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पशुधन के सम्मान में आदिवासी समुदाय मनाते हैं सोहराय पर्व

संताल समुदाय का के त्यौहार का निर्धारण भी होता है सामूहिक निर्णय से

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Dumka: संताल समुदाय का सोहराय सबसे बड़ा पर्व है यह कार्तिक महीने मे नये फसल के साथ मनाया जाता है. यह पर्व किसी खास तारीख को नहीं मनाया जाता है. पर्व के पूर्व मंझी बाबा की ओर से गांव के सभी लोगों की बैठक बुलायी जाती है, और पर्व मनाने का निर्णय लिया जाता है. गांव में सभी के कुशल-मंगल होने पर सोहराय पर्व मनाने के लिए दिन तय की जाती है. निर्णय का अनुपालन करते हुए जोग मंझी गांव के सभी घरों में जा कर पर्व के दिन की सूचना देते हैं. जोग मांझी की सूचना के बाद ग्रामीण अपने-अपने रिश्तेदारों को सोहराय पर्व का न्योता देते हैं. इस पर्व में विशेषकर होपोन एरा (शादी-शुदा बेटियों) और मिसरा (शादी-शुदा बहनों) को बुलाया जाता है. पर्व में इनका खूब सेवा-सत्कार किया जाता है.

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क्या है पर्व की मान्यता

संताल के सरी धर्म गुरु बाबा सोमय किस्कू अनुसार सोहराय पर्व संताली कैलेंडर के अनुसार से ”सोहराय चांदू” (सोहराय महीने), कार्तिक महीने में मनाये जाने वाला पर्व है. लेकिन, कालान्तर में संताल हूल के कारण कई जगहों में सोहराय का पर्व जनवरी/फरवरी में मनाने का प्रचलन शुरू हो गया. जिस कारण लोगों में यह धारणा हो गयी कि संताल आदिवासी फसल के पकने के उपलक्ष्‍य में सोहराय मनाते हैं, जो सोहराय पर्व का सही व्याख्या नहीं है. वास्तविकता यह है कि सोहराय का पर्व पशु धन के सम्मान में मनाया जाने वाला पर्व है. इसके पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि संतालों का इष्ट देव ठाकुर और देवी ठकरन ने मानव जाति के भलाई के लिए पशु धन (गाय-बैल आदि) को पृथ्वी लोक में भेजा था, ताकि मनुष्य खेती-बाड़ी कर सके, दूध का सेवन कर सके और ठाकुर के नाम पूजा-पाठ करें. इसके बदले में मनुष्यों को गाय,बैल आदि की सेवा करना था और ठाकुर के नाम पूजा-पाठ करना था. लेकिन, समय के अनुसार कालान्तर में ऐसा नहीं हुआ और मनुष्य जाति पशु का शोषण/अत्यचार करने लगे और ठाकुर के नाम पूजा-पाठ भी नहीं करने लगे. जब पशु पर शोषण/अत्याचार अत्यधिक बढ़ गया तब पशु के प्रतिनिधि ”कपिल गय” (कपिल गाय) ने ठाकुर से शिकायत किया कि मानव जाति द्वारा हमलोगों (पशु) पर बहुत अत्याचार किया जा रहा है. इसलिए हम सभी पशु को शिरमा पूरी (स्वर्गलोक) में उठा लीजिये. उसपर ठकुर ने हामी भर दी. जब यह बात इष्ट देवी ठकरन को पता चला, तो उसने ठाकुर को कहा मनुष्य हमारे ही बच्चे है, अगर पशुओं को उपर शिरमा पूरी (स्वर्गलोक) में उठा लीजियेगा तो मानव जाति खत्म हो जाएगी. बिना पशु धन के मनुष्य खेती नहीं कर पायेगा. पीने के लिए दूध नहीं मिलेगी. ठकरन ने आगे कहा मै लिट्टह (मारंग बुरु) को बुलवाती हूं. वह सभी मनुष्य को समझा देंगे कि पशु पर अत्याचार न करें, पशुओं का सम्मान करें. लिट्टह (मारंग बुरु) ने सभी मनुष्यों को पशुओं का सम्मान करने के लिए समझाया और ठाकुर के नाम पूजा-पाठ करने को कहा. उसी समय से पशु के सम्मान में संताल आदिवासी पांच दिवसीय सोहराय का पर्व मनाने लगे. इस तरह सोहराय पशु धन के सम्मान में मनाया जाने वाला महा पर्व है.

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पर्व में मांझी बाबा गांव और समुदाय के खुशहाली के लिए करते हैं ठाकुर की वंदना

पर्व के मुख्य दिन गांव के मांझी बाबा के द्वारा सबों की  खैरियत का जायजा लिया जाता है और उसके बाद यह उपदेश देते हैं. ठाकुर की कृपा से सब-कुछ ठीक-ठाक होने के कारण ही हम आज सोहराय पर्व मना पा रहे हैं और मरांग दई (सोहराय-पर्व) हमारे पास आयी है. सभी पांच दिन पांच रातों तक नाच गान के जरिये खुशियां मनायें.

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संताल इलाके में सोहराय पर्व की धूम

पूरे संताल इलाके में सोहराय पर्व मनाया जा रहा है. दुमका के दिसोम मारंग बुरु युग जाहेर आखड़ा द्वारा ”सोहराय पर्व” के पावन अवसर में कुकुरतोपा गांव में सोहराय नाच-गान का आयोजन किया गया और ग्रामीणों को सोहराय पर्व के महत्व के बारे में बताया गया, यह कैसे शुरू हुई, इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यतायें हैं, इसके बारे में वि‍स्तृत जानकारि‍यां दी गयी. इस मौके में लिलमुनी हेम्ब्रोम, जोबा हांसदा, सुनिता टुडू, मिनी मरांडी, मर्शिला हेम्ब्रोम, बालेश्वर टुडू, मंगल मुर्मू, लोरेन मुर्मू, विलियम मुर्मू, मोनिका हांसदा, एलिजाबेथ हेम्ब्रोम,रासमती किस्कू,जोबा टुडू, सुकुरमुनि मुर्मू, मिरुनी किस्कू, रुथ मरांडी के साथ काफी संख्या में महिला और पुरुष उपस्थित थे.

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