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Unlock-1 : पटरी पर आई ट्रेन, पर 30 कुलियों की जिंदगी अब भी है ‘Lock’

Ranchi: रेल के भरोसे जीनेवाले कुलियों ( porters ) का जीवन तीन महीने से बदरंग है. दूसरों का बोझा उठाकर अपनी जिंदगी चलाने वालों के लिए अभी एक-एक दिन भारी पड़ रहा है. कोरोना महामारी ( Coronavirus ) के कारण लगभग 2 महीने से लॉकडाउन ( Corona Lockdown ) चल रहा है. यह अब अनलॉक होने लगा है. एक जून से रांची डिवीजन में गाड़ियां ( Indian Railway ) पटरी पर आ चुकी हैं.

राजधानी सहित जनशताब्दी गाड़ियां ट्रैक पर दौड़ने लगी हैं, पर डिवीजन के लगभग 30 कुलियों की जिंदगी अब भी बेपटरी है. पेट की आग बुझाने को रांची और हटिया स्टेशन में कुल 4 कुली ही रह गए हैं. इन्हें छोड़कर सभी अपने अपने गांवों को लौट चुके हैं. जब तक स्टेशनों की रंगत नहीं लौटेगी, उनकी उम्मीदें नहीं लौटने वाली.

कमाते थे हर दिन 500 रुपये, अभी 1 टके पर भी आफत

रांची डिवीजन में हटिया, रांची और मुरी, ये तीन बड़े स्टेशनों में हैं. हटिया स्टेशन पर 15 वर्ष की उम्र से काम कर रहे पुलिस महतो कहते हैं कि अभी अपना ही जीवन बोझ हो गया है. लॉक डाउन से पहले हर दिन 500 रुपये तक की कमाई थी. कोरोना ने सारे पैसे ही खा लिये. मार्च से अभी तक एक भी पैसे की कमाई नहीं हुई.

 

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उन्होंने बताया कि हटिया स्टेशन पर कुलियों के लिए टहरने को एक रुम है. इसी में रहना, सोना हो रहा है. किसी किसी के सहयोग के भरोसे दिन कट रहा है. कुलीगिरी करके दो बेटियों की शादी की थी. महीने में 7-8 हजार रुपये घर परिवार को भेजते थे. अभी सब बंद है. दो बेटे हैं. एक दिल्ली में और एक रांची में रहकर काम करता है. पर लॉकडाउन की मार में वे भी बेकार हो गए.

छपरा में घर पर पत्नी, दो पुतोहू, आठ पोता-पोती हैं. गांव के सहयोग के भरोसे किसी तरह दाना पानी हो रहा है. हटिया स्टेशन में 9 कुली काम करते हैं. 5 लोग किराये पर अपने परिवार को रखकर गुजर बसर कर रहे थे. लंबे खींचते लॉकडाउन के कारण दुकानदारों से किराने का सामान उधारी मिलना भी बंद हो गया. ऐसे में वे सभी गांवों को भाग निकले हैं. दिनभर में 30-35 गाडियां हटिया स्टेशन पर आती जाती थीं. अभी केवल श्रमिक स्पेशल ट्रेनें आती हैं. इससे एक रुपये का भी लाभ नहीं.

 

राजधानी ट्रेन से भी कोई राहत नहीं

रांची स्टेशन पर कुलियों के रेस्ट हाउस में रहते हैं ललन तांती. गांव जमुई, बिहार में है. लगभग 12 सालों से कुली का काम करके परिवार का गुजर बसर करते आ रहे हैं. कहते हैं कि रांची हटिया में 28 रजिस्टर्ड कुली साथी हैं. हर दिन 300 से 500 की कमाई सबों की होती थी. लॉकडाउन में ट्रेनें भी बंद हो गई. भारतीय रेलवे के इतिहास में शायद ही कभी ट्रेनों को बंद किया गया होगा.

 

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एक मई से जब ट्रेनें हटिया रांची को आने लगीं तो उम्मीदें बंधी कि अब जीवन भी पटरी पर लौटेगा, पर कोरोना संकट के कारण ऐसा हुआ नहीं. एक जून से जनशताब्दी ट्रेन पटना और हावड़ा को जा रही है. राजधानी एक्सप्रेस भी चलने लगी है पर इससे कोई राहत नहीं बनी है. पहले राजधानी से ही अच्छी कमाई हो जाती थी. कुलियों का संघ रहता तो हम रेलवे और केंद्र सरकार से रियायत भी तरीके से मांग पाते. जब तक लॉकडाउन वास्तविक रूप से नहीं खुलेगा, राहत के रास्ते भी नहीं खुलेंगे.

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