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जबेदा को नागरिकता प्रमाणित करने के लिए और कितनी अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा   

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Krishnakant

जबेदा बेगम की कहानी बताती है कि एक महिला अपनी नागरिकता प्रमाणित करने के लिए क्या-क्या तकलीफ उठाती है. बावजूद वह नागरिकता साबित नहीं कर पाती. यह कहानी सिर्फ उसकी नहीं है. असम में 19 लाख में कई कहानियां इसी तरह की हैं, जहां एक ही परिवार के कुछ लोग नागरिकता सूची में हैं और कुछ बाहर.

यह मार्मिक कहानी बहुत कुछ कहती है कि आखिर असम में हकीकत क्या है और लोग किस तरह परेशान हैं. पत्रकार कृष्णकांत ने विस्तार से इसपर अपनी पोस्ट में लिखा है.

पत्रकार कृष्णकांत के अनुसार, जबेदा बेगम 15 दस्तावेज देकर भी अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पायीं. पैन कार्ड, बैंक अकाउंट, भू-राजस्व रसीद, 1966 से 2015 तक की वोटर लिस्ट में बाप का नाम, मां का नाम, दादा का नाम, दादी का नाम, गांव के मुखिया के द्वारा बनाये गये प्रमाण पत्र इत्यादि. गुवाहाटी हाईकोर्ट ने जबेदा बेगम का दावा खारिज कर दिया.

हाईकोर्ट ने कहा है कि पैन कार्ड, वोटर लिस्ट में नाम, मुखिया का प्रमाण पत्र ये साबित नहीं करते कि जबेदा बेगम उन्हीं मां बाप की बेटी हैं, जिन्हें अपना मां-बाप बता रही हैं.

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जबेदा बेगम के भाई और बहन जिंदा हैं, प्रमाण पत्र देने वाला मुखिया भी जिंदा है. मुखिया ट्रिब्यूनल के सामने गवाही भी दे आया है कि ये फलाने की बेटी हैं और फलाने से शादी हुई है. तब भी जबेदा विदेशी घोषित कर दी गयी हैं.

जबेदा बेगम ने ट्रिब्यूनल के सामने अपने पिता जबेद अली से 1966, 1970, 1971 की मतदाता सूचियों को पेश किया, जिसमें उनका नाम था. अगर नाम था तो जाहिर है कि 1966 में जाबेद अली भारत में मौजूद थे, लेकिन ट्रिब्यूनल का कहना है कि जबेदा अपने पिता के साथ उनके लिंक के संतोषजनक सबूत पेश नहीं कर पायी.

इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर पढ़ी थी, दिन में और कुछ जगह यह खबर देखी और सोचता रहा कि कोई यह कैसे साबित करेगा कि वह अपने बाप का ही बेटा है. क्या जज साहब को साबित करना हो तो कर पाएंगे? मेरे ख्याल से मैं तो नहीं कर पाऊंगा.

अपने बाप का बच्चा साबित करने के लिए वह कौन सा दस्तावेज है, जिसकी भारत में जरूरत आन पड़ी है और जो आजतक इस दुनिया में बना ही नहीं? अगर जबेदा बेगम और उनके शौहर का लैंड रिकॉर्ड, वोटर लिस्ट, पैन, बैंक डिटेल्स आदि नागरिकता का आधार नहीं हैं, जिंदा लोगों की गवाही सबूत नहीं है, तो कौन सा कोहिनूर लोग पेश कर देंगे. जिसके आधार पर उन्हें नागरिक मान लिया जाएगा?

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अगर 15 दस्तावेज पेश करके भी कोई अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पा रहा है, तो क्या भारत के प्रधानमंत्री अपने माता-पिता से अपना संबंध साबित कर पाएंगे? किस आधार पर? वह कौन सा कागज होगा?

जबेदा बेगम 50 साल की हैं. उन्होंने खेत बेचकर ट्रिब्यूनल में और हाइकोर्ट में केस लड़ा. अब उनके पास खाने तक को पैसे नहीं हैं. जबेदा 150 रुपये रोज पर दिहाड़ी मजदूरी करती हैं और बीमार पति समेत पूरा परिवार पालती हैं. तीन बेटियां हैं, जिनमें एक बेटी लापता है, दूसरी की बीमारी से मौत  हो चुकी है, तीसरी अभी 5 साल की है.

जबेदा बेगम जितना भी रो लें, नागरिकता साबित करने के लिए आंसुओं की बाढ़ पर कोई विचार नहीं होगा. उनके पिता को ब्रम्हपुत्र की बाढ़ में विस्थापित होना पड़ा था, उस पर भी कहां विचार किया गया.

आप जबेदा को विदेशी कहकर फांसी दे दीजिए, लेकिन मैं सोच रहा हूं कि ऐसे बेसहारा और मजबूर लोगों को खून के आंसू रुलाकर भारत जैसे शक्तिशाली देश को क्या हासिल होगा? कौन हिंदू है, जो भारत देश को ऐसा क्रूर साम्राज्य बनाना चाहता है और जिसे खुश करने के लिए यह कानून लाया गया है?

असम में जबेदा जैसे 19 लाख लोग एनआरसी से बाहर हैं और इनमें 15 लाख हिंदू भी हैं, क्या हम अपने हाथों से अपनी कब्र खोद रहे हैं?

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