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एचईसी विस्थापितों को लेकर जनजाति आयोग की अनुशंसा ठंडे बस्ते में, विस्थापितों ने कहा, आदिवासियों का हक छीना जा रहा है

Ranchi : झारखंड की नयी विधानसभा लगभग बन कर तैयार है. राज्य सरकार ने घोषणा की है कि नये विधानसभा परिसर में विशेष सत्र चुनाव से पहले बुलायेगी. वहीं दूसरी ओर जिस भूमि पर विधानसभा परिसर का निर्माण हुआ है, वह जमीन एचईसी के लिए 1960 में अधिग्रहित की गयी थी,  लेकिन उस जमीन से विस्थापित परिवारों को जिन गांवों में बसाया गया,  उक्त जमीन की ऑनरशिप अब तक विस्थापितों को नही दी गयी है. .

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष  रामेश्वर उरांव ने 10-11 सितंबर,  2016 को  एचइसी विस्थापितो की समस्या को लेकर लबेद,नया सराय,आनी,संतरंजी, लालखटंगा,नचियातू और चेटे गांव का दौरा किया था. रामेश्वर उरांव ने मूल विस्थापितों की जीवन दशा का अवलोकन कर झारखंड सरकार से उनके हित में कई कार्य करने की अनुशंसा की थी.

मुख्य सचिव झारखंड सरकार,उपायुक्त रांची को पत्र लिख कर अनुशंसा को लागू करने की बात कही थी. बता दें कि आयोग की अनुशंसा के तीन साल होने को है, लेकिन अनुशंसा  को लेकर राज्य सरकार ने किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं की.   विस्थापित इसे बहुमत वाली सरकार के द्वारा उनका हक छीनने की तरह मान रहे हैं.

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 एचईसी विस्थापितों को लेकर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने क्या कहा था

रांची जिले  के भू-अर्जन अधिकारी सभी ग्रामों के विस्थापितों का नाम,  अर्जित की गयी भूमि का रकबा, तथा उन्हें दिये गये मुआवजे का डाटाबेस तैयार कर उसे सार्वजनिक करें.  सभी संबंधित अंचल अधिकारी पुनर्वास ग्रामों में कैंप लगाकर रजिस्टर्ड टू में संबंधित विस्थापित और उनके परिजनों का नाम दर्ज कर रसीद निर्गत करें. नचियातू ,तिरल और अन्य ग्रामों में वन भूमि पर बसाये गये विस्थापितों को वन अधिकार अधिनियम के प्रावधान के अनुरूप अधिकार पत्र दिये जायों. ग्राम लावेद में भू अर्जन के संबंध में स्थिति स्पष्ट की जाये.

लावेद गांव में भू अर्जन किया गया है या नहीं , यदि किया गया है तो कब,  कितनी भूमि ली गयी है. साथ ही किन लोगों को भूमि अर्जित की गयी है. अगर अब तक भू-अर्जन नहीं किया गया ह तो वे नये अधिनियम के अनुसार मुआवजा पाने के पात्र हैं. जो भूमि अर्जित नहीं की गयी  है उसके संबंध में भू-स्वामियों की स्थिति स्पष्ट की जाये .क्योंकि अर्जित की गयी भूमि पर एचईसी अथवा उन संस्थानों का कोई अधिकार नहीं है,  जिसे एचएससी ने लीज पर दिया है.

क्या कहते हैं एचईसी विस्थापित

एचईसी हटिया विस्थापित परिवार समिति से जुड़े राहुल उरांव कहते हैं कि  बहुमत वाली सरकार ने एचईसी के विस्थापित मूल रैयतों के हित का कभी ख्याल नहीं रखा. नया विधानसभा परिसर विस्थापितों की जमीन पर बना है.  राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की अनुशंसा को भी राज्य सरकार ने नहीं माना. राज्य सरकार ने आदिवासियों का हक मारने का काम किया है. आज तक एचईसी से विस्थापित हुए परिवारों को जिस भूमि पर बसाया गया है,  उस भूमि का मालिकाना हक नहीं मिला.

झारखंड के आदिवासी विधायक, सांसद  खामोश हैं: रतन तिर्की

एचईसी विस्थापित और टीएससी सदस्य रतन तिर्की कहते हैं कि झारखंड के 28 आदिवासी विधायक, पांच सांसद एवं अन्य झारखंडी विधायक पूरी तरह खामोश हैं. वे आदिवासियों की हक और अधिकार के सामने आने से डरते हैं.  ये आदिवासी सीटों से चुनाव जीते हैं. इनकी खामोशी ने राज्य में आदिवासियों के अस्तित्व को संकट में ला दिया है. झारखंड में विस्थापन गंभीर समस्या रही है,  लेकिन विस्थापितों के हितों और अधिकारों के लिए विधानसभा से लेकर टीएससी में कभी चर्चा नहीं की गयी. यह राज्य एवं आदिवासियों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है

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