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RBI के तीन पूर्व गवर्नर चिंतित, सरकार कदम उठाये…अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकता है बैंकों का बढ़ता NPA

पूर्व गवर्नरों ने जर्नलिस्ट तमाल बंद्योपाध्याय की आने वाली किताब Pandemonium: The Great Indian Banking Tragedy में यह बात कही है

NewDelhi :  कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए सरकार ने काफी पैसा झोंक दिया है. यह बड़ी समस्या है. बैंकों का बढ़ता  NPA देश की आर्थिक प्रगति के लिए बहुत बड़ा खतरा है.  अगर सरकार ने जल्दी इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाये तो इकॉनमी पर इसका बुरा असर पड़ सकता है. RBI के तीन पूर्व गवर्नरों ने यह चेतावनी दी है.  पूर्व गवर्नरों ने जर्नलिस्ट तमाल बंद्योपाध्याय की आने वाली किताब Pandemonium: The Great Indian Banking Tragedy में यह बात कही है.

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कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए सरकार ने काफी पैसा झोंक दिया

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किताब के अनुसार कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए सरकार ने काफी पैसा झोंक दिया है. यह बड़ी समस्या है. अब उसके पास बैंकों की मदद करने के लिए बहुत कम संसाधन बचे हैं. किताब में गिरते राजस्व संग्रह से राजकोषीय घाटे के बजट लक्ष्य से दोगुना पहुंचने की आशंका है.  2008 ले 2013 तक आरबीआई के गवर्नर रहे डी सुब्बाराव के अनुसार बैड लोन की समस्या बड़ी और वास्तविक है. लेकिन यह भी सच है कि सरकार की अपनी राजकोषीय मजूबरी है.

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सरकारी बैंकों के recapitalization के लिए 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान

  जान लें कि सरकार ने इस साल सरकारी बैंकों के recapitalization के लिए 20,000 करोड़ रुपये (2.7 अरब डॉलर) का प्रावधान किया है जबकि विश्लेषकों का कहना है कि इसके लिए 13 अरब डॉलर की जरूरत है. पिछले तीन साल में सरकार नें 2.6 लाख करोड़ रुपये सरकारी बैंकों में झोंके हैं, लेकिन उनकी समस्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है. मार्च तक इसके 12.5 फीसदी पहुंचने का अनुमान है जो दशक में सबसे अधिक है.

नोटबंदी ने बैंकिंग सेक्टर की समस्या को और विकराल बना दिया

2003 से 2008 तक आरबीआई के गवर्नर रहे वाईवी रेड्डी का कहना है कि राजकोषीय समस्या ने पहले बैंकिंग और फिर फाइनेंशियल सेक्टर को अपनी चपेट में ले लिया जिससे इकॉनमी प्रभावित हो रही है.  कुल मिलाकर एनपीए न केवल एक समस्या है बल्कि यह कई दूसरी समस्याओं का परिणाम है.  वहीं 1992 से 1997 तक केंद्रीय बैंक के प्रमुख रहे सी रंगराजन ने कहा कि रियल एस्टेट सेक्टर की समस्या बरकरार है और हाल में लिये गये नोटबंदी जैसे नीतिगत फैसलों ने बैंकिंग सेक्टर की समस्या को और विकराल बना दिया. यह एक आर्थिक संकट है.

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