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त्वरित टिप्पणीः जिन्होंने संयम की मिसाल कायम की वो ‘दंगाई’ नहीं हो सकते, जिन्होंने ‘दंगा’ किया वो किसान नहीं हो सकते

सवाल शासन की नीतियों और इकबाल पर है, तो सवाल आंदोलन के रहनुमाओं से भी है

SHAMBHU NATH CHOUDHARY

करीब दो महीनों से जारी किसान आंदोलन ऐन गणतंत्र दिवस के मौके पर बदशक्ल हो गया. देखते-देखते हालात बेकाबू हो गये. अब तक शांतिपूर्ण बताया जा रहा आंदोलन उपद्रवी तत्वों के हाथों हाईजैक हो गया. जिस आंदोलन के अनुशासित होने की मिसालें दी जा रही थीं, जिन किसानों के संयम की सराहना हो रही थी, जिन्होंने खुले आसमान के नीचे कड़ाके की ठंड भरी रातें गुजारते हुए ऊफ्फ नहीं की, जिन्होंने  सियासी कुनबों से दूरी बनाकर अपने मुद्दों की ओर देश-दुनिया का ध्यान खींचने में कामयाबी पायी, उनका इकबाल आज अराजक तत्वों के ट्रैक्टर के पहियों ने रौंद डाला.

लाल किले की प्राचीर पर तिरंगे को लहराते देखकर हम भारतीयों का सीना गर्व से चौड़ा हो उठता है, लेकिन 72वें गणतंत्र दिवस के दिन इस ऐतिहासिक परिसर में जो हुआ, उसने आज की तारीख को इतिहास का दागदार पन्ना बना दिया है. सुबह 10 बजे तक जिस लाल किले के सामने राजपथ पर गणतंत्र दिवस की शानदार परेड के बीच मुल्क की तरक्की, सेना के साहस एवं शौर्य  और देश की इंद्रधनुषी संस्कृति का मुजाहिरा हो रहा था, उसी जगह से कुछ घंटे बाद देश और देशवासियों को शर्मसार करनेवाली तस्वीरें सामने आने लगीं. लाल किले पर जो तिरंगा फहरता है, उसकी जगह या उसके समानांतर कोई दूसरा निशान नहीं ले सकता. जिन लोगों ने तिरंगे के उत्सव के दिन लालकिले के गुंबद पर चढ़कर दूसरा निशान लहराने की हिमाकत की, उन्होंने न सिर्फ देश के अन्नदाताओं को बदनाम किया, बल्कि देश के हर नागरिक के गर्व के निशान तिरंगे की शान में नाकाबिल-ए-बर्दाश्त गुस्ताखी की है. किसानों के मुद्दों और सरकार के रुख पर अलग से बहस-मुबाहिसे हो सकते हैं, बल्कि हो रहे हैं. उनकी मांगों पर सहमति-असहमति का मसला अपनी जगह है, लेकिन देश-गणराज्य के गौरव प्रतीक को अपमानित करने के दुस्साहस की कोई माफी नहीं हो सकती.

आज जो कुछ हुआ, उसे सिर्फ किसानों के आंदोलन तक महदूद रखकर नहीं देखा जा सकता. आज की घटना से जो सवाल उठे हैं, उसकी आंच हमारे देश, हमारे गणतंत्र के गिरेबान तक आ पहुंची है. सवालों से न तो वो बरी हो सकते हैं, जिनके हाथों में तंत्र चलाने की जिम्मेदारी इस देश के जन-गण ने सौंपी है, न ही किसानों के आंदोलन की अगुवाई-रहनुमाई करने वाले चेहरे. इंटेलिजेंस के इनपुट्स में अगर हालात बिगड़ने की बात कही गयी थी तो हुकूमत और पुलिस-प्रशासन के इंतजाम कुछ हजार लोगों के आगे कमजोर क्यों पड़ गये?  जो आंदोलन सरकार की बार-बार की मनुहार के बाद भी टस से मस नहीं हुआ, उसका इस तरह हिंसा-हुड़दंग की अंधी गली में मुड़ जाना बेहद खतरनाक है. यह घटना किसी सोचे-समझे षड्यंत्र के प्लॉट का हिस्सा तो नहीं?

किसानों के आंदोलन की अगुवाई करनेवाले नेता चाहे जितनी भी सफाई दें कि उत्पात करनेवाले उनके संगठन के नहीं थे, लेकिन वो अपनी जिम्मेदारी से इतनी आसानी से बरी नहीं हो सकते. जिन्होंने यह वादा किया था कि ट्रैक्टर परेड शांतिपूर्वक तयशुदा रूट से निकलेगा, तय वक्त के अनुसार निकलेगा, उन्हें जवाब तो देना ही पड़ेगा कि अराजकता का यह नंगा नाच किसने किया, क्यों किया और उसे वे रोक क्यों नहीं पाये?

यह तय है कि जिन्होंने दो महीने तक अहिंसा, संयम और मर्यादा की मिसालें कायम की, वो दंगाई नहीं हो सकते और जिन्होंने आज दिल्ली में गणतंत्र के उत्सव दिवस को हिंसा-हुड़दंग का नंगा नाच बना दिया, वो इस देश के असली किसान नहीं हो सकते.

 

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