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आज फिर बंटेंगी नौकरियां, पिछले साल भी बंटी थीं, तब कई युवाओं को नौकरी की जगह मिला था धोखा

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  • 2018 में जिन युवाओं को मिली थी नौकरी, सरकार ने उनकी नहीं ली कभी सुध
  • तब नौकरी पानेवाले कई युवाओं ने कहा- नौकरी के नाम पर हमें बेवकूफ बनाया गया

Ranchi : राज्य सरकार बड़े ही धूमधाम से रोजगार मेला का आयोजन कर रही है. मेला लगाकर नौजवानों का चयन विभिन्न कंपनियों के लिए किया जा रहा है. गुरुवार को लाखों रुपये खर्च कर स्किल समिट कार्यक्रम का आयोजन हो रहा. घोषणा के मुताबिक, जिसमें एक लाख युवाओं को नौकरी का ऑफर लेटर दिया जायेगा. लेकिन, विडंबना है कि जिन नौजवानों को 2017 के रोजगार मेला में नौकरी दी गयी थी, उनकी स्थिति को जानने का किसी ने प्रयास नहीं किया. न तो सरकार ने और न ही सरकार के आला अधिकारी ने ही कभी इसमें रुचि दिखायी. न्यूज विंग ने बाहर नौकरी करने गये युवाओं की पीड़ा जानने का प्रयास किया. इसमें कई चौंकानेवाले तथ्य सामने आये. जिन युवाओं को रोजगार मेले में राज्य से बाहर नौकरी दी गयी थी, उनमें से अधिकतर युवा नौकरी छोड़कर वापस आ चुके हैं. जो नौकरी कर रहे हैं, उनका भी यही कहना है कि वे मजबूरी में काम कर रहे हैं. गुजरात के जेबीएम कंपनी में नौकरी कर रहे राहुल सिंह राजपूत ने बताया कि जब रांची से लाया गया था, तो बड़े-बड़े सपने दिखाये गये थे, लेकिन यहां लाकर हमसे हेल्पर और ट्रॉली खिंचवाने का काम कराया गया. राहुल ने बताया कि उन्होंने साढ़े तीन लाख रुपये खर्च कर आंध्रप्रदेश के कॉलेज से डिप्लोमा किया था, जिसके बदले उन्हें 8700 रुपये में ट्रॉली मैन की नौकरी दी गयी. आर्थिक मजबूरी के कारण वापस घर भी नहीं जा सकते. राहुल जैसे अन्य कई युवा हैं, जो ऐसी ही बदहाली वाला जीवन जी रहे हैं. राज्य सरकार ने कभी इन युवाओं की स्थिति को जानने का प्रयास तक नहीं किया और एक बार फिर से स्किल समिट में युवाओं को रोजगार देने की बात कही जा रही.

कोई दो, कोई तीन, तो कोई पांच महीने काम कर लौट आया

जनवरी 2018 में खेलगांव में रोजगार मेला लगाया गया था. उसमे लगभग 27 हजार युवक-युवतियों को नौकरी दिये जाने का सरकार ने दावा किया. मेले में आयी कंपनियों ने अधिकतर युवाओं को रांची और झारखंड से बाहर के लिए हायर किया था. ज्यादातर युवा दो, तीन, चार और पांच महीने काम करने के बाद लौट आये. आज वे रांची में ही छोटी-मोटी नौकरी रहे हैं. कांके के रहनेवाले रवि रजक ने बताया कि गुजरात की एक कंपनी में नौकरी दी गयी थी, जहां प्रोडक्शन का काम था. यहां से बोलकर ले गये कि महीने में सैलेरी दी जायेगी, लेकिन वहां ले जाने के बाद डेली वेजेज पर रखा गया. जो जितना काम करेगा, उसे उतना पैसा दिया जायेगा. पैसे देने में भी देरी करते थे और 12 घंटे काम कराया जाता था. इससे गुजारा नहीं हो सका और पांच महीने काम करने के बाद वह लौट आये. रवि की ही तरह सुरेंद्र भी दो महीने में कंपनी छोड़कर रांची आ गये, विकास पांच महीने काम कर लौट आये. सुनील तीन महीने काम कर लौट आये. वहीं, जो युवक वहां काम कर रहे हैं, वे भी लौटना चाहते हैं.

मुंबई में 7000 रुपये में काम कर रहे हैं गोविंद

रांची के रहनेवाले गोविंद कुमार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है. बीते साल लगे रोजगार मेले में वह नौकरी की आस में गये थे. उन्हें नौकरी मिली भी, लेकिन जैसा बोला गया, वैसा काम नहीं मिला. गोविंद से फोन पर बात करने पर उन्होंने बताया कि वह मुंबई की इम्पीरियल कंपनी में काम कर रहे हैं, जहां उन्हें मात्र 7000 रुपये मासिक वेतन दिया जाता है. वह वापस आना चाहते हैं, लेकिन विवश हैं. गोविंद ने कहा, “कम से कम अभी कुछ काम तो कर रहे हैं, रांची आने के बाद कोई गारंटी नहीं है कि काम मिलेगा या नहीं.” इसी प्रकार बेड़ो के  सूरज, बुढ़मू के विजय, बिजूपाड़ा के सूरज, बिट्टू, गोपाल, अजय, विमल व कई अन्य युवा हैं, जिनका कहना है कि उनके साथ धोखा हुआ है. इन युवाओं का कहना है कि नौकरी के नाम पर उन्हें बेवकूफ बनाया गया.

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