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मुस्लिम समाजः आतंकवाद से सबसे ज्यादा नुकसान मुस्लिम समाज को ही हुआ है

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MD. MAHFUZ

 

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भारतीय मुसलमानों को जितनी घृणा साम्प्रदायिकता, उग्रवाद से है उतनी ही नफ़रत आतंकवाद से है.  जब भी देश में कोई आतंकवादी घटना होती है, सबसे अधिक प्रभावित होने वाला समाज मुस्लिम समाज है.  ऐसी घटनाओं के बाद उसकी परीक्षा शुरू हो जाती है. उसके देश प्रेम की, धैर्य की, समझदारी की. प्रायः इस प्रकार की घटनाओं के बाद कुछ गिरफ्तारियां भी की जाती हैं, उनका मिडिया ट्राईल होता है. बिना किसी जांच के अदालत से पहले उन्हे आतंकवादी घोषित कर दिया जाता है. अधिकांश मामलों में लम्बी अवधि तक जेल में रहने के बाद सबूत के अभाव में उन्हे बरी कर दिया जाता है. ताज़ा मामला 27 फरवरी 2019 का है जब नासिक, महाराष्ट्र की एक विशेष अदालत ने 11 मुस्लिम को 25 साल तक जेल में रहने के बाद बाइज्ज़त रिहा कर दिया. ये लोग 1994 में भुसावल में घटित आतंकवादी घटना के बाद गिरफ्तार किये गये थे. और उन पर  टाडा लगाया गया था. जबकि वर्ष 1994 में ही टाडा कानून समाप्त कर दिया गया था. इन 11 लोगों में एक डाक्टर, तीन इन्जीनियर, एक वार्ड काउंसिलर, एक पीएच डी डिग्री धारक भी थे. जिन्हे रातों-रात आतंकवादी घोषित कर दिया गया था. इनकी जिंदगी के ये 25 साल कौन वापस करेगा?  शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक रूप से प्रताड़ित हुए, इसकी क्षतिपूर्ति कौन करेगा. क्या इन मासूम लोगों को नर्क जैसी जिन्दगी जीने के लिए जिम्मेदार लोगों को कभी सजा मिलेगी. 25 वर्ष की अवधि कोई छोटी-मोटी अवधि नहीं होती है. यह तो एक उदाहरण है. ऐसे अनेक लोग इस प्रकार की यातना से गुजरने को विवश हैं. आश्चर्यजनक और दुख की बात यह है कि ऐसे मासूम लोगों की रिहाई मिडिया की सुर्खी नहीं बनती है, जो आतंकवादी का सर्टिफिकेट देने में आगे रहती है.

14 फरवरी को पुलवामा की घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया. एक जिम्मेदार नागरिक की तरह देश के मुस्लिम समाज ने भी इसकी भर्त्सना की और देश के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहा. मगर पुलवामा और बालकोट के हवाई हमले के बाद कुछ राजनीतिक दल और साम्प्रदायिक तत्वों ने जिस तरह इसका ध्रुवीकरण किया और जो वातावरण बनाया, वह चिन्ताजनक है. इन घटनाओं का राजनीतिकण किया गया. लेकिन जब तथ्य सामने आये तो सारे दावे धराशायी हो गये.

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भारतीय मुसलमान कोई अंतरिक्ष से आया हुआ प्राणी नहीं है. उसकी भी वही समस्याएं हैं, जो एक आम नागरिक की होती हैं. उसे भी रोटी, कपड़ा, मकान, सम्मान और सुकून चाहिए. उसे भी अच्छी शिक्षा, रोजगार की तलाश है. उसे भी देश से उतना ही प्यार है, जितना दूसरों को. देश की स्वतंत्रता और देश के निर्माण में उसके योगदान को कम नहीं आंका जा सकता है. लेकिन आतंकवाद के नाम पर उसके साथ जो कुछ किया जाता है, उससे वह जरूर आहत है. अवशयकता है इनके शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक विकास की. न कि मात्र वोट  के लिए उनके इस्तेमाल की.

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SP Deoghar

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