदाहरण के रूप में लें. इसका विश्लेषण करें तो बात समझ में आ सकती है. आदिवासी भोजन का सीधा संबंध प्रकृति और श्रम से जुड़ा है. इनके भोजन में मोटे अनाज और वनोपज से प्राप्त साग-भागी का विशेष योगदान होता है. जिसमें कृत्रिम रासायनिक तत्वों की घुसपैठ नहीं होती. जबकि आज के सामान्य भोजन में रासायनिक तत्वों और जहरीले कीटनाशकों की भरमार रहती है. इन जहरीले पदार्थों और कीटनाशकों के कारण भोजन के अंदर की स्वाभाविक पौष्टिकता समाप्त-प्राय हो जाती है. वे मात्र पदार्थ भर रह जाते हैं. इतना ही नहीं अलग अलग बीमारियों के संवाहक भी बन जाते हैं.

 

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उदाहरण के तौर पर पंजाब को देखा जा सकता है. यह बात सभी जानते हैं कि वहां एक ट्रेन चलती है जिसको बोलचाल की भाषा में “कैंसर ट्रेन “कहते हैं. यानी उस ट्रेन पर सफर करने वाले लोग अधिकांशतः कैंसर के मरीज होते हैं. यह आधुनिक उन्नत कृषि की देन है. यह सच है कि पंजाब ने कृषि के क्षेत्र में बहुत तरक्की है. लेकिन उस तरक्की का क्या फायदा जब पीढियां ही सुरक्षित नहीं रह सके. इस दृष्टि से देखें तो आदिवासी इलाके आज भी बचे हुए हैं. या यों कहें कि बाजार की चकाचौंध से इनलोगों ने अपनी जमीन की सेहत, फसल की सेहत और अपनी सेहत को बचा कर रखा है.

 

सन् पैंसठ के दशक से अपने देश में एक जोरदार नारा उछाला गया- “ग्रो मोर फूड “का. इसके तहत अपने देश में पश्चिम और उत्तर के देशों की उन्नत खेती की नकल करने की पद्धतियां और तकनीक की घुसपैठ की शुरुआत हुई. ऐसा नहीं कि उस समय इसका विरोध नहीं हुआ था.उ ड़ीसा के कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर रिचारिया ने इसका पुरजोर विरोध किया था. वहीं तकनीक का विरोध करते हुए बंगाल के प्रसिद्ध इंजीनियर कपिल भट्टाचार्य ने पचास के दशक में ही डीवीसी जैसी बहुद्देश्यीय बड़े बांध की परियोजना को संभावित आपदाओं की जड़ बताया था. बावजूद इन विरोधों के देश के नीति नियंताओं ने पश्चिम और उत्तर के नक्शे कदम पर चलना ही बेहतर समझा.

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लेकिन अच्छी बात यह थी इन चकाचौंध से बहुत हद तक आदिवासी समुदायों ने अपने को बचाये रखा. आज भी अगर देखें इस कोरोना महामारी को तो यह बात दिखेगी कि देश के अधिकांश आदिवासी समुदाय और क्षेत्र को तो यह दिखेगा कि इस कोरोना महामारी से इसने अपने को बचा रखा है. उन आदिवासी क्षेत्रों में और कुछ वैसे आदिवासी समुदाय इसके चपेट जरूर आये हैं जिनका दैनंदिन संपर्क शहरों से रहा है.

 

जिन समुदायों की जीवनचर्या और जीवन पद्धति अभी भी परंपरागत है और जिनका भोजन अभी भी मोटे अनाज, सागभाजी और वनोपज पर निर्भर है वहां इस कोरोना महामारी की दाल नहीं गल रही है. क्योंकि आदिवासियों की इम्यून सिस्टम अभी भी अपेक्षाकृत अन्य समुदायों से मजबूत है तथा वहां की जलवायु दुरुस्त है. यही कारण है कि आदिवासी समुदाय बहुत हद तक अपने को बचाकर रख पाया है.

 

यहां संदेश बहुत साफ है कि कोरोना जैसा वायरस वहां ज्यादा हमला कर रहा है जहां की जीवन पद्धति और जीविका की सामग्री प्रकृति से विमुख हो गयी है या बना दी गयी है. या कहें कि जहां कृत्रिमता की भरमार हो गयी है. इसका मतलब साफ है कि जो मनाव समाज/समुदाय प्रकृति के जितना करीब रहेगा वह उतना ही कोरोना के कहर से अपने को बचा पायेगा.

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