lok sabha election 2019

संथाल की तीन सीटें रघुवर सरकार के लिए आदिवासी बहुल क्षेत्र में जनमत संग्रह तो नहीं

Pravin kumar

संथालों ने 1855 में ब्रितानी राज के खिलाफ विद्रोह किया था. इसका नेतृत्व चार भाइयों ने किया था, जिसके कारण उस इलाके में मार्शल लॉ लगाना पड़ा था. संथाल अब भी भारत के सबसे बड़े और सबसे पुराने आदिवासी समुदाय माने जाते हैं. इस इलाके में झारखंड की तीन लोकसभा सीटे हैं, जहां आखरी चरण में 19 मई को वोट डाले जाने हैं. संथालपरगना की तीन सीटों पर यूपीए-एनडीए की प्रतिष्ठा दांव पर है. 2014 के चुनाव में इन तीन सीटों में से दो झामुमो और एक पर भाजपा ने कब्जा किया था. 2014 में मोदी लहर के बाद भी झामुमो का किला फतह करना भाजपा के लिए संभव नहीं हो सका और दुमका और राजमहल सीट पर हार का सामना करना पड़ा. 19 मई को होनेवाले चुनाव में भाजपा की तीखी नजर है. इसके लिए भाजपा के कई दिगज नेता चुनावी सभा कर चुके हैं. वही संथाल में बाबूलाल मरांडी और हेमंत सोरेन महागठबंधन की सीटों को निकालने में लगे हैं. जहां दो सीटों पर झामुमो और एक सीट पर झाविमो चुनाव लड़ रहा है.

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सरकार के कामकाज का कितना असर

साहेबगंज के मनोज हांसदा कहते हैं- 2019 का चुनाव पूर्ण बहुमतवाली सरकार का आदिवासी इलाकों में जनमत संग्रह है. सरकार की नीतियों से परेशान और तगतवाह लोगों की गोलबंदी इस चुनाव में दिख रही है. प्राकृतिक संसाधनों की लूट पहले से भी ज़्यादा रफ्तार से जारी है, जिससे इलाके में काफी नारजगी है. भले ही महागठबंधन की ओर से जो भी उम्मीदवार हो, भाजपा को हराने के लिए उसे वोट दिया जायेगा. हालांकि राजनीतिक दलों का चुनाव प्रचार इस बार फीका रहा है. पहले की तरह चुनाव में शोर नहीं है.

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42 गांवों को नगरपालिका में शामिल किया जाना चुनाव में मुद्दा नहीं

दुमका के सुकलाल मुर्मू कहते हैं- लोकसभा चुनाव में 42 गांवों को नगरपालिका में शामिल किये जाने का विरोध किया जाता है. विपक्ष ने भी इसे अपना चुनावी मुद्दा नहीं बनाया है. ऐसे में निराशा जरूर होती है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 31 (ख) के अनुसार पांचवीं अनुसूची (अनुसूचित क्षेत्र) में सूचीबद्ध संथालपरगना काश्तकारी अधिनियम शहर के विस्तारीकरण के नाम पर कानून का उल्लंघन करने का अधिकार राज्य सरकार को नहीं है. जनजाति (आदिवासी) समाज की अपनी स्वशासन व्यवस्था है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान है. शहरीकरण के तहत अनुसूचित गांवों को मिलाने से यहां के ग्रामीणों को मिले कानूनी संरक्षण एवं सुरक्षा खत्म हो जायेगी, जिसके फलस्वरूप आदिवासी के साथ-साथ मूलवासियों, किसानों, गरीबों की जमीन का अतिक्रमण होगा. इससे आदिवासी और मूलवासियों का अस्तित्व खतरे में आ जायेगा.

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भाजपा के खिलाफ जायेगा रघुवर सरकार का कामकाज

शिकारीपाड़ा के श्याम सोरेन कहते हैं- संताल में भाजपा की जीत का एकमात्र कारण विपक्षी मतों का बंटवारा रहा है, जो 2019 में नहीं दिख रहा है. रघुवर सरकार की नीतियां सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन स्थानीयता नीति धर्म स्वतंत्रता विधायक, पेशा कानून, अडानी पावर प्लांट को किसानों की जमीन जबरन देना, भूमि अधिग्रहण कानून, वन क्षेत्र से आदिवासियों की बेदखली जैसे मुद्दे हैं, जो सता पक्ष के विरोध में जा रहे हैं. वहीं इन मुद्दों को विपक्ष भी पूरी तरह भुना नहीं पा रहा है. फिर भी भाजपा के लिए हार का कारण बनेगा. वहीं दुमका संथालपरगना के कई छात्रावासों से तीर-धनुष जैसी पारंपरिक पहचान को हथियार के नाम पर छात्रावास से पुलिस के द्वारा बरामद करना, युवाओं के मन में सरकार के प्रति आक्रोश को बढ़ा रहा है.

गोड्डा के रोहित यादव कहते हैं- अडानी और किसानों का मामला तो इलाके में है ही, साथ ही रघुवर सरकार के द्वारा किसानों को प्रति एकड़ पांच हजार रुपया कृषि सहायता के रूप में देने की घोषणा पर भी लोग संदेह कर रहे हैं. इससे किसानो को लगने लगा है कि सरकार उनका जमीन ले लेगी. संथालपरगना में संथाल समुदाय का एक हिस्सा जो सफा होड़ धर्म मानतें है, उनका वोट भाजपा के पक्ष में जायेगा. बांग्लादेशी घुसपैठ का मामला गोड्डा और राजमहल लोकसभा में भाजपा को फायदा पहुंचा रहा है. गोड्डा लोकसभा क्षेत्र के वर्तमान भाजपा सांसद निशिकांत दुबे का गोड्डा लोकसभा में उपलब्ध नहीं रहना प्रदीप यादव को लाभ पहुंचायेगा.

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भाजपा की नजर दुमका लोकसभा सीट पर

भाजपा की नजर उन इलाकों में है जहां झामुमो के दिग्गजों का क्षेत्र रहा है. मुख्यमंत्री चुन-चुन कर उन क्षेत्र में गये, जहां सालों से तीर-धनुष का झंडा लहराता रहा है. इसका कारण जो भी रहे लेकिन भाजपा को यह मालूम है कि झारखंड में झामुमो को कमजोर करने से ही सत्ता, सियासत के उसके मकसद पूरे हो सकते हैं. वहीं भाजपा के भीतर भी चुनाव प्रबंधक चिंतित इस बात से भी हैं कि चुनावी सभा में सरकार की नीतियों की वजह से मुश्किल हो रही है. इसके बाद भी झामुमो की घेराबंदी भाजपा की पहली प्राथमिकता है. वहीं बाबूलाल मरांडी भी यूपीए उम्मीदवार के पक्ष में कैंपेन कर रहे हैं. दुमका में हेमंत सोरेन बाबूलाल का विशेष जोर है. बाबूलाल और हेमंत संथाल में रह कर दुमका, राजमहल और गोड्डा में चुनावी कैंपेन को धार और दिशा दे रहे हैं.

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कौन किस सीट पर किसे दे रहा है टक्कर

दुमका लोकसभा सीट पर झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन चुनाव लड़ रहे हैं. झामुमो के बड़े चेहरे की राजनीतिक प्रतिष्ठा इस सीट से जुड़ी है. भाजपा इस सीट को हर हाल में जीतना चहती है ताकि संथाल की राजनीति में खुद को मजबूत करे. इस सीट से भाजपा के सुनील सोरेन दम लगा रहे हैं. राजमहल में झामुमो के वर्तमान सांसद विजय हांसदा अपनी जमीन बचाने में लगे हैं. वहीं पूरा एनडीए खेमा हेमलाल मुर्मू के लिए जोर लगा रहा है. गोड्डा सीट पर भाजपा के निशिकांत दुबे और झाविमो के प्रदीप यादव के बीच कड़ा संघर्ष है.

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