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पूरे प्रकरण से साबित होता है कि निशिकांत दुबे सामंती दर्प के शिकार हैं

संवैधानिक मूल्यों को भी ठेस पहुंचाया जा रहा है.

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Faisal anurag :

देश के कई हिस्सों में अनेक ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिससेलोकतंत्र और देश शर्मसार हुआ है. ऐसा लग रहा है कि भारत को तेजी से मध्यकालीन समाज की तरफ ले जाया जा रहा है. सामंती मूल्यों को पूरी बेशर्मी से न्यायसंगत ठहराने की कोशिश की जा रही है. बराबरी और सम्मान को लगातार ठेस पहुचाया जा रहा है. एक आगे बढ़ते समाज के लिए ये खतरनाक संकेत हैं क्योंकि इससे न केवल लोगों की जनतांत्रिक चेतना प्रभावित होती है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों को भी ठेस पहुंचाया जा रहा है.

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आजादी के बाद से लगातार भारतीय समाज में सामंती मूल्यों को दफन करने का अभियान चलाया गया. ऐसा अहसास कराया जा रहा है कि अब इस तरह का अभियान तेज किया जा रहा है जो भारतीय जाति संरचना को और मजबूत बना रहा है. जाति उन्मूलन की तमाम प्रवृतियों को कमजोर करने के मनुवादी कोशिश का ही नतीजा है कि आम इंसान की गरिमा को लगातार चोट पहुचाई जा रही है. जिन जनप्रतिनिधियों ने संविधान को गवाह रख कर शपथ लिया है, बावजूद इसके वे ही इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं.

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झारखंड के गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने पहले तो अपनी ही पार्टी के एक कार्यकर्ता से पैर धुलवाया ओर फिर उस कार्यकर्ता ने उस गंदा पानी को पी लिया. सांसद दुबे ने इसे रोकने के बजाय कार्यकर्ता को ऐसा करने दिया. बडे गर्व के साथ उस तस्वीर को फेसबुक पर पोस्ट किया. मामला जब विवादग्रस्त हुआ तो इस पूरे घटनाक्रम को न्यायसंगत ठहरा दिया. उनकी बेशर्मी यहीं तक नहीं रुकी. उन्होंने उस कार्यकर्ता से एक प्रेसवार्ता भी करा दिया और घटना को सही साबित करने के लिए आस्था के सवाल को खडा कर दिया. दुबे की इस बेशर्मी को झारखंड के एक मंत्री सीपी सिंह ने भी सही इकराने के लिए कुतर्क का सहारा लिया. मंत्री भी पूरी बेशर्मी के साथ निशिकांत दुबे का पक्ष लेने लगे. एक लोकतत्रं में इस तरह की बेशर्मी जिस तेजी से बढ़ रही है. वह चिंताजनक है. अनेक जनप्रतिनिधियों ने विगत हाल के दिनों में बलात्कार तक को सही ठकराया और बलात्कारियों के पक्ष में खडा हुए हैं. सवाल उठता है कि आखिर यह कैसा समाज बन रहा है. जिसमें किसी भी गलत कृत्य को आस्था से जोड़ दिया जा रहा है.

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कॉरपोरेट घरानों ने कई सांसदों की ताकत को बहुत बढ़ा दिया है. संसद में बैठ कर ये सांसद कॉरपोरेट हित का ध्यान रखते हैं. ऐसे सांसदों की ताकत का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें किसी भी बात की परवाह नहीं है. न तो वे संविधान के मूल्यों का ध्यान रखते हैं और ही मानवीय गरिमा का. ऐसे ही जनप्रतिनिधि लगातार संसद और संविधान की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं. भारतीय लोकतंत्र के समक्ष यह गहरी चुनौती है. कि वह उन मूल्यों की हिफाजत करें. जो मानवीय गरिमा को मजबूत बनाता हो. सरकारों को भी इस गरिमा की हिफाजत के लिए सजग रहने की जरूरत है. निशिकांत दुबे प्रकरण में सरकारों ने जिस तरह की चुप्पी साध रखी है, वह चिंताजनक है क्योंकि यह मामला किसी ग्रामीण परिवेश के आतिथ्य सत्कार का नहीं बलिक ठोस रूप से एक राजनीतिक मामला है. इस प्रकरण मेंझारखंड के विपक्षी दलों की चुप्पी भी रहस्यमयी है. सोशल मीडिया पर जरूर निशिकांत दुबे की गंभीर आलोचना हुई है ओर इसे जनतंत्र के लिए चिंताजनक बताया गया है. क्योंकि इस पूरे प्रकरण में एक जाति अंहकार भी साफ झलकता है. श्रेष्ठता का जो बोध दिखाई दे रहा है. वह भी गंभीर मामला है. मामले को न्यायसंगत ठहराने में एक ऐसा दर्प दिखता है. जो बताता है कि राजनीति में नेता, कार्यकर्ता के बीच किस तरह के हालात हैं. हालांकि दुबे ने इस पूरे क्रम में खुद को छोटा कार्यकर्ता बता कर उस दर्प का ही इजहार किया है. जिसके लिए बराबरी के मूल्य का कोई अर्थ नहीं है. एक सांसद की हैसियत से उन्हें किसी भी ऐसे कृत्य को रोकना चाहिए था न कि उसे सही ठहराने का घृणित प्रयास करना चाहिए था.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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