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बालश्रम को रोकने के लिए हमें गरीबी से निजात पानी होगी : मुख्यमंत्री

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Ranchi : नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी द्वारा स्थापित कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और झारखंड सरकार ने अभ्रक खदानों को बालश्रममुक्त बनाने के लिए हाथ मिलाया है. इस अवसर पर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा, “साल 2001 में जब मैं श्रम मंत्री था, तब मैंने खुद बालश्रम रोकने के लिए रांची में छापे मारे थे, जिसमें कई बच्चों को मुक्त कराया गया था.” उन्होंने कहा बालश्रम को रोकने के लिए हमें गरीबी से निजात पानी होगी. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ही इस समस्या का समाधान है. हमारी सरकार 18 साल तक के सभी बच्चों को अनिवार्य और सुलभ शिक्षा मुहैया कराने के लिए जल्दी ही एक नया कानून बनायेगी. प्लेसमेंट एंजेसी की कार्यप्रणाली भी एक चिंता का विषय है.

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सीएम ने माना प्लेसमेंट एजेंसियां कर रही हैं बच्चों का शोषण

मुख्यमंत्री ने यह स्वीकार करते हुए कहा कि प्लेसमेंट एजेंसियां झारखंड से बच्चों को ले जाकर अन्य शहरों में बेच रही हैं और उनका शारीरिक शोषण भी किया जा रहा है. ह्यूमन ट्रैफिकिंग बिल लोकसभा में पारित हो चुका है और हमें उम्मीद है कि जल्दी ही यह राज्यसभा से भी पारित हो जायेगा. इस बिल के पास होने से बच्चों की ट्रैफिकिंग पर निश्चित ही लगाम लगेगी. फाउंडेशन झारखंड के हर एक गांव में बाल पंचायत की स्थापना करे. रघुवर दास ने इस अवसर पर झारखंड के हर बाल मित्र ग्राम कार्यकर्ता को पुरस्कार स्वरूप 500 रुपये की सम्मान राशि देने का एलान किया. उन्होंने बाल मजदूरी को रोकने के लिए शिक्षा पर जोर दिया.

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हमने झारखंड के 126 गांवों को बालश्रममुक्त बना दिया है : कैलाश सत्यार्थी

इस अवसर पर नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने राज्य सरकार और आयोग के साथ साझेदारी को एक अच्छी पहल बताते हुए कहा, “हमने झारखंड के 126 गांवों को बालश्रममुक्त बना दिया है. इन गांवों के 50 हजार बच्चे बाल मजदूरी की बजाय स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं. लेकिन, अभी भी अभ्रक खनन क्षेत्र के ऐसे 500 गांव हैं, जहां हजारों बच्चों का बचपन असुरक्षित है. बाल मित्र गांव के हमारे सफल मॉडल ने यह साबित कर दिया है कि अगर गांवों में सरकार की शिक्षा और अन्य योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू कर दिया जाये, तो वहां सभी बच्चे न केवल स्कूल में पढ़ाई करेंगे, बल्कि बाल दुर्व्यापार (ट्रैफिकिंग) और बाल विवाह जैसी बुराई पर भी रोक संभव है. झारखंड सरकार, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और सिविल सोसायटी संस्थाओं के सहयोग से हम झारखंड को एक ऐसा मॉडल राज्य बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जहां का सामुदायिक विकास बच्चों के अनुकूल होगा और इस मॉडल को दुनिया के अन्य देशों में भी लागू किया जा सके.”

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अभ्रक पाने के लिए करनी पड़ती है गहरी खुदाई

अभ्रक निकालने के लिए चट्टानों में गहरी खुदाई करनी पड़ती है और इसके लिए मशीनें और औजार इस्तेमाल होते हैं. कच्चे अभ्रक की चुगाई से लेकर इसकी खुदाई के विभिन्न चरणों में बाल मजदूरों का इस्तेमाल होता है. बाल मजदूरी की वजह से बच्चे स्कूल नहीं जाते या फिर बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं. खनिज संपदा से लैस झारखंड की यह विडंबना है कि लोग अपने बच्चों से खदानों में काम कराने के लिए मजबूर होते हैं. अभ्रक का इस्तेमाल सौंदर्य प्रसाधनों, मोटर वाहनों के लिए पेंट बनाने और विद्युत उपकरणों के निर्माण में किया जाता है. फाउंडेशन, आयोग और झारखंड सरकार तीनों मिलकर गावों को बच्चों के अनुकूल बनाने यानी बाल मित्र ग्राम के निर्माण, अभ्रक खदान क्षेत्र में बच्चों की सुरक्षा और इसके सप्लाई चेन को बालश्रममुक्त बनाने के लिए काम करेंगे.

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