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पशु तस्करी की अकूत कमाई : कल तक साइकिल नहीं थी, आज लग्जरी कारों में घूम रहे

Manoj Mishra 

Dhanbad : गिरिडीह और धनबाद जिले में पशु तस्करी का पूरा खेल पुलिस की जानकारी में होता है. कभी-कभी जब ग्रामीण जब आला अफसरों से शिकायत करते हैं तो पुलिस हरकत में आती जरूर है पर दो-चार दिन में स्थिति जस-की-तस हो जाती है.

पशु तस्करी पर लगाम लगे भी तो कैसे, आज कोयला तस्करी से ज्यादा कमाई पशु तस्करी में हो रही है. इस अकूत कमाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गोविंपुर से लेकर निरसा व मैथन तक दर्जनों ऐसे लोग हैं जिनके पास कल तक साइकिल नहीं थी, आज लग्जरी गाड़ियों में घूम रहे हैं.

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एक समय था जब ‘कारखास’ की खूब चलती थी. यह पुलिस महकमे का वो शख्स होता था जो वसूली का पूरा हिसाब-किताब रखता था. तस्करी से जुड़े सारे लोग उसके सामने लाइन लगाये रहते थे. आज उसका दौर खत्म होता दिख रहा है क्योंकि बड़े अफसरों ने पूरी कमान अपने हाथ में ले ली है.

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एक थाना क्षेत्र से गाड़ी पार कराने की फीस कई लाखों में

सूत्रों के मुताबिक एक थाना क्षेत्र से जानवरों की गाड़ी पास कराने की फीस कई लाख रुपये होती है. कुछ साल पहले थाना में तैनाती के दौरान एक पुलिस अधिकारी की अच्छी पैठ तस्करों के बीच बन गयी थी. उस अफसर ने जिले के सभी हाइवे का ठेका ले रखा था. वही प्रचलन अब भी है.

अफसर हाइवे के एक अत्यंत महत्वपूर्ण थाना में तैनात है और अब उसी के संरक्षण में पूरा खेल चल रहा है. तभी तो धनबाद-गिरिडीह जिले में कथित सिंघम से लेकर तेजतर्रार साहब भी चुप हैं. 

अब कोई भी सिपाही सड़क पर पशु लदे वाहनों से वसूली नहीं करता, बल्कि ट्रक के पीछे असलहाबंद मालिक कार से चलते हैं जो वाहन को पास करने के बाद एक नियत स्थान पर कारखास को बुलाकर पैसे दे देते हैं. 

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कार्रवाई होती है, सिर्फ सेटिंग के लिए दबाव बनाने के मकसद से

सूत्र बताते हैं कि पशु तस्करों की लोकेशन देने वाले मुखबिर भी इसी कारोबार से जुड़े लोग होते हैं. वे अपने विरोधियों की गाड़ियों की मुखबिरी करते हैं.

उन गाड़ियों को पकड़ा जाता है जिनकी सेटिंग हुई नहीं रहती. पकड़ने पर दबाव बनता है और अंततः सेटिंग हो जाती है. उसके बाद कार्रवाई बंद हो जाती है.

सुपुर्दगी पशुओं का कोई लेखा-जोखा महकमे के पास नहीं 

पुलिस मुख्यालय तथा जिले के आला अफसरों के नकेल कसते ही पशु तस्करों पर धड़ाधड़ कार्रवाई शुरू कर दी जाती है. मवेशी सहित ट्रक, पिकअप और डीसीएम को पकड़ने के बाद पशुओं की बरामदगी दिखाई जाती है और उनको लिखा-पढ़ी में किसी किसान, गौपालक, पशुपालक के सुपुर्दगी में दे दिया जाता है. लेकिन पुलिस की मेहरबानी से ये मवेशी पुन: तस्करों के ही पास पहुंच जाते हैं.

इस संबंध में थानों से जानकारी लेने पर पता चलता है कि सुपुर्दगी के बाद उन पशुओं का कोई लेखा-जोखा महकमे के पास नहीं मिलता. बरामद मवेशियों को इस शर्त पर सुपुर्दगी में दिया जाता है कि उनको खिलाने-पिलाने और देख-रेख का जिम्मा पशुपालक का होगा और पुलिस देख-रेख करती रहेगी. लेकिन असलियत में किसान के यहां से पशु गायब हो चुके रहते हैं.

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इन रास्तों से पशु तस्करी के जुड़े हैं तार 

विभागीय सूत्रों की मानें तो यूपी के इलाहाबाद और कानपुर से प्रतिबंधित पशु लादकर आने वाले वाहन भदौही के ऊंज, गोपीगंज और औराई में पैसा देकर निकल जाते हैं. जिले के मिर्जामुराद, रोहनिया, लंका और रामनगर होते हुए पशु तस्कर चंदौली में प्रवेश करते हैं. यहां से अलीनगर, चंदौली थाने से सैयदराजा का बॉर्डर क्रॉस कर बिहार चले जाते हैं.

इधर, रामपुर, मुरादाबाद, आजमगढ़ से दुल्हपुर के रास्ते गाजीपुर में प्रवेश करने के बाद बिरनो, जंगीपुर, रजागंज पुलिस चौकी होते हुए जमानिया कोतवाली के रास्ते गहमर थाने से होकर बिहार प्रवेश कर जाते हैं. यह रास्ता थोड़ा घुमावदार जरूर है, लेकिन पूरी तरह रात में सुरक्षित रहता है.

जबकि दूसरा रास्ता दुल्हपुर से नोनहरा थाने से होते हुए मुहम्मदाबाद कोतवाली के बालापुर पुलिस चौकी होकर बलिया के नरहीं थाने के भरौली तिराहे से बिहार (बक्सर) को निकलता है. 

बिहार में आराम से पास होती हैं गाड़ियां

बिहार में कड़ाई न होने से गाड़ियां आराम से बरही, बरकट्ठा व गोरहर थाना क्षेत्र से जीटी रोड के रास्ते धनबाद जिला होकर पश्चिम बंगाल के लिए निकल जाती हैं या फिर सरिया-राजधनवार के रास्ते धनबाद जीटी रोड से होते हुए बंगाल ले जाया जा रहा है. 

छह माह पूर्व ही पुलिस ने बिहार के भोजपुर से कंटेनर में पशुओं को लादकर सरिया-राजधनवार के रास्ते से बंगाल ले जाने के दौरान पकड़ा था. वहीं गिरिडीह जिले के धनवार व बिरनी में तस्करी जा रहे गौवंश को बरामद करने के बाद दोनों थानों में कुल 38 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गयी थी जिसमें बिरनी थाना में 13 लोगों को नामजद किया गया, वहीं  धनवार थाना में 25 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गयी. 

धंधा जारी, तरीका बदल गया

गोरखधंधे के गिरोह में एनजीओ, एसपीसीए सहित कई हाइप्रोफाइल लोगों के भी नाम सामने आये, जिस पर पुलिस का यह कहना है कि फिलहाल गुप्त रख मामले की पड़ताल चल रही है.

हालांकि धंधा बदस्तूर जारी है, थोड़ा रूप बदल गया है. अब मोबाइल से तयशुदा स्थान पर पहुंचने के लिए आम सड़क को छोड़कर गांव की गलियों का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसमें भी सावधानी बरतते हुए हर बार अलग-अलग गांव की गलियों से पशुओं को मौके पर ले जाया जाता है.

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