Opinion

परंपरागत व्यवस्था के जरिये आदिवासी समाज इस तरह कर रहा है कोरोना का सामना

Ghanshyam

कोरोना की पहली लहर में झारखंड के आदिवासी-मूलवासी समाज ने परंपरागत स्वशासन व्यवस्था का भरपूर उपयोग किया. पूरे देश में लॉकडाऊन घोषणा होते ही पूरा समाज सजग हो उठा और हजारों गांवों में ग्रामसभा की बैठक बुलाई गयी और पूरे गांव में बैरिकेटिंग की गयी. अपरिचित आगंतुकों को गांव की सीमा पर ही रोक दिया जाता था. आज भी लगभग ये व्यवस्था कायम है.

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गंभीर पूछताछ के बाद ही उन्हें गांव में तब प्रवेश मिलता था जब गांव वालों को यह विश्वास हो जाता था कि वे आसपास क्षेत्र के हैं. ज्योंही गांव वालों को जानकारी मिलती थी कि वे बड़े शहरों के प्रवास से आ रहे हैं उन्हें गांव में बने आइसोलेशन सेंटर में ससम्मान जगह दी जाती थी.

संबंधित परिवार को इसकी सूचना दे दी जाती थी ताकि उनके भोजन पानी की व्यवस्था वह करे. परिवार की माली हालत अच्छा नहीं रहने पर ग्रामसभा आपस में बैठक कर जरूरत मंद प्रवासी मजदूरों के लिए भोजन-पानी की व्यवस्था करते थे. इतना ही नहीं, गांव के नौजवान प्रवासी लोगों की कोरोना जांच की व्यवस्था में लग जाते थे.

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इस तरह की व्यवस्था बहुत सारे गांवों में देखने को मिली. संताल परगना ,कोल्हान और रांची प्रमंडलीय क्षेत्रों में ग्रामसभा ने अपनी पूरी सक्रियता दिखाई. यहां यह सवाल खड़ा होना लाजिमी है कि ऐसा कैसे संभव हुआ? क्या वास्तव में अभी झारखंड में ऐसे गांव हैं?

जी हां श्रीमान् , आज भी झारखंड में ऐसे हजारों गांव हैं जहां आज भी परंपरागत स्वशासन की व्यवस्था जीवित है. मैंने तीन प्रमंडलीय क्षेत्रों का जिक्र इसलिए किया है कि आज भी इन क्षेत्रों में कहीं “मांझी -परगना” की व्यवस्था चल रही है तो कहीं “पड़हा राजा”की तो कहीं “मुंडा-मानकी” की.

मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि इन तमाम इलाकों में इनसबों के साथ महीनों रहने का अवसर प्राप्त हुआ है. इन्हीं आदिवासी के साथ रहकर हमने यहां की व्यवस्था को नजदीक से जाना और समझा.

इन व्यवस्थाओं के साथ दैनिक क्रिया बरतते हुए ही मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला. और जो कुछ मैंने सीखा वह मेरी स्कूली और विश्वविद्यालीय पढ़ाई से ज्यादा व्यवहारिक और जीवंत लगा. अक्षर-खेती करने के दौरान मैंने जितना कुछ सीखा था उनमें से बहुत सारी चीजें बेमानी लगीं या यों कहें कि अभी भी लग रही हैं.

इनके गांवों में, घरों में रहते हुए यह जाना कि इनकी सामुदायिकता का क्या अर्थ है? हमने यहीं सीखा कि इनके परंपरागत स्वशासन की अवधारणा, संरचना और व्यवस्था का क्या मतलब होता है?

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हमने इन्हीं के बीच रहकर यह जाना कि जंगल और जमीन इनकी अवधारणा में कैसे धरोहर बन जाते हैं? यहां की महिलाओं के लिए जंगल महज आजीविका के श्रोत नहीं होते बल्कि कैसे ” मायका”बन जाता है? इनके बीच रहकर ही हमने जाना कि तीर-धनुष इनके लिए कैसे औजार हैं और दिक्कुओं के लिए हथियार?

यहीं हमने यह भी सीखा कि महिलाओं की मुक्ति का सही अर्थ क्या होता है? कितना गिनाऊं? इसलिए यहां विराम देते हुए इनके स्वशासन की अवधारणा पर चर्चा करता हूं.

इनके लिए स्वशासन शासन चलाने की प्रणाली भर नहीं है. स्वशासन इनके लिए जीवन पद्धति है. इनके स्वशासन में “स्व” पर विशेष ध्यान दिया जाता है. वे सब मानते हैं कि प्रबंधन के लिए जरूरी है स्व का संतुलित विकास हो.

स्व जितना सुदृढ़ और कल्पनाशील होगा समाज उतना ही स्वधर्म का पालन करेगा. स्व सुदृढ़, समृद्ध और संवेदनशील होगा तो वह प्रकृति के प्रति भी और अन्य प्राणियों के प्रति भी जिम्मेदार होगी. स्व की सुदृढ़ता के आधार पर ही

“शासन” की संरचना खड़ी होगी. और इसीलिए दोनों को मिला कर बनता है “स्वशासन” की बुनियाद खड़ी होती है. इसमें जितनी व्यक्ति की महत्ता होती है उतनी समाज की मर्यादा की भी. व्यक्ति समाज का नियंता भी है और समाज के नियंत्रण में भी.

क्योंकि व्यक्ति के स्व के निर्माण और निरुपम में समाज और प्रकृति का योगदान होता है. इसलिए व्यक्ति की मोरल और फिजिकल जिम्मेदारी बनती है समाज संवारने और प्रकृत को समृद्ध करने की. इन्हीं के संयोजन ,समायोजन और संचालन की प्रणाली का नाम है- “स्वशासन”.

इसीलिए आदिवासियत का मूलाधार है- स्वशासन! जिसे आदिवासी अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानते हैं. और जब इसपर हमला होता तब पूरा समाज और समुदाय शाल के पेड़ों की तरह तन कर खड़ा हो जाता है.

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