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थियेटर : भारत रंग महोत्सव भी कोरोना की भेंट चढ़ गया

Punj Prakash

भारत रंग महोत्सव इस साल कोरोना की भेंट चढ़ गया, साथ ही नाटक पढ़ानेवाले लगभग सारे स्कूल/विद्यालय कोरोना के टाइम से ही पढ़ाई के मामले में बंद पड़े हैं.

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इस महोत्सव और पढ़ाई पर (अतिथि शिक्षक को बुलाना, उसके रहने-खाने-यात्रा और फीस आदि, प्रस्तुति तैयार करना और उसका प्रदर्शन करना) करोड़ों रुपए जो खर्च होते थे, उस पैसे का क्या हुआ?

क्या सरकार ने इस बार पैसा दिया नहीं या दिया तो किसी और मद में ख़र्च हो रहा है? पता कीजिए, संभव है कि “अद्भुत” जानकारी हाथ लगे. बाक़ी कलाकार मारे बे-इलाज/भूखे/आभाव में – अब किसी को घन्टा फ़र्क नहीं पड़ता.

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ऑक्सीजन और इलाज के अभाव में सांस टूट रही हैं, गंगा में लाशें ही लाशें बह रहीं है, जब इस बात तक से अमूमन (ज़्यादातर) किसी को कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता तो कुछ मुठ्ठी भर (रीढ़ और बे-रीढ़ वाले) रंगमंच के कलाकार निपट ही जाएगें तो किसको क्या ही फर्क पड़ता है?

क्या यह अच्छा नहीं होता कि इस बार के भारंगम के बजट से एक कलाकार चिकित्सा (सहायता) कोष ही बना दिया जाता? लेकिन किसको कहा जाए और क्यों कर कहा जाए – यहां अब सुनता ही कौन है बल्कि उल्टे “खलनायक” का टैग मिल जाता है.

संगीत नाटक अकादमी और कला व कलाकार को प्रश्रय देने के नाम पर बनी विभिन्न परम (केंद्र और राज्य की) सरकारी संस्थाएं, कला और कलाकार के लिए कोरोनकाल में क्या किया और क्या कर रहीं है – वो तो जग ज़ाहिर हैं.

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कहीं पढ़ा था कि कलाकार बिरादरी बड़ा संवेदनशील टाइप का जीव होता है लेकिन यहां तो असंवेदनशीलता चरम पर है. धूमिल ने सच में बहुत पहले ही परम सत्य कुछ यूं अर्ज़ कर दिया था –

वो कवि हैं
कथाकार है
कलाकार हैं
अर्थात
कानून की भाषा बोलता हुआ
अपराधियों का संयुक्त परिवार है.

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