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हेमंत कुमार की धुन पर बने इस गीत ने दी थी लता मंगेशकर को नई जिंदगी

संगीतकार और गायक हेमंत कुमार की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : एक बार लता खूब बीमार पड़ीं. डॉक्टर ने लता मंगेशकर को लंबे समय तक आराम की सलाह दी. इस बीमारी ने लता जी के मन में ये डर पैदा कर दिया कि वो पहले की तरह दोबारा गा भी पाएंगी या नहीं. लता की इस बीमारी के बारे में ये भी कहा जाता है कि किसी ने उन्हें ‘स्लो-पायजन’ देने की कोशिश की थी. यहां तक कि उनके घर जो रसोइया काम करता था वो अचानक बिना पैसे लिए भाग गया था.

इस दौरान मजरूह सुल्तानपुरी रोज लता के घर जाया करते थे और उन्हें जो खाना दिया जाता था उसे पहले खुद चखते थे. खैर, करियर के उस अहम मोड़ पर कई महीनों का ‘ब्रेक’ लगने के बाद हेमंत कुमार ने उन्हें फिर से गवाया. गाना था फिल्म बीस साल बाद का कहीं दीप जले कहीं दिल. हेमंत कुमार जितने बेजोड़ गायक थे उतने ही लाजवाब संगीतकार.

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मुख़्तसर सी बात है तुमसे प्यार है, तुम्हारा इंतज़ार है…तुम पुकार लो

होंठ पे लिए हुए दिल की बात हम, जागते रहेंगे और कितनी रात हम, मुख़्तसर सी बात है तुमसे प्यार है, तुम्हारा इंतज़ार है…तुम पुकार लो.. यह मधुर और लाजवाब गीत जिस शख्स ने गाया है वो हेमंत कुमार थे. संगीत भी खुद उन्होंने ही दिया था. गाने की शुरुआत में हूं हूं का आलाप श्रोताओं को अपने जादू में बांध लेता है. ‘ये आलाप हेमंत दा ने कई गीतों में इस्तेमाल किया किया है जैसे ये अपना दिल तो आवारा में भी.

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इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ी

16 जून 1920 को बनारस में जन्मे हेमंत कुमार मुखोपाध्याय ने प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता के मित्रा इंस्टीट्यूट से पूरी की. इंटर की परीक्षा पास करने के बाद हेमंत कुमार ने जादवपुर विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग मे दाखिला ले लिया, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी. उस समय उनका रुझान संगीत की ओर हो गया था और वे संगीतकार बनना चाहते थे.

इस बीच हेमंत कुमार ने साहित्य जगत में भी अपनी पहचान बनानी चाही और बांगला पत्रिका “देश” में उनकी एक कहानी भी प्रकाशित हुई. 1930 के अंत तक उन्होंने अपना पूरा ध्यान संगीत की ओर लगाना शुरू कर दिया. अपने बचपन के दोस्त सुभाष की मदद से 1930 में उन्हें आकाशवाणी के लिए अपना पहला बांगला गीत गाने का मौका मिला. हेमंत कुमार ने संगीत की अपनी प्रारंभिक शिक्षा एक बांगला संगीतकार शैलेश दत्त गुप्ता से ली. बाद में उन्होंने उस्ताद फैयाज खान से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी ली.

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ग्रामोफोनिक कंपनी के लिए आवाज दी.

1937 में शैलेश दत्त गुप्ता के संगीत निर्देशन में एक विदेशी संगीत कंपनी “कोलंबिया लेबल” के लिए हेमंत कुमार ने गैर फिल्मी गीत गाए. इसके बाद उन्होंने लगभग हर वर्ष “ग्रामोफोनिक कंपनी ऑफ इंडिया” के लिए अपनी आवाज दी. इसी कंपनी के लिए 1940 में कमल दास गुप्ता के संगीत निर्देशन में हेमंत कुमार को अपना पहला हिन्दी गाना “कितना दुख भुलाया तुमने” गाने का मौका मिला. 1941 में एक बांगला फिल्म के लिए भी उन्होंने अपनी आवाज दी.

1944 में एक गैर फिल्मी बांगला गीत के लिए हेमंत कुमार ने संगीत दिया. इसी साल पंडित अमर नाथ के संगीत निर्देशन में उन्हें अपनी पहली हिन्दी फिल्म “इरादा” में गाने का मौका मिला. इसके साथ ही 1944 में रवींद्र संगीत के लिए भी उन्होंने गाने रिकॉर्ड किए. 1947 में बांगला फिल्म “अभियात्री” के लिए बतौर संगीतकार काम किया. इस बीच हेमंत कुमार भारतीय जन नाट्य संघ “इप्टा” के सक्रिय सदस्य के रूप में काम करने लगे. धीरे धीरे वे बांगला फिल्मों में बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाते चले गए.

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मन डोले मेरा तन डोले

निर्देशक हेमेन गुप्ता जब मुंबई आए तो उन्होंने हेमंत कुमार को भी बंबई आने का न्यौता दिया. 1951 में फिल्मिस्तान के बैनर में बनने वाली अपनी पहली हिन्दी फिल्म “आनंद मठ” के लिए हेमेन गुप्ता ने हेमंत कुमार से संगीत देने की पेशकश की. फिल्म की सफलता के बाद हेमंत कुमार बतौर संगीतकार फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए. इस फिल्म में लता मंगेशकर की आवाज में गाया हुआ “वंदे मातरम” आज भी श्रोताओं को भावावेश में ला देता है.

ऐसे हिट हुआ नागिन का गीत

हिंदी फिल्मों में बतौर संगीतकार हेमंत की सफलता शुरू होती है फ़िल्मिस्तान स्टूडियो की ‘नागिन’ (1954) से. लता का गया हुआ, ‘मन डोले मेरा तन डोले’ ने गली-गली में धूम मचा दी थी. इस फ़िल्म की सफलता के पीछे इसका संगीत ही था. निर्माता शशिधर मुख़र्जी ने जब देखा कि फ़िल्म को ठंडा रेस्पॉन्स मिल रहा है तो उन्होंने एक हज़ार रिकार्ड्स होटलों और रेस्तरां में मुफ़्त में बंटवा दिये. जब फ़िल्म के गाने लोगों के ज़हन में उतरे तो सिनेमा हॉलों में दर्शक टूट पड़े.

इस फिल्म के तमाम गाने जबरदस्त हिट हुए. मसलन- तेरे द्वार खड़ा एक जोगी, मेरा दिल ये पुकारे आजा, जादूगर सैयां, ऊंची ऊंची दुनिया की दीवारें जैसे गाने. लेकिन इस फिल्म के एक गाने- ‘तन डोले मेरा मन डोले’ ने तो कामयाबी के तमाम रिकॉर्ड्स तोड़ दिए. दिलचस्प बात ये है कि जब लता मंगेशकर इस फिल्म के गाने गा रही थी तो उन्होंने कहा था कि ये गाना नहीं चलेगा. बाद में जब फिल्म रिलीज हुई तो यही गाना जबरदस्त हिट हुआ. इस फिल्म के लिए हेमंत कुमार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्मफेयर पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए.

जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला’

1952 में ही हेमंत कुमार को एक और बड़ी कामयाबी मिली. जाने-माने अभिनेता और निर्देशक गुरूदत्त अपनी दूसरी फिल्म बना रहे थे- जाल. इस फिल्म में देव आनंद और गीता बाली अभिनय कर रहे थे. संगीतकार थे- सचिव देव. बतौर गायक हेमंत कुमार को हिंदी फिल्मों में एक पहचान मिली. गाना था- ये रात ये चांदनी फिर कहां, सुन जा दिल की दास्तान.

इसके बाद उन्होंने गुरु दत्त की प्यासा फिल्म का गीत ‘जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला’ गाकर खुद को गायक के रूप में स्थापित किया. जल्दी ही वो समय भी आया जब गुरूदत्त ने उन्हें अपनी फिल्मों का संगीत तैयार करने की जिम्मेदारी दी. साहब बीबी और गुलाम ऐसी ही फिल्म थी. इस फिल्म में भी हेमंत कुमार के संगीत से सजे कई लाजवाब गीत सामने आए जैसे ना जाओ सईयां छुड़ा के बईयां.

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फिल्म निर्माण में भी कदम रखा, प्रेसिडेंट गोल्ड मेडल पाया

1959 में उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा और “हेमंता बेला प्रोडक्शन” नाम की फिल्म कंपनी की स्थापना की. इसके बैनर तले उन्होंने मृणाल सेन के निर्देशन में एक बांगला फिल्म “नील आकाशेर नीचे” बनाई. इस फिल्म को प्रेसिडेंट गोल्ड मेडल दिया गया. 1971 में हेमंत कुमार ने एक बांगला फिल्म “आनंदिता” का निर्देशन भी किया लेकिन यह फिल्म बॉक्स आफिस पर बुरी तरह से नकार दी गयी. 1979 में उन्होंने चालीस और पचास के दशक में सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में गाए गानों को दोबारा रिकॉर्ड कराया और उसे “लीजेंड ऑफ ग्लोरी” के रूप में रिलाज किया. यह एलबम काफी सफल रही.

भगवान भी अगर गाते तो हेमंत दा की आवाज़ में

हेमंत दा ने शानदार संगीत दिया और कमाल के गाने गाये.उनकी आवाज़ इतनी ज़बरदस्त थी कि सुनने वाले के दिल में उतर जाया करते थे. संगीतकार सलिल चौधरी ने हेमंत दा के बारे में इतना तक कह दिया था कि भगवान भी अगर गाता तो हेमंत दा की आवाज़ में गाता. लता मंगेशकर ने भी एक दफा कहा था कि हेमंत दा जब गाते थे तो ऐसा लगता था कोई पुजारी मंदिर में बैठकर गा रहा है. इसका अर्थ ये है कि हेमंत दा एक साधक की तरफ संगीत की साधना करते थे तभी वे इतने प्रभावशाली गायक और संगीतकार थे.

इसके बाद हेमंत दा को पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी. बांग्ला सिनेमा में तो वे हिट हो ही चुके थे, ‘नागिन’ के बाद वे उस दौर के हिंदी सिनेमा के व्यस्ततम संगीतकारों में एक हो गए. इस कदर व्यस्त हो गए कि कई बार उन्हें रोज़ाना हवाई जहाज पकड़कर मुम्बई और कोलकाता के बीच सफ़र करना पड़ता.

 

गीतांजलि स्टूडियो के बैनर तले बनाई यादगार फिल्में

छठे दशक में जब फ़िल्मिस्तान स्टूडियो बंद होने की कगार पर आ गया तो हेमंत कुमार ने गीतांजलि स्टूडियो खोलकर कुछ यादगार फ़िल्में बनाई. उन्हें रहस्मयी और रोमांचक फ़िल्में बनाने का शौक़ था. कमाल की बात यह है कि उनका संगीत फ़िल्म की पटकथा पर भारी पड़ता था. मिसाल के तौर पर ‘बीस साल बाद’ (1961) का गाना ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’ या ‘कोहरा’ (1964) का ‘झूम झूम ढ़लती रात’ जैसे गानों में ‘हॉन्टिंग इफ़ेक्ट’ मदन मोहन के ‘नैना बरसे रिमझिम रिमझिम’ या ‘नैनों में बदरा छाये’ गानों की बराबरी करता है.

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ख़ामोशी का बेमिसाल संगीत

‘ख़ामोशी’ (1969) हेमंत कुमार के लिए एक बड़ी सफलता लेकर आई. हेमंत दा के शानदार संगीत और गुलज़ार के फ़लसफ़ाई गीतों ने तहलका मचा दिया. हेमंत कुमार का ‘तुम पुकार लो’, लता मंगेशकर का ‘हमने देखी है उन आंखों की महकती ख़ूशबू’ और किशोर कुमार का ‘वो शाम कुछ अजीब थी’ खूब मशहूर हुए.

‘है अपना दिल तो आवारा

देवानंद की ‘सोलहवां साल’ का ‘है अपना दिल तो आवारा न जाने किस पे आएगा’ या बिश्वजीत पर फ़िल्माया ‘बेक़रार करके हमें यूं न जाइए’ जैसे गाने, उनकी आवाज़ और उनका संगीत उस दौर के साथ न्याय करते नज़र आते हैं. बतौर संगीतकार लता मंगेशकर ‘नागिन’ के बाद, उनकी सबसे पसंदीदा गायिका रहीं. आशा भोंसले के साथ भी हेमंत दा ने कई अच्छे गाने दिए जैसे ‘भंवरा बड़ा नादान है’. गीता दत्त के साथ उन्होंने कुछ कम काम किया है जैसे पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे.

बड़े गायकों को अपने निर्देशन में गवाया

हेमंत कुमार की खास बात ये भी रही कि उन्होंने अपने संगीत निर्देशन में उस दौर के दूसरे बड़े गायकों को भी गवाया. मोहम्मद रफी, तलत महमूद से लेकर किशोर कुमार तक ने हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन में प्लेबैक सिंगिंग की. फिल्म खामोशी का किशोर कुमार का गाया सुपरहिट गाना ‘वो शाम कुछ अजीब थी ये शाम भी अजीब है’ में हेमंत कुमार का ही संगीत था.

इसी फिल्म में उन्होंने खुद तुम पुकार लो जैसा शानदार गाना गाया. हेमंत कुमार का खुद का गाया अजर अमर गीत छुपा लो यूं दिल में प्यार मेरा संगीतकार रोशन का तैयार किया हुआ गाना था.

जहां तक बांग्ला संगीत की बात है तो हेमंत कुमार के आसपास भी कोई नहीं है. वहां वे रविंद्र संगीत और आधुनिक संगीत के अलावा गायक के तौर पर सबसे बड़ा नाम हैं. जो ‘आनंदमठ’ हिंदी सिनेमा में उनकी शुरुआत करती है, वह पहले बांग्ला में बनी थी.

फ़िल्म संगीत में आधुनिकता के परिचायक हेमंत दा, सत्तर और अस्सी के दशकों की आधुनिकता के नाम पर फूहड़ता और विदेशी गीतों की नकल के दौर से नाखुश हो गए और इस माहौल से निराश होकर उन्होंने काम करना बंद कर दिया.

हेमंत दा तो 1989 में ढाका के एक दौरे के बाद दिल का दौरा पड़ने से दुनिया को अलविदा कह गए लेकिन उनके एक से बढ़कर मधुर गीत हमेशा के लिए संगीत प्रेमियों को लुभाते और मनोरंजन करते रहेंगे.

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