Opinion

देश में बाघ सुरक्षित लेकिन बेटियों का क्या…

Priyanka

सोशल मीडिया का जमाना है. एक-दूसरे को हम अक्सर जोक्स, फोटोज भेजते रहते हैं. मेरे व्हाट्सऐप्प पर एक दिन पहले ऐसे ही किसी दोस्त ने एक फोटो भेजी. फोटो ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया.

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तस्वीर आज के तथाकथित सभ्य समाज और सरकार की लापरवाह रवैये की सच्चाई उजागर करने के लिए भी काफी थी. आप भी सोच रहे होंगे कि तस्वीर में ऐसा क्या था.

उस फोटो में एक बच्ची, बाघ के आगे हाथ जोड़े खड़ी है, और कहती है कि मुझे अपने अंदर छिपा लो. बैंकग्राउंड में पीएम मोदी का वो बयान था, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत बाघों के लिए सबसे सुरक्षित जगहों में से एक है.

लेकिन समाज के उन बाघों का क्या जिनसे हमारी बहू-बेटियों को खतरा है. जो अपनी हवस के लिए मासूमों को भी नहीं छोड़ते. क्या उन्हें रोकने की जरुरत नहीं…

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क्या देश की बेटियों को बचाने की जरुरत नहीं. क्या बेटियों को यूं ही हैवानियत की भेंट चढ़ते छोड़ देना है. कहीं तीन साल की बच्ची तो कहीं तीस साल की महिला दरिंदगी का शिकार हो रही है. उनका क्या…

इस तरह के कुकृत्य के लिए हमारा समाज और सिस्टम दोनों जिम्मेवार नजर आते हैं. उन्नाव रेप केस को ही देख लिजिए, एक रेप पीड़िता ने सरकार, सिस्टम के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए न्याय की गुहार लगायी.

लेकिन एक विधायक के आगे बहुमत वाली सरकार भी बेबस नजर आयी. इंसाफ की मांग करती पीड़िता की आवाज को दबाने की हर कोशिश की गयी. उसे और उसके परिवारवालों को किस कदर प्रताड़ित किया गया, ये किसी से छुपा हुआ नहीं है.

युवती के पिता, चाची और मौसी ने जान देकर इस इंसाफ की लड़ाई की कीमत चुकायी, और आज की तारीख में पीड़िता खुद जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है.

इन सबके बीच यूपी पुलिस रसूखवाले विधायक के सामने बेबस नजर आयी. पहले उन्नाव विधायक की गिरफ्तारी के दौरान, अब पीड़िता को सुरक्षा देने के दौरान.

अगर राज्य की पुलिस और सरकार ने अपनी जिम्मेवारी सही से निभायी होती तो शायद सीबीआइ को मामले की जांच का ना जिम्मा मिलता और ना ही सुप्रीम कोर्ट को केस को यूपी से बाहर ट्रांसफर करने की जरुरत महसूस होती.

प्रशासन तो प्रशासन, खुद महिला सशक्तिकरण का नारा बुलंद करने वाले पीएम मोदी की पार्टी का रवैया भी हैरान करने वाला था.

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मामले को तूल पकड़ता देख, पिछले साल हारकर बीजेपी ने आरोपी विधायक सेंगर को निलंबित किया था. लेकिन क्या इतने बड़े कुकर्म के लिए निलंबन जैसी मामूली सजा काफी थी.

खैर, पीड़िता को मौत के नजदीक पहुंचाने और पूरे घटनाक्रम को लेकर देश में बढ़ते गुस्से को देखते हुए बीजेपी ने उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया. लेकिन सवाल ये है कि इसमें इतनी देरी क्यों, क्या देर, अंधेर नहीं….

बहरहाल, उन्नाव केस तो वो मामला है, जो राष्ट्रीय पटल पर सामने आया, क्योंकि इसमें सत्ताधारी पार्टी के विधायक पर आरोप है. अब सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद पीड़िता को न्याय मिलने की एक आस भी जगी है.

लेकिन ऐसी कितनी महिलाएं, बच्चियां हैं, जो हवस का शिकार हो रही हैं. हैरानी और दहशत तो उन घटनाओं को देखकर कहीं अधिक होती है, जहां दो-तीन साल की मासूम बच्चियों को चंद विकृत मानसिकता वाले अपनी दरिंदगी का शिकार बनाते हैं.

जमशेदपुर में मासूम के साथ हुई दरिंदगी को ही देख लिजिए. क्या गलती थी उसकी. रेलवे स्टेशन पर उसकी मां की जरा-सी आंख क्या लगी, इंसान की शक्ल में आये हैवान ने जो कुछ भी किया वो कहीं से भी सभ्य समाज का चेहरा नहीं हो सका.

नन्हीं सी बच्ची से गैंगरेप, उसके बाद सिर काटकर उसकी निर्मम हत्या. शर्म आती है, ये सोचकर कि हम ऐसे समाज का हिस्सा है.
माना कि आधी आबादी के प्रति बढ़ते अपराध पर जवाबदेही हर किसी की बनती है. फिर चाहे वो समाज हो, सरकार हो या हम खुद.

लेकिन सबसे ज्यादा जरुरत लोगों में कानून का खौफ लाने की है. इस बात का एहसास दिलाने की है कि इस तरह की दरिंदगी किसी के साथ करने से कई गुणा ज्यादा तकलीफ उसे खुद झेलनी पड़ेगी.

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Nayika

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