Opinion

इसे कहते हैं सियासत, सटीक टाइमिंग-जर्बदस्त ड्रामा, वाह मंत्रीजी वाह!

Anand Kumar

इसे कहते हैं सियासत.  महज चार दिन पहले जिन मंत्री जी के लोगों ने मिलकर सिविल सोसाइटी के नाम पर जुबली पार्क खोलने का विरोध किया था, आज उन्हीं बन्ना गुप्ता ने खुद अपने हाथों से जुबली पार्क का गेट खोल दिया. जबर्दस्त ड्रामा और कमाल की टाइमिंग रही. वैसे बताने वाले बताते हैं कि सारा वाकया स्टेज्ड था. आखिरकार क्रेडिट जो लेना था. लेकिन पूछने वाले पूछ रहे कि जब गेट खोलना ही था, तो मंत्रीजी के पीए के संयोजकत्व में बनी सिविल सोसायटी जुबली पार्क को न खोलने की दलीलें क्यों दे रही थी. क्यों बाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा गया कि मंत्रीजी ने बड़ी मुश्किल से कोरोना की दूसरी लहर को थामा है. तीसरी लहर की आशंका जतायी जा रही है. पार्क को खोल दिया गया, तो तीसरी लहर को रोकना मुश्किल होगा. अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि पीए के विचार मंत्री से अलग हों. चूंकि वे सरकार से मंत्री के पीए के रूप में नोटीफाइड हैं, इसलिए मंत्री यह कहकर भी पल्ला नहीं झाड़ सकते कि पीए ने सिविल सोसायटी के संयोजक के रूप में जो किया, वह उनका निजी कार्य था.

बहरहाल न्यूज विंग ने तब भी इस बात को बड़े पुख्ता तरीके से उठाया था कि जुबली पार्क मुद्दे पर बन्ना गुप्ता और बीजेपी के सुर मिल गये हैं. क्योंकि जिस तरह पूर्व सीएम रघुवर दास और उनके चहेते महानगर अध्यक्ष नाना प्रकार के लचर तर्कों के सहारे पार्क और इसके बीचोंबीच से गुजरने वाली सड़क को बंद रखने की वकालत कर रहे थे, ठीक उसी तरह का तर्क सिविल सोसायटी भी दे रही थी.

ram janam hospital
Catalyst IAS

बता दें कि पार्क को खोलने की मुहिम की शुरुआत मॉर्निंग वाकर्स और कुछ पत्रकारों ने की थी, जिसके बाद कुछ शर्तों पर पार्क को सुबह-शाम खोला जा रहा था. लेकिन जब एक सुबह मॉर्निंग वॉकर्स ने पार्क के बीचोंबीच से गुजरने वाली सड़क को खोद कर उसपर घास बिछाई जाती देखी, तो यह मामला और लोगों के संज्ञान में आया. बात जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय तक पहुंची. उनकी पहल पर काम तो रुक गया, लेकिन पार्क नहीं खुला. हालांकि सरयू राय की पहल के बाद यह मुद्दा राजनीतिक जरूर बन गया. इसके तुरंत बाद ही भाजपा ने पार्क की सड़क नहीं खोलने के लिए बयान देने का सिलसिला शुरू किया. इसकी प्रतिक्रिया में सत्तारूढ़ झामुमो ने पार्क खोलने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर डाला. बन्ना गुप्ता तब तक कुछ साफ-साफ स्टैंड नहीं ले रहे थे. बीच में उनका एक अस्पष्ट सा बयान आया, जिसमें उन्होंने कहा कि – “सरकार जुबली पार्क को खोलना चाहती है.” लोगों को इसका अर्थ समझ में नहीं आया. जब सरकार जुबली पार्क को खोलना चाहती थी, तो उसे किसने रोक रखा था. और यही सवाल उठाया ताजा-ताजा बने नागरिक सुविधा मंच ने, जिसकी अगुवाई कर रहे थे ताजा-ताजा दोबारा भाजपाई बने अभय सिंह. अपनी पार्टी की लोकल कमेटी और पूर्व सीएम से बिल्कुल अलग लाइन पकड़ी अभय ने और पार्क खोलने को लेकर लगातार आक्रामक बने रहे. इसी नागरिक सुविधा मंच के रिएक्शन में बन्ना की सेना ने सिविल सोसायटी बनायी थी. खैर, बन्ना जहां साफ-साफ कुछ कहने और करने से बच रहे थे, वहीं उन्हीं की पार्टी के पूर्व सांसद डॉ अजय कुमार ने सीधा और खरा स्टैंड लिया. जुबली पार्क में खड़े होकर उन्होंने जिला प्रशासन और टाटा स्टील दोनों को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि पार्क दो मिनट में खुल सकता है और नहीं खुला तो वे अगला कदम उठायेंगे.

The Royal’s
Sanjeevani

इधर पार्क की राजनीति चरम पर थी, उधर राज्य सरकार प्रतिबंधों में ढील दे रही थी. राज्य भर में पार्क, बाजार, मॉल, सिनेमाघर स्कूल खुल गये. मगर जुबली पार्क न खुला. जमशेदपुर की सड़कों पर भीड़ बढ़ रही थी. जुबली पार्क रोड बंद होने से कीनन स्टेडियम होकर गुजरने वाले स्ट्रेट माइल रोड पर दबाव बढ़ रहा था. सड़क जाम की समस्या बार-बार उभरने लगी थी. उधर गड्ढों से भरे खस्ताहाल मरीन ड्राइव पर लोड बढ़ा, तो दुर्घटनाएं भी बढ़ने लगीं. कीनन स्टेडियम के आगे बाग-ए- जमशेद के पास लग रहे जाम से यातायात पुलिस पहले ही हलकान थी. ट्रैफिक डीएसपी कई बार इस ओर इशारा कर चुके थे कि जुबली पार्क का रास्ता बंद होने के कारण ऐसा हो रहा है.

सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ रहा था और नेताओं पर जनता का. तभी 26 सितंबर की अहले सुबह बाग-ए-जमशेद के सामने सड़क पर पड़ी एक स्कूटी सवार की लाश ने प्रशासन को नींद से जगा दिया. सड़क पर बहे उसके खून के छींटे प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के शफ्फाक दामन पड़कर जवाब मांगते, उससे पहले ही जुबली पार्क की सड़क को खोलने का फैसला कर लिया गया. लेकिन जिस सड़क को लेकर इतने दिन से नाटक चल रहा था, उसे भला बिना किसी ड्रामे के कैसे खोल दिया जाता. कंपनी और प्रशासन को अपने हाथों लगाया ताला खोलना गवारा नहीं था, और स्थानीय विधायकजी जो कि सरकार में मंत्री भी हैं, के रहते कोई दूसरा ताला खोलने का क्रेडिट ले जाये, ऐसा कैसे हो सकता था. लिहाजा स्टेज सेट किया गया. चार दिन पहले जो मंत्रीजी अपने पॉकेट संगठन से जुबली पार्क को खोले जाने का विरोध करा रहे थे, उन्होंने खुद अपने कर-कमलों से पार्क का ताला खोल डाला. खुद को जनभावना का पैरोकार बताते हुए टाटा कंपनी के कुछ अफसरों की फजीहत में दो-चार शब्द कहे, जो जनता को खूब अच्छे लगे. वह सबकुछ भूलभाल कर मंत्रीजी पर फिदा हो गयी. जय-जय होने लगी. पार्क खुल गया. सड़क चालू हो गयी.

तो इस तरह जनता की मांग पूरी हो गयी, मंत्रीजी हीरो बन गये. सबके लिए विन-विन सिचुएशन रही. हां रघुवर दास और उनके समर्थक भाजपाई बेचारे न तो पार्क बंद कराने का क्रेडिट ले पाये, न ही इसे खुलवाने का सेहरा बांध सके. और हां जुबली पार्क के ऊपर से फ्लाई ओवर बनाने का उनका बेजोड़ नुस्खा आठ मिनट में टाटा से रांची पहुंचा देने वाले हाइपर लूप सिस्टम की तरह ही मजाक साबित हुआ सो अलग.

इसे भी पढ़ें-जीत गयी जनता, डेढ़ साल बाद खुला जुबली पार्क

 

 

Related Articles

Back to top button