Opinion

पेसा के तहत संचालित आदिवासी व परंपरागत ग्रामसभाएं इस तरह सक्षम हैं कोरोना से लड़ाई लड़ने में

Ghanshyam : पिछले चार दशक से “डिपनिंग डेमोक्रेसी”जैसा खूबसूरत शब्द भारतीय राजनीति में तेजी से चल पड़ा है. वैसे इस शब्द को भारतीय राजनीति में लाने का श्रेय लोकनायक जयप्रकाश नारायण को है.

पचास के दशक में जयप्रकाश जी ने “राजनीतिक दल और दलीय राजनीति” से सन्यास ले लिया था. और छठे दशक आते आते उन्होंने दल विहीन जनतंत्र (पार्टी लेश डेमोक्रेसी ) की परिकल्पना को दुनिया के सामने रखा. तब डॉक्टर रामनोहर लोहिया से लेकर राजनीति के बड़े बड़े विचारकों ने उनकी खूब आलोचना की. इन आलोचनाओं के

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जवाब में जयप्रकाश जी ने एक किताब लिखी .उस किताब का शीर्षक है : ” Reconstruction of Indian Polity ” (हिन्दी में उसका शीर्षक दिया गया भारतीय राज्य व्यवस्था का पुनर्निर्माण.).
हमें लगता है कि इस किताब को उन सभी कार्यकर्ताओं और लोगों को जरूरत पढ़ना चाहिए जो भारत में बुनियादी जनतंत्र की स्थापना के लिए संकल्पित हैं.

इस पुस्तक में जयप्रकाश जी की मूल स्थापना है कि वर्तमान लोकतंत्र उल्टा पीरामिड की तरह है. इसे सीधा करना होगा. और इस सीधा करने की अवधारणा के तहत ही उन्होंने ” डिपनिंग डेमोक्रेसी”की बात कही. यानी सत्ता का नियामक जबतक गांव नहीं होगा तब लोकतंत्र के इस पीरामिड को सीधा नहीं किया जा सकता है. इसी के तहत सशक्त ग्राम सभा की परिकल्पना सामने आई.

और उन्होंने “ग्रामीकरण “(रुरलाइजेशन ) को भारत की समृद्धि का आधार स्तंभ बतलाया.आज जब हमसब गंभीरता से विचार करते हैं तब लगता है कि जेपी के उक्त विचार आज ज्यादा प्रासंगिक हैं.खासकर के इस कोरोना महामारी – काल में.

उक्त डिपनिंग डेमोक्रेसी और हमारे आदिवासी परंपरागत समाज में बहुत ही गहरा रिश्ता है. इन रिश्तों को बाद के दिनों में देश के जानेमाने विद्वान और भारत सरकार के एस टी,एससी कमिश्नर डॉक्टर बीडी शर्मा ने समझा और इसे समझकर पंचायत राज कानून के तहत पेसा (पंचायत राज एक्सटेंशन टु सिड्यूल एरिया एक्ट )बनवाया. यह सन् ’96 की बात है. इस कानून की खूबी यही है कि इसमें परंपरागत व्यवस्था के नियंत्रण में आधुनिक पंयायत को आकार दिया गया है. संरचना खड़ी की गई है.

पेसा कानून क्या है?

जैसा की ऊपर बताया गया है कि पेसा कानून फिफ्थ सिड्यूल इलाकों में पंचायत राज का विस्तार अधिनियम है. यहां यह समझना जरूरी है कि फिफ्थ शिड्यूल किसे कहते हैं? वास्तव में इसका संबंध भारत के संविधान से है.हमसब जानते हैं कि भारत का संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा का गठन किया गया था. इसमें विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं के लगभग तीन सौ सदस्य थे. इसी सभा में झारखंड के प्रतिनिधि थे. मारांगोमके जयपाल सिंह मुंडा.उनकी बहस के बाद संविधान में पांचवी अनुसूची और छठी अनुसूची का प्रावधान रखा गया. (हरेक परिवर्तनकामी लोगों का यह कर्तव्य है कि इन दोनों अनुसूची को उनसबों पढ़ना, जानना और समझना चाहिए.)

पांचवीं अनुसूची उन इलाकों में लागू हुई जिन प्रखंडों और जिलों में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या पचास प्रतिशत से अधिक है. वर्तमान झारखंड का लगभग आधा क्षेत्र पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र में आता है. पेसा कानून इन्हीं क्षेत्रों में लागू है. बाकी क्षेत्र को सामान्य क्षेत्रों का दर्जा प्राप्त है. जैसे दुमका अनुसूचित क्षेत्र है लेकिन देवघर सामान्य क्षेत्र.

पेसा कानून के तहत प्रत्येक गांव में (टोला और बसाहट में) जहां परंपरागत आदिवासी व्यवस्था लागू है वहां की ग्रामसभा परंपरागत रीतिरिवाजों से संचालित होगी. और ग्राम की अध्यक्षता उस गांव के परंपरागत मुख्य व्यक्ति करेंगे. हालांकि इस कानून के रुल्स अभी झारखंड में नहीं बने हैं (जो कानून बनने के साल भर के अंदर ही बन जाने चाहिए थे. और अगर किन्हीं कारणों से रुल्स नहीं बनते हैं तो वहां केंद्रीय कानून स्वतः लागू हो जाता है.). बावजूद इसके समय समय पर मोटा (मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल एफेयर्स ) के गाइडलाइंस के आधार पर यह संचालित होता रहता है.

इस लिए गांव में कार्यरत हरेक कार्यकर्ता को इस कानून से अवगत होना चाहिए. यह कानून अगर सही से लागू हो जाए तो डेमोक्रेसी को डिपन किया जा सकता है. और लोकतंत्र के उल्टा पीरामिड को सीधा किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र के सभी राज्यों में केन्द्रीय कानून के अनुरूप रुल्स (नियमावली )बने. इतना ही नहीं अन्य सामान्य क्षेत्रों में भी ग्राम सभाओं का गठन पेसा कानून के अनुरूप (यानी टोला और बसाहट में ग्राम सभा )हो. तभी उल्टा पिरामिड को सीधा किया जा सकता है और वास्तविक स्वशासी जनतंत्र की स्थापना हो सकती है.

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