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गैंगस्टर्स को पालने और अफसरों को मैनेज करने के लिए कोल ट्रांसपोर्टरों को कहां से आता है पैसा

Ranchi: अब तक आपने पढ़ा, गैंगस्टर अमन कोल ट्रांसपोर्टरों से न सिर्फ रंगदारी वसूलता है, बल्कि ट्रांसपोर्टरों के लिए काम भी करता है. अग्रवाल सरनेम वाले ट्रांसपोर्टर के कहने पर दूसरे ट्रांसपोर्टरों को रंगदारी के बहाने धमकी देता है. और पुलिस कार्रवाई नहीं करती. पर, क्यों.

क्योंकि पुलिस के अफसर भी दलालों के जरिये मैनेज हो जाते हैं. पर, कैसे. जवाब है, इन सबके लिए बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है, कोल ट्रांसपोर्टरों को. और यह राशि कहां से आता है. कोयला खरीदने वाली कंपनियों से मिलने वाले कमीशन से यह संभव नहीं है.

गैंगस्टर्स को पालने और पुलिस के अफसरों को मैनेज करने के लिए कोल ट्रांसपोर्टर कोयला के साथ बड़ा खेल करता है. खेल रेलवे साइडिंग पर होता है. वह खेल है पावर कंपनियों को भेजे जाने वाले कोयले में डस्ट मिलाने का. एक रैक में 4000 टन कोयला लोड होता है. उसमें 500 से 1000 टन डस्ट मिला दिया जाता है.

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प्रति रैक होती है 20 लाख की अवैध कमायी

बाजार में कोयले की कीमत 5000 से 6000 रुपया प्रति टन है. डस्ट 1000-1200 रुपये प्रति टन के हिसाब से मिल जाता है. इस तरह प्रति टन 4000 से 5000 रुपये की बचत कर ली जाती है. अगर एक रैक में मिनिमम 500 टन डस्ट भी मिला दिया गया, तो ट्रांसपोर्टर के फायदे का अंदाजा लगा सकते हैं.

कम से कम प्रति रैक 20 लाख की अवैध कमायी. पावर कंपनियों से मिलने वाला प्रति टन के हिसाब से कमीशन अलग से. और वह 500 टन कोयला अवैध तरीके से ईंट-भट्ठों में या बाहर के मंडियों तक पहुंचा दिया जाता है. यह काम साहू सरनेम वाला कोयला कारोबारी करता है.

एक-एक रैक में इतनी बड़ी रकम की आमदनी हो, तब कोई ट्रांसपोर्टर क्यों नहीं अपराधियों को मैनेज करने में सफल हो जायेगा. कयों नहीं अपने साथ 4-6 सरकारी अंगरक्षक को लेकर चलने में सफल हो जायेगा.

हां, गैंगस्टर्स को यह विश्वास दिलाना होता है कि कुछ भी हो उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी. और यह काम पुलिस अफसरों के लिए वसूली करने वाला आदमी आसानी से करवा देता है.

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शिकायत पर पुलिस झाड़ लेती है पल्ला

स्थानीय पुलिस यह कह कर पल्ला झाड़ लेती है कि कोयला सीसीएल का, साइडिंग रेलवे का, खरीददार पावर कंपनियां. लिहाजा उसे कोई मतलब नहीं. पर, यह तो आधा सच है.

स्थानीय पुलिस की मिलिभगत के बिना कोल साइडिंग तक डस्ट पहुंचाने की हिम्मत किसी भी कोल कारोबारी में नहीं है. एक सच यह भी है कि लातेहार से लेकर धनबाद तक यह काम खूब जोर-शोर से चल रहा है.

रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ) और सीसीएल के पास भी अपने तर्क हैं. सीसीएल का कहना है उसे सिर्फ इस बात से मतलब है कि उसके माइंस से कोयला निकला और उसके कांटा घर से चलान के मुताबिक सही वजन होकर जाये.

बीच रास्ते में क्या होता है, यह देखना रेलवे का काम है. रेलवे और सीसीएल सेंट्रल गोवर्नमेंट का है. सीबीआई का कार्यक्षेत्र है. पर, उसे इन कामों में दिलचस्पी ही नहीं. बाकी काम संबंधित पावर कंपनियों को क्वालिटी कंट्रोल यूनिट कर देता है. वह रैक से आने वाले कोयला को अच्छी क्वालिटी का कोयला बता देता है. बदले में वहां भी कुछ अवैध कमायी हो जाती है.

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