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514 छात्रों को नक्सली बता कर सरेंडर कराने के मामले की फिर से हो सकती है जांच, डीजीपी ने कहा- जल्द लिया जायेगा निर्णय

Saurav Singh

Ranchi : 514 छात्रों को नक्सली बता कर सरेंडर कराये जाने के मामले की फिर से जांच हो सकती है. इस मामले में सरेंडर करनेवाले निर्दोष छात्रों के परिजनों ने डीजीपी से न्याय की गुहार लगायी है. परिजनों का कहना है कि उन्हें न्याय नहीं मिला है. इस मामले की फिर से जांच हो. फर्जी नक्सल सरेंडर मामले की फिर से जांच होने के मामले में डीजीपी एमवी राव ने कहा कि इस मामले में पुलिस मुख्यालय स्तर पर विचार-विमर्श कर जल्द ही निर्णय लिया जायेगा.

क्या रांची पुलिस ने तत्कालीन डीजीपी डीके पांडेय को बचाया

वर्ष 2013 में दिग्दर्शन इंस्टीट्यूट के तथाकथित 514 छात्रों को नक्सली बता कर सरेंडर कराया गया था. इस मामले में रांची पुलिस के द्वारा 6 अप्रैल 2014 को चाईबासा से गिरफ्तार किये गये रवि बोदरा बयान के बाद भी क्या रांची पुलिस ने राज्य के तत्कालीन डीजीपी डीके पांडेय को बचाया? यह मामला वर्ष 2013 का है. तब रांची, खूंटी, गुमला व सिमडेगा आदि जिलों के 514 युवकों को एक साथ सरेंडर करा कर पुलिस महकमे ने अपनी नाक ऊंची कर ली थी.

सभी युवकों को सीआरपीएफ कोबरा बटालियन के जवानों की निगरानी में पुराने जेल परिसर में रखा गया था और हथियार के साथ उनकी तस्वीरें ली जा रही थीं. उस वक्त सीआरपीएफ झारखंड सेक्टर के आइजी डीके पांडेय हुआ करते थे, जो बाद में राज्य के डीजीपी बने.

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रांची पुलिस पर लापरवाही बरतने का भी आरोप लगता रहा है

फर्जी नक्सली सरेंडर मामले में आरोप है कि रांची पुलिस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उस रिपोर्ट पर गौर ही नहीं किया, जिसमें कहा गया था कि पुलिस के सीनियर अफसरों ने सरेंडर का आंकड़ा बढ़ाने के लिए नक्सली सरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग किया है. इस मामले को लेकर “झारखंड डेमोक्रेटिक संस्था” की ओर से झारखंड हाइकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी थी. जनहित याचिका को संज्ञान में लेते हुए कोर्ट झारखंड सरकार और प्रशासन कई बार फटकार भी लगा चुका है. गौरतलब है कि सरेंडर करनेवाले युवकों में से 128 का पुलिस ने बयान लिया था. इनमें से अधिकांश के पते का पुलिस या तो सत्यापन ही नहीं कर पायी अथवा वे उस पते पर नहीं मिले. इसके बाद रांची के तत्कालीन सिटी एसपी अमन कुमार के आदेश पर इस मामले की जांच बंद कर दी गयी. चर्चा है कि जांच बंद होने के पीछे राज्य के कई बड़े अफसरों की भूमिका है.

क्या है रवि बोदरा का बयान

6 अप्रैल 2014 को रांची पुलिस के द्वारा चाईबासा से गिरफ्तार किये गये रवि बोदरा ने लोअर बाजार थाना में दिये बयान के पेज नंबर तीन और चार में कहा है कि दिग्दर्शन कोचिंग के डायरेक्टर वर्ष 2012 में एक महिला के साथ रविवार के दिन बरियातू स्थित मेरे किराये के मकान पर मुझसे मिलने आये. मुझसे मिल कर मेरे कार्यों के बारे में जानने के बाद उन्होंने बताया कि हम लोग कई लोगों से सेना और पुलिस में बहाली के नाम पर पैसा लिये हुए हैं. आप उन लोगों को भी उग्रवादी बता कर हथियार के साथ आत्मसमर्पण करा दें. ताकि उनकी भी अस्थाई बहाली हो जाये. रवि कांटाटोली स्थित दिग्दर्शन कोचिंग संस्थान गया और रुपये का प्रलोभन दिया. रवि ने दिग्दर्शन कोचिंग के डायरेक्टर दिनेश प्रजापति को कहा कि इसके लिए उग्रवादी संस्था का सदस्य बनना होगा. साथ ही उसे हथियार देना होगा. दिनेश प्रजापति ने कहा कि हम हथियार की व्यवस्था कर देंगे. वर्ष 2012 में दिनेश प्रजापति के द्वारा रवि को चार लड़के और तीस हजार रुपये दिये गये.

रवि ने अपने दिये बयान में कहा है कि गांव देहात के लड़के एवं सरेंडर करनेवाले लड़कों को मैंने खुद को आर्मी से रिटायर्ड कर्नल बताया था. सभी चारों लड़कों को रांची के मेन रोड स्थित एक होटल में करीब 2 महीने रखा गया. जिसका सारा खर्च दिनेश प्रजापति के द्वारा दिया जाता था. कुछ दिन बाद पांच अन्य लड़के को सरेंडर कराने के लिए 80 हजार के साथ एक रायफल, दो, दो नाली बंदूक और तीन पिस्टल दिनेश प्रजापति के द्वारा उपलब्ध कराया गया. सभी 9 लड़कों को कोबरा बटालियन के अधीन पुराने जेल में सरेंडर कराया गया. बाद में और पैसा देने का वादा किया था जो नहीं दिया. बाद में सरेंडर कराये गये सभी व्यक्तियों का सत्यापन कराये जाने पर कई लोगों के विरुद्ध एक उग्रवादी घटना में संलिप्तता की बात सामने नहीं आयी. और उन्हें अपने-अपने घर जाने का निर्देश दिया गया. रवि ने अपने बयान में कहा था कि सरेंडर कराने के लिए हम लोगों की एक टीम थी. सभी लोग मिल कर सरेंडर करवाने का काम करते थे.

इस दौरान रवि को पता चला कि दिग्दर्शन कोचिंग के संचालक दिनेश प्रजापति ने आर्मी एवं पुलिस में बहाली के नाम पर कई लोगों से दो से तीन लाख रुपया लिया है. भुक्तभोगी लड़कों के द्वारा पुलिस के समक्ष शिकायत करने तथा समाचार पत्र में खबर आने पर दिनेश प्रजापति ने मुझे और मेरी पत्नी को दिखाया तथा मुझे अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर मामले को रफा-दफा करने की बात कही गयी. मैंने डर से अपनी पत्नी को जमशेदपुर पहुंचा दिया तथा मैंने रांची छोड़ दिया और चाईबासा में रहने लगा इसी दौरान मुझे चाईबासा से गिरफ्तार कर लिया गया.

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क्या है मामला

झारखंड सहित देश के दूसरे राज्यों में नक्सलियों को राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल करने के लिए सरेंडर कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. इसी के तहत झारखंड पुलिस ने रवि बोदरा नामक शख्स की सहायता ली. रवि के बारे में जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि वह सेना में काम कर चुका है और वहां से रिटायर होने के बाद वह मिलिट्री इटेंलीजेंस से जुड़ गया था. रवि बोदरा ने रांची, गुमला, खूंटी, सिमडेगा जैसे नक्सलवाद प्रभावित जिलों में घूम-घूम कर कैंप लगवाया था और सरेंडर पॉलिसी के तहत हथियार के साथ सरेंडर करने का सुझाव युवाओं को दिया. ऐसे में सीआरपीएफ और सेना में नौकरी पाने के लालच में गांव के युवकों ने जमीन और मोटरसाइकिल बेच कर रवि और दिनेश प्रजापति को पैसे दिये. दोनों ने युवकों से कहा था कि नक्सली के रूप में सरेंडर करने पर ही नौकरी मिलेगी. बाद में सभी युवकों को पुराने जेल में रखा गया.

मामला सामने आने के बाद पुलिसिया जांच की मंजूरी दी गयी. वैसे रांची पुलिस ने जो जांच की उसमें यह कहा गया है कि रवि व दिनेश प्रजापति के साथ बड़े अफसरों के रिश्तों की जांच नहीं की गयी. इन 514 युवकों के फर्जी सरेंडर के बाद इन्हें सीआरपीएफ की देखरेख में रखा गया. हैरानी की बात यह रही कि सरेंडर के बाद किसी भी युवक को कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया था. मानवाधिकार आयोग ने भी इस प्रकार युवकों को रखने के लिए पुलिस अधिकारियों को दोषी बताया था. वैसे पुलिस ने भले ही फाइल बंद कर दी हो लेकिन यह मामला अभी हाइकोर्ट में लंबित है.

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