Opinion

…तो सरकार ने ये मान लिया है कि ये कंपनियां उससे नहीं चल पा रही हैं!

Manish Singh

तो आखिरकार सरकार ने मान लिया कि ये कंपनियां उससे चल नहीं रहीं. और जब आप चला न सकें, तो बेच देना चाहिए. यह फलसफा बड़ा खतरनाक है.

आपको बताया जाता है कि सरकारी कर्मचारी निकम्मे हैं, नकारा, भ्रस्ट और आलसी हैं. ये राष्ट्र के संसाधन, टैक्सपेयर्स मनी चूस कर अपनी जेबें भरते आये हैं. छात्र और किसान की तरह, सरकारी कंपनियों के कमर्चारियों के लिए भी आपके दिमाग मे वही जहर भरा गया है.

पर इन कंपनियों का ट्रैक रिकार्ड देखिये.

कोई पांच करोड़ के इन्वेस्टमेंट से खड़ी एलआइसी आज 30 लाख करोड़ के एसेट तक पहुंच चुकी है. सरकारी क्षेत्र के उद्यम, वित्तीय संस्थान, पेट्रोलियम कम्पनियां, शिपिंग कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया, कॉनकोर और तमाम सरकारी कम्पनियां शून्य से शुरू कर आज हजारों करोड़ के एसेट बन चुकी हैं.

सरकार बताये की यह संपति सरकारी टैक्स झोंक कर बनी है या कर्मचारियों के ताजिंदगी परिश्रम से?

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डिसइन्वेस्टमेंट का असल मुद्दा ऊपरी कमाई है. अटल दौर में राजस्थान के एक 200 करोड़ के सरकारी होटल को महज 8 करोड़ में बेचने के सौदे कोर्ट ने रद्द किया है. क्या आपको नहीं लगता कि 200 करोड़ का माल 8 करोड़ में लेने की लिए कोई भी 40-50 करोड़ के ऊपरी खर्च देने को खुशी खुशी तैयार होगा?

आम भारतीय लॉयल होता है. वह अपने विभाग या कंपनी के लिए जीने मरने को तैयार रहता है. प्रॉपर लीडरशिप मिलनी चाहिए. याद कीजिये भयंकर सोशलिस्ट दौर में, प्राइवेट एयरलाइंस के नेशनलाइजेशन से शुरू की गयी एयर इंडिया, लेट नाइंटीज तक मुनाफे में रही.

यह तब तक मुनाफा और सेवा देती रही, जब तक अटल सरकार ने उसके बैलून में पिन न मार दिया. उसके रूट बेच दिये. उसकी सस्टेनिबिलिटी को ताक पर रख दिया.

हाल तक बीएसएनएल, तमाम सरकारी वर्क कल्चर के बावजूद प्राइवेट आपरेटर्स को कॉम्पटीशन देता रहा. और सरकार को मुनाफा भी. पर इसी मोदी सरकार ने एक ओर आपने प्राइवेट ऑपरेटर को सस्ते में 4 जी दिया, बीएसएनल कर्मचारीयों को 3जी तक नहीं दिया.
इसे मांगने के लिए कर्मचारियों ने आंदोलन तक किया. वह आंदोलन न सिर्फ देशद्रोह करार दिया गया, बल्कि बीएसएनएल के टावर और लाइंस कौड़ियों के किराये पर उसके प्रतिद्वंद्वी को बांट दिये. गला घोंटकर कंपनियों को मारना और निष्प्राण बताकर बेच देना, तथाकथित देशभक्तों की सरकार का तरीका है.

इसका दोष सरकारी कर्मियों पर डाल देना आसान है. पर आज पहली बार सरकार ने खुलकर मान लिया कि इन कंपनियों को अच्छे लीडर देना उसके बस का नहीं. इन्हें चलाना उनसे बस का नहीं.

दरअसल कंपनी और सरकार चलाने में फर्क होता है.

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कंपनी में जवाबदेही होती है, बैलेंस शीट, मुनाफा, ग्रोथ दिखाना पड़ता है. सैलरी देनी होती है. कंपनी को आप भगवान, देशभक्ति, मुसलमान और पाकिस्तान के रिटोरिक से नहीं चला सकते. उसके लिए प्रोफेशनल स्किल चाहिए.

सरकार चलाने के लिए प्रोफेशनल स्किल की जरूरत नहीं. यहां सिर्फ बकैती से काम चलाया जा सकता है. 90 साल जिन्होंने शाखाओं में सिर्फ नेम कॉलिंग और हिन्दू पकड़ने का खेल सीखा उनसे आप कार्पोरेट गवर्नेंस की उम्मीद करते हैं?

इंडियन ऑयल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में बैठा संबित पात्रा उस कंपनी को चलाने के लिए क्या प्रोफेशनल असिस्टेंस देगा? तमाम कंपनियों के टॉप बोर्ड में खाकी चेहरे बिठाये गये हैं. ऐसे लोग जिस कंपनी में बैठे हों, उसका डूबना और बिकना नार्मल है. बल्कि लगता है इनके लोग वहां डुबाने- बेचने-कमाने का रास्ता निकालने के लिए ही भेजे गये हैं.

मगर खतरा यह है कि यही लोग सरकार में भी बैठे हैं. ऐसी सरकार जिसका फलसफा है कि जो कुछ चला नहीं सकते, उसे बेच दिया जाना चाहिए.और अब, इनसे देश भी नहीं चल रहा.

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(यह लेख मनीष सिंह की फेसबुक वाल से लिया गया है. इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इनका न्यूजविंग से कोई लेना-देना नहीं है)

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