Opinion

केरल की वो महिला जिसकी कोरोना के खिलाफ विजयी लड़ाई की चर्चा आज पूरे विश्व में हो रही है

Faisal Anurag

वे गेस्ट लेबर हैं इसलिए उन्हें अतिथि की तरह ही सुविधाएं दी जाएंगी. ये गेस्ट लेकर कोई ए मजदूरों के  एक्सक्यूटिव नहीं हैं बल्कि वे माइग्रेंट लेबर हैं जो केरल में अपनी आजीविका के लिए झारखंड बिहार सहित कई राज्यों से आए हैं. केरल की उन्नति और निर्माण में इनके श्रम की बडी भूमिका है. कोट्टययम में मार्च के अंतिम सप्ताह में अपने घर परिवार के पास वापस जाने की मांग को ले कर जब इन मजदूरों ने प्रदर्शन किया तो केरल सरकार ने पुलिस बल प्रयोग करने के बजाय उनसे संवाद करने का तरीका अपनाया.

यही नहीं केरल सरकार ने उन समस्याओं और असुरक्षाबोध का अध्ययन किया जो मजूदरों के मन में है. मजदूरों के मनोविज्ञान को समझने के लिए केरल सरकार ने विशेष प्रयास किया. यह उसी वक्त की बात है जब सूरत में भी मजदूर सडको पर आ गये. कुछ आगजनी की घटनाएं भी हो गयीं. गुजरात सरकार ने मजदूरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया और सैकड़ों  मजूदरों को गैर जामानती धाराओं में गिरफ्तार कर लिया. सूरत में मजदूरों के भीतर भरोसा पैदा करने के बजाय डर पैदा करने के तमाम प्रयास किए गये.

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ठीक इसी समय मुंबई में भी मजदूर सड़कों पर आये और विरोध करते हुए घर जाने के लिए आवाज बुलंद किया. बिहार के मुख्यमंत्री ने तो इन मजूदरो की राज्य में वापसी के तामम उम्मीदों को खत्म करते हुए तल्ख बयान दिया. जबकि योगी आदित्यनाथ ने पुलिस बल से सड़क मार्ग से वापसी कर रहे मजतदूरों के साथ बर्बर बल प्रयोग किया. दिल्ली में भी विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए बल प्रयोग किये  गये. केरल सरकार ने राज्यों के खनपान के अनुरूप भोज्य सामग्री का प्रबंध किया. इसमें बिहार, यूपी, गुजरात महाराष्ट्र ओडिशा सहित अन्य राज्यों की विशेषताओं का भी ध्यान रखा गया. जिन मजूदरों के ने स्वयं खाना बनाने के लिए कहा उन्हें कच्ची खद्य सामग्री दी गयी. इसके साथ मजदूरो के मनोरंजन के लिए शतरंज और कैरमबोर्ड दिये गये.

इसके साथ ही हर मजदूर को घर से संपर्क बनाने के लिए 150 से 200 रुपये तक के माबाइल रिचार्ज का प्रबंध किया गया. इसके साथ नियमित हेल्थ जांच के लिए डाक्टरों के नेतृत्व में एक दर्जन से ज्यादा मोबाइल चिकित्सा की व्यवस्था की गयी है. जो एक कैंप से दूसरे कैंप में नियमित जांच के लिए जाती है. इन प्रबंधों का असर यह हुआ जब 14 अप्रैल के आगे भी लाकडाउन को जारी रखने की घोषणा की गयी तो सूरत और मुबई में विरोध में मजदूर सड़क पर आ गये लेकिन कोट्टययम जैसा विरोध केरल में एक स्थान पर भी नहीं हुआ.

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इस केरल मॉडल की चर्चा दुनिया भर की मीडिया की सुर्खियों में है. अमरीका से ले कर ब्रिटेन तक के प्रमुख अखबारों ने इस पर आलेख प्रकाशित किये हैं. केरल के इस मॉडल के नायक मुख्यमंत्री पिनपायी विजयन और उनकी सरकार की स्वस्थय मंत्री केके शैलजा हैं, जो पूरे केरल में टीचर अम्मा के नाम से विख्यात हैं. इसका श्रेय उन तमाम अधिकारियों और कर्मचारियों भी केरल सरकार देती है जिन्होंने दिनरात मेहनत कर अतिथि मजदूरों को अतिथि की तरह सम्मान देने में मेहनत किया है.

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लेकिन केरल सरकार ने तय किया कि वह अपने राज्य के लगभग साढे तीन लाख मजदूरों को होटल में तो नहीं रख सकती है. लेकिनि उनके जीवन को आसान बनाने का प्रयास करेगी. केरल सरकार ने मजदूरो के लिए एक  योजना को जमीन पर उतारा. सबसे पहले उन्हें अतिथि श्रमिक से पुकार कर पूरे राज्य में संदेश दिया कि उनकी भाषा, संस्कृति और खानपान की आदतों के अनुरूप उनसे व्यवहार किया जाए.

केरल वह राज्य है जहां मार्च के मध्य में तेजी से कोरोना वायरस का तेजी प्रसार हो रहा था. उसने बड़ी कुशलता से उस पर काबू करने का प्रयास किया है. यह वही समय है जब मुबई में और अन्य राज्यों से केरल में तेज गति से कोविड 19 का विस्तार हो रहा था. पिछले एक सप्ताह भी इक्के दुक्के केस ही केरल में आए हैं.

जबकि अहमदाबाद और इंदौर में होड़ लगी हुई हैं. और महाराष्ट्र बुरी तरह प्रभावित है. यह वही अहमदाबाद है जहां अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप के स्वागत के लिए हजारो अमरीकी नागरिक बिना जांच के आए थे. केरल को छोड़ कर केवल गोवा ही एक ऐसा राज्य है जिसने कोविड के विस्तार पर अंकुश पाया है. केरल सरकार ने विपक्ष को भरोसा में लिया और उनके सुझावों को भी अमली जामा पहनाया.

केरल ने उसी जनवरी से ही कोविड 19 को ले कर तैयारी शुरू कर दी थी, जब चीन के बुहान में केस लगातार बढ रहे थे. केरल ने यह तैयारी इसलिए शुरू की थी कि क्योकि वह 2018 को नहीं भूल पाया था. जब निपाह वायरस ने हमला किया था और केरल बुरी तरह प्रभावित हुआ था. हालांकि उसने उस पर जल्द ही काबू पाया था. लेकिन तब तक जान के नुकसान हुए थे. केरल ने विजयन और शैलजा के नेतृत्व में ही निपाह का मुकाबला किया था. महामारी से लड़ने के केरल के अनुभव से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. केरल की कामयाबी का एक बड़ा कारण उसकी मजबूत स्वास्थ्य संरचना है. जिस पर केरल की सरकार काफी खर्च करती है. केरल में अब तक केवल दो लोग की जान गयी है, जो बहुत कुछ कह देती है.

कौन हैं शैलजा

एक साधारण सी महिला. रसायन शास्त्र में स्नातक. वर्ष 2004 तक एक हाई स्कूल में पढ़ाया. फिर राजनीति में शामिल. वर्तमान में, केरल की वामपंथी सरकार की स्वास्थ्य मंत्री- केके शैलजा. पूरे केरल में इन्हें टीचर अम्मा के नाम से जाना जाता है, शैलजा टीचर. 2018 के निपाह वायरस को संक्रमण से होने वाले मौत के जुलूस को मजबूती से रोक दिया था. फिर इसके ठीक दो साल बाद, जिस तरह कोरोना का मुकाबला कर केरल मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हासिल करवाई – वह निश्चित ही इतिहास में दर्ज होगा.

इस कोरोना काल में भी वे रात 12 बजे कार्यालय छोड़ती हैं. सभी अधिकारियों को रवाना कर फिर खुद प्रस्थान करती हैं. घर पर भी रात 2.30-3.00 बजे तक फाइलें देखती -निपटाती है. फिर सुबह सात बजे ऑफिस पहुंच जाती है. उनका व्यक्तिगत मोबाइल नंबर न जाने कितने ही आम लोगों को पता है. निपाह के दौरान ही, केरल के राज्य भर में चमगादड़ों का आतंक पैदा हुआ. अब कोरोना के दौरान बिल्ली तक को देख आस पड़ोस के लोग घबरा कर फोन करने लगे. उन्होंने स्वयं फोन उठाकर सभी को आश्वस्त किया.

किसी को साथ में लेने के बजाय अकेले ही तमाम अस्पतालों में घूमती हैं. बस चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान. प्रचार की रौशनी से सैकड़ों कदम दूर. एक नियम के तौर पर, रोजाना केवल एक बार पत्रकार वार्ता बुलाती हैं. छिपाने के लिए नहीं, बल्कि जानकारी देने के लिए. श्रेय भी नहीं लेना चाहती. बस कहती है, “I don’t do anything special. I have a degree in chemistry so I have some knowledge about molecules and medicines. Otherwise, it is always a team effort” (मैं कुछ भी विशेष नही कर रही हूं. मेरे पास रासायन शास्त्र की डिग्री है, इसलिए मुझे अणुओं और दवाओं के बारे में कुछ जानकारी है. अन्यथा, यह हमेशा एक टीम प्रयास है). इस तरह की महामारी से लड़ने के लिए के शैलजा आज सबसे ज्यादा चर्चा में हैं.

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