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‘आदिवासी लोककथाएं न सौ फीसदी सच हैं न एकदम से झूठ’

  • राष्ट्रीय जनजातीय अखड़ा में आदिवासी लोक कथा और मिथक पर हुई चर्चा

Ranchi : डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान मोरहाबादी में आयोजित राष्ट्रीय जनजातीय अखड़ा में शनिवार को आदिवासी लोक कथा और मिथक पर चर्चा हुई. इसमें झारखंड के अलावा देश के अन्य राज्यों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे.

इस अवसर पर कर्नाटक के प्रतिनिधि डॉ शांता नायक ने आदिवासी लेखन और बंजारा जनजाति पर चर्चा की. डॉ शांता नायक ने कहा कि आदिवासियों को खुद अपने बारे में लिखना होगा. उन्होंने कहा कि रोमिला थापर ने कुछ हद तक अपने लेखन से न्याय किया लेकिन कई लेखकों और इतिहासकारों ने आदिवासियों के बारे में जो लिखा उसमें उन्होंने अपने नजरिए से लिखा.

डॉ शांता ने बंजारा जनजाति के बारे में लिखा कि राजस्थान की यह जनजाति पिछले चार-पांच सौ सालों में देश के अलग अलग हिस्सों में फैली.

दूसरे वक्ता सेंट्रल यूनिवर्सिटी के शिक्षक गुंजल इकिर मुंडा ने कहा कि आदिवासियों के इतिहास और मिथक की लोगों ने अपने-अपने तरीकों से व्याख्या की. झारखंड में मुंडा और असुर के संबंध में लोककथाएं है.

कहा जाता है कि असुर आदिम जनजाति जो दिन-रात लोहा गलाने का काम करती थी उनके काम से मुंडा नाराज हुए थे और उनके खिलाफ संघर्ष किया था. लोककथाएं और मिथक ना तो सौ फीसदी सच होते हैं और ना ही एकदम से झूठ. यह सच है कि असुर जनजाति लोहा गलाने और उसके औजार बनाने का काम करती है पर यह भी है कि झारखंड में जनजातियों के बीच कबीलाई संघर्ष कभी नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि अब इन बातों पर नये सिरे से शोध की जरूरत है.

सेंट्रल यूनिवर्सिटी की शिक्षिका डॉ मीनाक्षी मुंडा ने लोक कथा और आदिवासी जीवन दर्शन पर अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि जिस तरह से आदिवासियों की जीवन शैली है वैसा ही उनका जीवन दर्शन भी है. आदिवासियों के जीवन के केंद्र में पर्यावरण और प्रकृति शामिल है. हमारे ईश्वर हमसे अलग नहीं है वे हमारे साथ ही रहते हैं. आदिवासी जीवन दर्शन में कहा गया है कि प्रकृति का उतना ही दोहन करना चाहिए जितनी हमारी जरूरत है. उससे ज्यादा करने पर पर परेशानी बढ़ेगी.

इससे पूर्व संस्थान के निदेशक रणेंद्र और साहित्यकार महादेव टोप्पो ने भी अपने विचार रखें.

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