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लोकसभा चुनाव : सिंहभूम संसदीय सीट पर राष्ट्रीय मुद्दे रहेंगे गौण, क्षेत्र की समस्या और आदिवासियत है बड़ा सवाल

Pravin kumar

Ranchi/ Singhbhum : सिंहभूम संसदीय क्षेत्र का चुनाव काफी रोचक होने की संभावना है. एक और महागठबंधन की नाव पर सवार गीता कोड़ा की संसद की दहलीज पर पहुंचने चाह है. वहीं वर्तमान सांसद लक्ष्मण गिलुआ भी फिर से जीत की आस में क्षेत्र का भ्रमण कर रहे हैं और पसीना बहा रहे हैं.

चुनावी तपिश फिलहाल इलाके में देखने को नहीं मिल रहा है. लेकिन इलाके के युवा चुनाव वड़ रहे प्रत्याशियों से सवाल पूछना चाहते हैं. वो सवाल यूपीए और एनडीए प्रत्याशियों को बेचैन करने के लिए काफी होगा. इलाके में राष्ट्रीय मुद्दे पर मतदान होने की संभावना कम है.

वहीं आदिवासियत और क्षेत्र की समस्या के साथ-साथ भाजपा सरकार की नाकामी ही इलाके का बड़ा मुद्दा बनेगा. जिनमें रोजगार, राशन,पेंशन,सिंचाई,पेयजल,बिजली,स्वास्थ्य,कुपोषन के अलावा स्थानीय नीति भी बड़ा सवाल है.

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हर महीने कई लोग हो रहे राशन से वंचित

पिछले दो वर्षों से राज्य की अधिकांश राशन दुकानों पर पॉस मशीन में आधार-आधारित बायोमिट्रिक प्रमाणीकरण के बाद ही कार्डधारियों को राशन दिया जाता है. इस व्यवस्था की वजह से हर महीने व्यापक पैमाने पर लोग राशन से वंचित हो रहे हैं.

खुंटपानी,अनन्दपुर,सोनुआ,गोइलकेरा प्रखंड के कई गांवों के लोगों को बायोमिट्रिक प्रमाणीकरण के लिए गांव से 2.5 किमी दूर जाना पड़ता है, जबकि उनके गांव में ही राशन दुकान है. वहीं गांव में नियमित इंटरनेट नेटवर्क न होने की वजह से पॉस मशीन काम ही नहीं करती.

कई बार सर्वर की समस्याओं के कारण भी दिनभर इंतजार करने के बावजूद प्रमाणीकरण नहीं हो पाता, जिससे वैसे लोगों को अगले दिन फिर से पैसे खर्च करने के साथ ही दैनिक मजदूरी का नुकसान करके आना पड़ता है. इस मुद्दे पर मुख्य विपक्षी दलों का रवैया भी उदासीन रहा है.

अब तक कुछ ट्वीट व मीडिया में बयान के अलावा किसी भी दल में जन वितरण प्रणाली में आधार की अनिवार्यता के विरुद्ध स्पष्ट राजनैतिक प्रतिबद्धता नहीं दिखी है.

आधार का प्रहार केवल जन वितरण प्रणाली तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अन्य जन कल्याणकारी योजनाओं जैसे सामाजिक सुरक्षा पेंशन, मनरेगा आदि की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. रोजगार, राशन, पेंशन, सिंचाई, पेयजल, बिजली, स्वास्थ, कुपोषन के साथ-साथ स्थानीय नीति वोटर इन विषयों पर भी लोग प्रत्याशियों से सवाल करना चाहते हैं.

प्रत्याशी इस तरह से वोटर्स के सवालों का किस तरह और क्या जवाब देते हैं, यह देखना रोचक होगा.

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आदिवासियत को लेकर क्या कहते हैं इलाके के लोग

चाईबासा शहर से सटे तांबो गांव के बागुन बोदरा कहते हैं – वोट देने का अधिकार हमें मिला है और उसका प्रयोग हमलोग जरूर करेंगे. यहां मुख्य मुकाबला गीता कोड़ा और लक्ष्मण गिलुआ के बीच होगा. लेकिन जनता के सवालतो जहां हैं वहां ही रहेंगे.

पार्टी बदल देने मात्र से शासन नहीं बदल जाता. आज जरूरत है, राजनीतिक दलों से सता के दलालों को बाहर निकालने का है. बात आगे बढ़ी तो शासन की व्याख्या भी सामने आ गयी, अफसर तो वही हैं, पुलिस भी वही हैं, पूंजीपति वही है.

हमारे नेता और राजनीतिक दलों में इन्हें नाराज करने या इनसे बहस करने का मद्दा ही खत्म हो गया है. इसलिए लोगों के मन में जो भी सपने उभरते हैं, वे तुरंत धुंध से भर जाते हैं.

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तुईवीर के मानसिंह देवगम कहते हैं –  कोल्हान की राजनीति दलबदलूओं के भरोसे है. जनता की समस्या को राजनीतिक दल ध्यान नहीं देते. सत्ताधारी दल ने भी सीएनटी-एसपीटी कानून से छेड़छाड़ करने की कोशिश की और न जाने कितने आदिवासी विरोधी नीतियों को अमल में लाने का प्रयास किया.

वहीं कोल्हान के लोग आज भी स्वच्छ पेयजल, राशन, पेंशन,रोजगार जैसी सुविधाओं से वंचित हैं. वहीं कोल्हान का सीना चीर कर लोहा निकालकर कंपनियाम अमीर बनती जा रही हैं. लेकिन कोल्हान के लोग दरिद्र और कंगा हैं, इसे लेकर कोई भी राजनीतिक दल संघर्ष नहीं करते, बस माइंस में अपनी हिस्सेदारी की होड़ में लगे रहते हैं. जब चुनाव की तपिश बढ़ेगी तो उम्मीदवारों से यह सवाल हम जरूर पूछेंगे.

हो भाषा साहित्यकार डोबरो कहते हैं –  झारखंड गठन को 19 साल हो गये, लेकिन राज्य में आदिवासी हितों को ध्यान देने वाला कोई दल नजर नहीं आया. आने वाले भविष्य में आदिवासियत की रक्षा के लिए आदिवासियों को अपनी पार्टी बनना ही होगा.

राष्ट्रीय पार्टी आदिवासी मुद्दे को चटनी की तरह प्रयोग इसे झारखंड के आदिवासियों को समझना होगा. आज जरूरत है, राज्य में आदिवासी आधिकार को लेकर एक पार्टी की जो आदिवासी हित का ध्यान रखें. राज्य के कई सीटों पर आदिवासियों की संख्या ज्यादा है.

जब तक हम वहां से आदिवासियत की रक्षा करने वाले लोग लोकसभा और विधानसभा में नहीं भेजेंगे, तब तक आदिवासियों का दुख दूर नहीं होगा. चुनाव चर्चा के केन्द्र में भ्रष्टाचार है, मंहगाई है, अविकास और कुशासन के साथ-साथ आदिवासी अधिकार का सवाल भी है.

इस चुनाव में महागठबंधन को वोट देना कोल्हान के लोगों की मजबूरी जरूर है, लेकिन यह आदिवासियों के लिए समाधान नहीं है.

आदिवासी इलाकों का यह विमर्श कई राजनीतिक दल के लोगों के आचरण और व्यवहार में पिछले दो दशकों में हुए बदलाव की ओर इशारा करता है. इसके अलावा यह भी साफ संकेत देता है कि झंडों के अलग रंगों के बाद भी राजनीतिक आचरण और जुबान की फर्क को जनता जानती है.

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