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ये है अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने की रोचक बैकग्राउंड स्टोरी

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi :  भारतीय राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी  बेहद अनूठी शख्सियत रहे हैं. वे जनसंघ और भाजपा जैसी दक्षिणपंथी पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं, लेकिन देश की लगभग सभी पार्टियों के सीनियर नेताओं से उनकी मित्रता रही है. भाजपा विरोधी दलों में भी शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो अटल को अपना दुश्मन मानता हो यही वजह है कि उन्हें भारतीय राजनीति का अजातशत्रु कहा जाता है.

वाजपेयी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री रहे हैं जिन्होंने किसी गैर कांग्रेसी पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हुए पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था. वाजपेयी पहली बार 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने थे. उसके बाद करीब 13 महीने तथा तीसरी बार में पांच साल का टर्म पूरा किया था.

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भारत के सबसे सफल प्रधानमंत्रियों में शुमार अटल बिहारी वाजपेयी को 1995 में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया था उस समय वाजपेयी लगभग राजनीतिक के अज्ञातवास में थे. नब्बे के दशक में राम मंदिर आंदोलन की वजह से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी विपक्षी दलों में सबसे चमकते सितारे थे. ऐसे दौर में अचानक अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के कंडिडेट के रूप में सामने आने से भाजपा के कार्यकर्ताओं नेताओं सहित राजनीतिक गलियारों के लिए अचरज का विषय रहा था.

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बंबई अधिवेशन में आडवाणी ने की अप्रत्याशित घोषणा

अटल कैसे अचानक राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में आ गये इसकी बड़ी रोचक दास्तान है. 10 नवंबर 1995 को भारतीय जनता पार्टी का पूर्ण अधिवेशन बंबई में शुरू हुआ. इसमें लगभग 120000 लोग शामिल हुए थे. जिन्ना के नाती और पुराने दान करता नुस्ली वाडिया ने भी इसमें एक बड़ी रकम की थी. 1986 में RSS द्वारा पार्टी नेतृत्व से हटाए जाने के बाद वाजपेई पार्टी के मुख्यालय से भाजपा के उत्थान की योजना बनाने के मुकाबले अपने घर में प्रान (झींगा मछली) और मदिरा के सेवन को तरजीह देने लगे थे.

बंबई के शिवाजी पार्क में भीड़ जमा थी उसकी वाजपेई में कोई दिलचस्पी नहीं थी. काफी समय से भाजपा कार्यकर्ता बड़े विश्वास के साथ अपने अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखते रहे थे. उन्हें भरोसा था कि अगले आम चुनाव में उनकी पार्टी को ही सफलता मिलेगी. मंच की पृष्ठभूमि में दिल्ली के लाल किले की तस्वीर भी थी इस अधिवेशन में आडवाणी को यह सुनिश्चित करना था कि 15 अगस्त को लाल किले से देश को संबोधित करने वाला प्रधानमंत्री भाजपा से हो. 1991 के चुनाव में भाजपा दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, लेकिन तब से काफी कुछ बदल गया था. उत्तर प्रदेश में 6 दिसंबर 1992 में बाबरी ढांचा गिराये जाने के बाद से भाजपा के उदय की गति धीमी पड़ गई थी.

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छोटे समूह से वाजपेई- वाजपेई की आवाजें आयीं

बंबई अधिवेशन के पहले दिन पार्टी की एकता और चुनाव जीतने की क्षमता यह दोनों मुद्दे हावी रहे थे. दूसरे दिन पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी जैसे जनसभा को संबोधित करने के लिए उठे लोगों ने सोचा वो स्वयं को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करेंगे. इसकी बजाय लोगों को एक छोटे समूह से वाजपेई- वाजपेई की आवाजें सुनाई देने लगी. उस दिन वहां उपस्थित एक व्यक्ति याद करते हुए कहा आडवाणी जी के बारे में एक बात तो मैं आपको बता सकता हूं उनका पार्टी पर पूरा नियंत्रण था. ये आवाज उनकी जानकारी के बिना नहीं उठ सकती थी. आडवाणी ने इशारा मिलते ही पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी के नाम की घोषणा कर दी.

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मध्य प्रदेश एक गांव में हुआ खुलासा

कुछ हफ्ते पहले आडवाणी मध्य प्रदेश एक गए थे. इस सुदूर स्थान पर उन्होंने कहा था वे नहीं बल्कि वाजपेई अगले प्रधानमंत्री होंगे. आडवाणी की बात इतनी अविश्वसनीय थी और यह मंच इतना अज्ञात था कि पार्टी कैडर पर इसका कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन वाजपेई पर हुआ उन्होंने आडवाणी से पूछा कि उन्होंने पहले उनकी सहमति क्यों नहीं ली ? इस पर आडवाणी का जवाब था यदि मैं आपसे पूछता तो क्या आप मेरे प्रस्ताव पर हां कहते? बाद में होने वाले बंबई अधिवेशन में आडवाणी को लोगों तक अपना फैसला पहुंचाने का मंच मिल गया.

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क्या कहा वाजपेयी ने

शिवाजी पार्क की जनसभा में आडवाणी के बाद वाजपेई ने लोगों को अपने खास अंदाज में संबोधित किया. इसमें हर चीज का मिश्रण था एक और उन्होंने कहा कि वे एक सच्चे सिपाही हैं जो कोई भी काम मिलेगा उसे स्वीकार करेगा, लेकिन आडवाणी को पार्टी में चर्चा किए बिना उनकी उम्मीदवारी का फैसला नहीं करना चाहिए था. वाजपेई ने ध्यान रखा कि भारत का अगला संभावित प्रधानमंत्री होने की बात को लेकर विनम्र रहें. सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया के मशहूर उक्ति की तर्ज पर उन्होंने कहा दिल्ली तो बहुत दूर है.

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RSS से सलाह लिये बिना ही आडवाणी ने कर दी घोषणा

आडवाणी की इस घोषणा के बाद पार्टी के बाकी नेता इतने नाराज थे कि वे इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सके. आडवाणी के सार्वजनिक सार्वजनिक संबोधन के बाद भाजपा के महासचिव केएन. गोविंदाचार्य उनके साथ उनके होटल गए. आरएसएस के नरेंद्र मोदी भी उनके साथ थे. गोविंदाचार्य ने आडवाणी से पूछा आप RSS से सलाह लिए बिना यह घोषणा कैसे कर सकते हैं ?  इतनी बड़ी घोषणा के लिए आर एस एस मुख्यालय की अनुमति आवश्यक थी. आडवाणी ने जवाब दिया  संघ से कहता तो वे कभी इसकी अनुमति नहीं देते. विश्व हिंदू परिषद भी इस फैसले से हैरान थी. अशोक सिंघल ने कहा मुझे नहीं पता था आडवाणी, वाजपेई के नाम की घोषणा करने वाले थे.

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आडवाणी बोले, पार्टी और राष्ट्र के हित में सबसे अच्छा यही

RSS इस पर कई दिनों तक चर्चा करता रहा लेकिन आडवाणी ने खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानने से इंकार कर दिया. आडवाणी ने बस इतना कहा कि मैंने कोई बलिदान नहीं किया है. यह तो सिर्फ इस बात का तार्किक मूल्यांकन है कि पार्टी और राष्ट्र के हित में क्या सबसे अच्छा है और क्या सही है.

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वाजपेयी  को आगे करने के पीछे आडवाणी का तर्क

इस घोषणा के तुरंत बाद पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता ने आडवाणी से पूछा किस बात ने आप को प्रेरित किया वाजपेयी का नाम प्रस्तावित करने के लिए. आडवाणी का जवाब था हमें वोटों को बढ़ाना है उसके लिए हमें अटल जी की जरूरत है. एक अन्य वरिष्ठ भाजपा नेता भी इस बातपर  सहमति जताते हुए कहते हैं कि आडवाणी ने वाजपेई को पीएम पद का उम्मीदवार इसलिए घोषित किया क्योंकि सहयोगी दलों और गठबंधन के सहयोगियों को आज भी अधिक स्वीकार्य थे. हम जानते थे कि हमें उस समय गठबंधन के सहयोगियों की जरूरत थी.

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दिनेश त्रिवेदी भी वाजपेयी के मुरीद

भाजपा के सहयोगी बनने वाले तृणमूल कांग्रेस के दिनेश त्रिवेदी भी मानते हैं आडवाणी चतुर राजनीतिज्ञ थे मैं आपको बता सकता हूं कि यदि आडवाणी पीएम होते तो तृणमूल कांग्रेस भाजपा का समर्थन नहीं करती. आडवाणी के फैसले का एक और कारण यह था कि पार्टी के भीतर के विद्रोहियों को शांत करने के मामले में वाजपेई उनसे बेहतर थे. एक राजनीतिक नजदीकी व्यक्ति का कहना है आडवाणी जी ने मुझे बताया हम हिंदू पुरानी गलती फिर से क्यों कर रहे थे. वे जानते थे कि भाजपा के भीतर कई घड़े वाजपेई को भले पसंद ना करें लेकिन वह उनका सम्मान करते थे .केवल वहीं उन्हें साध सकते थे, आडवाणी में ये हुनर नहीं था.

ऐसे झगड़ों के बीच आडवाणी का निर्णय बहुत असाधारण कदम के रूप में दिखाई देता है जिसमें उन्होंने आत्म गौरव के मुकाबले पार्टी के जीतने की संभावनाओं और एकता को चुना. यह तब और भी स्पष्ट हो जाता है जब वाजपेई वाकई में प्रधानमंत्री बनने. पहली बार 1996 में फिर 1998 में और अंत में 1999 में.

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वसुंधरा बोलीं आडवाणी इतने बड़े थे कि पीछे हट सके

एक वरिष्ठ भाजपा नेता वसुंधरा राजे सिंधिया का कहना है आडवाणी और वाजपेई एक दूसरे के पूरक थे. वे दोनों भावुक व्यक्ति थे दोनों एक दूसरे से कुछ ना कुछ लेते रहते थे. आडवाणी जैसे शख्स वाजपेई के लिए पीछे हट सकते थे वह इतने बड़े थे कि पीछे हट सके.

विनय सेनापति की किताब जुगलबंदी – भाजपा मोदी युग से पहले में इस घटनाक्रम का विस्तार से वर्णन किया गया है. इसका हिंदी अनुवाद नीलम भट्ट और सुबोध मिश्र ने किया है.

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