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पीएम जवाहर लाल नेहरू पर क्या  तंज किया जो इस बेहतरीन गीतकार को जाना पड़ा था जेल

इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल लिखनेवाले मजरूह सुल्तानपुरी की पुण्यतिथि पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : मुकेश की प्यारी आवाज में एक बहुत ही लाजवाब गीत है इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल.. राजकपूर की फिल्म धरम करम  का यह गीत इसके लेखक मजरूह सुल्तानपुरी पर सटीक बैठता है. ये फिल्म तो फ्लॉप रही थी पर ये गीत काफ़ी लोकप्रिय हुआ था.

इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल

जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल

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दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत

कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल

इक दिन बिक जायेगा   …

 

ला ला ललल्लल्ला

(अनहोनी पग में काँटें लाख बिछाए

होनी तो फिर भी बिछड़ा यार मिलाए ) – (२)

ये बिरहा ये दूरी, दो पल की मजबूरी

फिर कोई दिलवाला काहे को घबराये, तरम्पम,

धारा, तो बहती है, बहके रहती है

बहती धारा बन जा, फिर दुनिया से डोल

एक दिन …

(परदे के पीछे बैठी साँवली गोरी

थाम के तेरे मेरे मन की डोरी  ) – (२)

ये डोरी ना छूटे, ये बन्धन ना टूटे

भोर होने वाली है अब रैना है थोड़ी, तरम्पम,

सर को झुकाए तू, बैठा क्या है यार

गोरी से नैना जोड़, फिर दुनिया से डोल

एक दिन …

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असरार हसन खां ऊर्फ मजरूह सुल्तानपुरी

वैसे नाम तो जनाब का असरार हसन खां  रखा गया था लेकिन मशहूर हुए मजरूह सुल्तानपुरी के नाम से . जन्मस्थली सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश का शहर है. मजरूह साहब को इस बात पर बड़ा फख्र था कि ‘मैं राजपूत हूं’… खान तो दुमछल्ला लगा दिया गया है, किसी जमाने में, शायद मुगलों के जमाने में. पुरखों में से किसी को ‘खां’ का खिताब दे दिया गया था, जैसे सर सय्यद अहमद को खान का खिताब मिला था, वैसे ही हमारे यहां खान का खिताब दे दिया गया वर्ना हम लोग राजपूत हैं’..

लिखते वो फिल्मों के लिए थे ..लेकिन अक्सर कहा करते थे कि – ये जगह शोरफा (शरीफ़ लोग) के लिए नहीं हैं’. जब पूछा जाता कि हजरत फिर आप क्यों हैं यहां तो कहते ‘भई पैसों के लिए काम करता हूं लेकिन फिल्मी जिंदगी पसंद नहीं है मुझे.

मजरूह फिल्मों में गीत जरूर लिखते रहे लेकिन हमेशा ये भी कहते रहे कि अपने गीतों को मैं अपनी शायरी नहीं कह सकता. यहां तक कि जब कभी मुशायरों में किसी गीत की फरमाइश होती थी तो कभी नहीं सुनाते थे कहते थे ये गीत आप लता मंगेशकर से सुनिएगा. मुझसे मेरी गजल सुनिए…

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ऐसे हुई फिल्मों में एंट्री

1945 का दौर था, जब मजरूह बंबई के किसी मुशायरे में बुलाए गए थे. मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक एआर कारदार ने उन्हें सुना और उनके मुरीद हो गए. उन्होंने मजरूह को अपनी फिल्म में गीत लिखने को कहा, पर मजरूह साहब ने मना कर दिया. यह बात उनके दोस्त जिगर मुरादाबादी को पता चली, तो उन्होंने मजरूह साहब को समझाया और राजी कर लिया.

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जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे

फिल्म का नाम था ‘शाहजहां’. गीत गाया था मशहूर गायक कुंदनलाल सहगल (के.एल. सहगल) ने और धुन बनाई थी नौशाद ने. ये वही गीत था, जो मज़रूह की कलम से निकलकर हमारे दिलों में दाखिल हुआ. गाना था, ‘जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे’. इस गीत के लिए कहा जाता है कि ये उस वक़्त के दिलफ़िगार आशिकों के लिए राष्ट्रीय गीत के माफिक था. आज भी ये गीत टूटे हुए दिलों की तन्हाई का साथी है.

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बंबई में मजदूरों की एक हड़ताल में मजरूह सुल्तानपुरी ने एक ऐसी कविता पढ़ी कि खुद को भारत के जवान समाजवादी सपनों का कस्टोडियन कहने वाली नेहरू सरकार आग-बबूला हो गई. तत्कालीन गवर्नर मोरार जी देसाई ने बलराज साहनी और अन्य लोगों के साथ मजरूह सुल्तानपुरी को भी ऑर्थर रोड जेल में डाल दिया.मजरूह सुल्तानपुरी को अपनी कविता के लिए माफ़ी मांगने को कहा गया. उसके एवज में जेल से आजादी का प्रस्ताव दिया गया. पर उन्होंने साफ़ शब्दों में इनकार कर दिया. मजरूह सुल्तानपुरी को दो साल की जेल हुई. मजरूह ने यह लिखा था

मन में ज़हर डॉलर के बसा के,

फिरती है भारत की अहिंसा.

खादी की केंचुल को पहनकर,

ये केंचुल लहराने न पाए.

ये भी है हिटलर का चेला,

मार लो साथी जाने न पाए.

कॉमनवेल्थ का दास है नेहरू,

मार लो साथी जाने न पाए.

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इतने साफ और कड़े शब्दों में इस बेखौफ शायर ने वह कह दिया था, जो इससे पहले इतनी सीधे और बेबाक शब्दों में नहीं कहा गया था. यह मज़रूह का वह इंक़लाबी अंदाज़ था, जिससे उन्हें इश्क़ था. वह फिल्मों के लिए लिखे गए गानों को एक शायर की अदाकारी कहते थे और चाहते थे कि उन्हें उनकी ग़ज़लों और ऐसी ही इंक़लाबी शायरी के लिए जाना जाए.

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नौशाद और मदन मोहन के साथ मजरूह

जेल में रहने के दौरान ही मज़रूह साहब को पहली बेटी हुई और परिवार आर्थिक तंगी गुज़रने लगा. मजरूह साहब ने जेल में रहते हुए ही कुछ फिल्मों के गीत लिखने की हामी भरी और पैसे परिवार तक पहुंचा दिए गए. फिर मजरूह साहब 1951-52 के दौर में बाहर आए और तब से 24 मई, 2000 तक लगातार एक से बढ़कर एक गीत लिखते रहे.

सुपरहिट गीतों से सजी यादगार फिल्में

उन्होंने  हिंदी फिल्मों के लिए सैकड़ों बेशकीमती गीत लिखेह संगीतकार नौशाद और फिल्म निर्देशक नासिर हुसैन के साथ उनकी जोड़ी कमाल की रही. हमें बेहतरीन फ़िल्में और दिलनशीन गीत मिलते रहे. उन्होंने नासिर हुसैन के साथ ‘तुम सा नहीं देखा’, ‘अकेले हम अकेले तुम’, ‘ज़माने को दिखाना है’, ‘हम किसी से कम नहीं’, ‘जो जीता वही सिकंदर’ और ‘क़यामत से क़यामत तक’ जैसी कभी न भुलाई जाने वाली संगीतमय फिल्में कीं.

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एसडी बर्मन और आरडी बर्मन के साथ म्यूजिकल सफर

केएल सहगल से लेकर सलमान तक के लिए गीत लिखे और अपने पचास साल के ऊपर के करियर में सैकड़ों ऐसे गीत दिए, जो हमारे वज़ूद का हिस्सा हैं.उन्हें ‘दोस्ती’ फिल्म के ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ-सवेरे’ गीत के लिए 1965 में पहला और आखिरी फिल्मफेयर अवार्ड मिला. 1993 में मजरूह साहब को फिल्मों में उनके योगदान के लिए फिल्मों का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘दादा साहेब फाल्के अवार्ड’ दिया गया.

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मेरी पसंदीदा ग़ज़ल

वो जो मिलते थे कभी हम से दीवानों की तरह

आज यूँ मिलते हैं जैसे कभी पहचान न थी

 

देखते भी हैं तो यूँ मेरी निगाहों में कभी

अजनबी जैसे मिला करते हैं राहों में कभी

इस क़दर उनकी नज़र हम से तो अंजान न थी

वो जो मिलते थे कभी…

 

एक दिन था कभी यूँ भी जो मचल जाते थे

खेलते थे मेरी ज़ुल्फ़ों से बहल जाते थे

वो परेशाँ थे मेरी ज़ुल्फ़ परेशान न थी

वो जो मिलते थे कभी…

 

वो मुहब्बत वो शरारत मुझे याद आती है

दिल में इक प्यार का तूफ़ान उठा जाती थी

थी मगर ऐसी तो उलझन में मेरी जान न थी

वो जो मिलते थे कभी…

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