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दुनिया गुजर सकती है एक भारी आर्थिक मंदी से

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Faisal Anurag

Faisal Anurag
दुनियाभर में मध्यवर्ग बेचैन है. भारत का मध्यवर्ग भी परेशान नजर आ रहा हैं. इसका असर राजनीति पर साफ दिखने लगा है. फ्रांस में येलोवेस्ट आंदोलन पिछले कई दिनों से चर्चा में है. उसका असर यह हुआ है कि फ्रांस के प्रेसिडेंट को कई ऐसी घोषणा करनी पड़ी हैं, जो वर्तमान आर्थिक परिप्रेक्ष्य में आंदोलनों के दखल का संकेत है. इस दखल ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्लोबल आर्थिक नीतियों से आवाम भी भारी असंतोष में है.
आर्थिक नीतियों के नतीजे सार्थक नहीं रहे हैं और जनअसंतोष का वैश्विक रूझान इस कारण उभरने लगा है. दुनिया के अनेक बड़े अर्थशास्त्री अब कह रहे हैं कि आने वाले दिनो में दुनिया एक भारी आर्थिक मंदी से गुजर सकती है. उसके लक्षण साफ दिख रहे हैं. इन अर्थवेत्ताओं का यह भी मानना है कि वैश्वीकरण की आर्थिक प्रक्रिया अपेक्षित दिशा में नहीं चल रही है और एक तरह से विफलता की ओर बढ़ रही है और इसके खिलाफ वैकल्पिक अर्थ संरचना की प्रक्रिया भी नहीं के बराबर चल रही है. येलोवेस्ट आंदोलन का यूरोप के अनेक देशों में असर दिख रहा है. ब्रसेल्स में जिस तरह से युवा विस्फोट हो रहा है, उससे सभी वर्गों में चिंता बढ़ रही है. बेक्जिट को भी इसी संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है.

लेबर पार्टी के नेता कोर्बिन लगतार कह रहे हैं कि वर्तमान में आर्थिक तंत्र में बड़ा वर्ग वंचना का शिकार है और जब तक धन और संपत्ति में सबकी बराबर की हिस्सेदारी तय नहीं होगी, तब तक असंतोष का वर्तमान दौर जारी ही रहेगा, साथ ही यह और ज्यादा गहरा होगा. अमरीका और चीन का बढ़ता हुआ आर्थिक तनाव एक नए तरह के शीत दौर का संकेत देने लगा है. इसका असर उन देशों पर ज्यादा हो रहा है जो कि छोटी अर्थव्यवस्था है और उनकी निर्भरता इन देशों की मदद पर ज्यादा है. सभी जानते हैं कि वर्ल्ड बैंक या आइएमएफ जैसी संस्थाओं को अमरीका अपने हितों में इस्तेमाल करता है और अपने विरोधी देशों के खिलाफ वह आर्थिक प्रतिबंध का हमला करता है और इन संस्थाओं को इसमें सहयोगी भी बना लेता है. मध्यवर्ग को ऐसी स्थिति में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है.

यूरोप के अलावा भी दुनिया के अनेक दूसरे हिस्सों में भी विरोध प्रर्दशनों का माहौल है. ब्राजील हो या अफ्रीका हर जगह आर्थिक समानता की मांग तेजी से उभर रही है. इन आंदोलनों से कोई व्यापक राजनीतिक बदलाव आ जाएगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन सत्ता प्रतिष्ठानों और आर्थिक सत्ता की ताकतों पर उसका असर साफ दिखता है. आर्थिक क्षेत्र के विशेषज्ञ भी अब विमर्श कर रहे हैं कि दुनियाभर में आर्थिक सुधारों की जो प्रक्रिया डंकल प्रस्तावों की स्वीकृति के बाद शुरू हुयी थी, उसकी विफलता के संकेत क्यों मिलने लगे हैं. पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था गहरे संकट में क्यों फंसती जा रही है. आर्थिक जानकारों के बड़े तबके में इस बात की चिंता झलक रही है कि वर्तमान गतिरोध से यदि आर्थिक प्रक्रिया को नहीं निकाला गया तो उसके परिणाम भयानक होंगे. अमरीका ने जिस तरह का संरक्षणवादी कदम उठाया है, उसे लेकर भी गहरी चिंता व्यक्त की जा रही है. अमरीका में ट्रंप शासन यह प्रचार कर रहा है कि रोजगार के क्षेत्र में हालात सुधरे हैं, लेकिन अमरीका में हुए हाल के चुनावों में दिखा कि उसके दावे पूरी तरह सच नहीं हैं. तथा जिन लोगों ने ट्रंप को वोट दिया था उससे कई तबकों में निराशा है.

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इसका असर आने वाले दिनों में गहरा ही होगा,यह आकलन अमरीकी मीडिया का है. फ्रांस के येलोवेस्ट आंदोलन के समय ट्रंप ने जिस तरह फ्रांस के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी की, उसे लेकर फ्रांस में तीखी प्रतिक्रिया हुयी. फ्रांस में युवाओं का यह उभार साठ के दशक की यादें ताजा करता है. साठ के दशक में पेरिस से उभरा आक्रोश यूरोप के अधिकांश देशों में फैला था. इसमें युवाओं के साथ बड़े पैमाने पर मध्यवर्ग और बुद्धिजीवियों ने भागीदारी कर व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध किया था.

पूंजीवादी संरचना को उससे चोट पहुंचा था और यूरो सोशलिज्म उस दौर में एक लोकप्रिय विचार के रूप में उभरा था, जिसका वैश्विक असर पड़ा था. येलोवेस्ट ने यह तो जता ही दिया है कि आर्थिक रूप से दुनिया संकट में है तथा वह आवाम के विभिन्न तबकों की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रही है. इसका भी वैश्विक असर देर-सबेर दिखेगा, भारत में भी यह बहस लगातर तेज हो रही है कि क्या वर्तमान आर्थिक गतिरोध के दौर से भारत निकल सकता है. साथ ही यह आर्थिक गतिरोध रोजगार पैदा करने में लगातार विफल साबित होती जा रही है. देशभर में इसका असर अब दिखने लगा है. पांच राज्यों के चुनावों के परिणाम भी इसी दिशा में संकेत करते हैं.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं)

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