Opinion

भारत की लोकतंत्र को लोगों की चेतना और ताकत ने बचाया

Faisal  Anurag

भारत का वह लोकतंत्र जिसे भारतीय संविधान ने न केवल सुरक्षा दिया, बल्कि जीवन जीने के अनेक मूल्यों को भी बताया. उसे पैंतालीस साल पहले इमरजेंसी लगाकर खत्म करने का प्रयास किया गया था. लोकतंत्र बचाने के लिए भारत के लोगों ने हर मुमकिन प्रयास किया और ढाई साल बाद ही बंधक लोकतंत्र को आजाद करा दिया. यह भारत के लोगों की चेतना और ताकत ही के कारण संभव हुआ.

भारत उन चंद देशों में है, जो 1947 में आजाद होने के बाद से लोकतंत्र को न केवल बचाए हुए हैं. बल्कि लोगों की आस्था बन गया है. इंदिरा गांधी ने 25 जून की रात देश के तमाम बड़े विपक्षी दल को नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था. जिसमें जयप्रकाश नारायण भी शामिल थे. 26 जून की सुबह आठ बजे जब उन्होंने इमरजेंसी लगाने का आकाशवाणी से एलान किया, तो देश सन्नाटे में डूब गया. लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे, जो इसका जश्न मनाने लगे. उस इमरजेंसी का जिसमें लोगों के जीवन के अधिकार को भी छीन लिया गया था.

 

45 सालों बाद भारत में एक बार फिर लोकतंत्र और संविधान को लेकर चर्चा हो रही है. इतने सालों के बाद भी बहुत कुछ बदला है, लेकिन बहुत कुछ नहीं भी बदला है. दुनिया में डेमोक्रेसी की रैकिंग करने वाले संस्थाएं कह रही हैं कि भारत में लोकतंत्र कमजोर हो रहा है और वह अपनी अर्थव्यवस्था की तरह ही कराह रहा है. इसे कमतर नहीं आंका जा सकता है. 2019 के लोकसभा चुनाव में भी लोकतंत्र बचाने का सवाल प्रमुख बनकर उभरा था.

आखिर वे क्या कारण हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर सवाल उठ रहे हैं. यदि संकटों के बीच दुनिया के अनेक लोकतंत्र एकाधिकारवाद की ओर जा रही है, तो इसमें भारत का नाम भी शामिल है. भारत में जिस तरह सवाल पूछने वालों और हकों के लिए लड़ने वालों के खिलाफ राज्यतंत्र व्यवहार कर रहा है, उससे अंदेशा मजबूत ही होता है. पिछले साल नागरिकता कानून के खिलाफ जो आंदोलन शुरू हुआ लॉकडाउन लगने तक जारी था, उसमें शामिल नेताओं और खासकर छात्र नेताओं को दिल्ली पुलिस ने पिछले 90 दिनों में जेल में डाला है वह कोई सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं है.

हिंसा की बात करने वाले भाजपा नेता कमिल मिश्र सांसद विधुड़ी, मंत्री अनुराग ठाकुर के खिलाफ खामोश रहने वाली पुलिस ने गांधीवादी हर्ष मंदर और योगेन्द्र यादव को ही हिंसा भड़काने वालों में मानकर चार्जशीट दायर किया. हालांकि इस चार्जशीट में इनके भाषणों के किसी भी अंश की चर्चा नहीं है.

जबकि उनके सारे भाषण पब्लिक में मौजूद हैं. यह मंशा बताती है कि सत्ता की ताकतें उन आवाजों को कुचलाना चाहती हैं, जिन्होंने सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद किया है. इमरजेंसी में भी तो यही हुआ था. लेकिन अभी अघोषित तौर पर उन तमाम प्रावधानों का इस्तेमाल हो रहा है, जो इमरजेंसी के दौर में बदनाम हो चुका है. यूपीए को लेकर भी यह सवाल पूछा जा रहा है कि आखिर राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ ही उसका इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है.

प्रधानमंत्री मोदी को बार-बार कोऑपरेटिव फेडरलिज्म और लोकतंत्र की दुहाई देते हैं. लेकिन अनुभव बताता है कि जब कोई हक के लिए सक्रिय होता है, उसके खिलाफ न केवल देशद्रोह के मामले दर्ज कर दिये जाते हैं बल्कि जेल में डाल दिया जाता है.

किसान नेता अखिल गगोई हों या उनके ही साथी बिट्टू सोनेवाल महाराष्ट्र की जेलों में बंद वे बुद्धिजीवी जिन्हें अबैन नक्सल कहा जा रहा है. आदिवासी हों या दलित. एनआरसी और नागरिकता कानून के खिलाफ आवाज उठाने वाले हों या फिर वे कलाकार जो सच के साथ हों. सब पर देशद्रोही होने का आरोप लगा उन्हें जिस स्तर पर बदनाम किया जाता है, वह किसी सशक्त लोकतंत्र का परिचायक नहीं है.

डेमोकेसी के कमजोर होने के कारण वैश्विक संस्थाओं ने गिनाए हैं, उसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा के हनन का आरोप भी है. आज मीडिया स्वतंत्रता की रैंकिंग में भारत जहां पर खड़ा है, वह भी इसे ही पुष्ट करता है.

 

दो साल पहले एक किताब आयी थी, हाऊ डेमोक्रेसी डाई. ये किताब दुनिया भर में छा गयी. इसका एक बड़ा कारण लोकतंत्र किस तरह मरता है, इसके तथ्यों के प्रति लोगों की सजगता भी रही है. इस किताब के लेखक हैं हॉवर्ड विश्वविद्यालय के स्टीवन लेवित्सकी और डेनियल जिब्लेट. दोनों ही राजनीति विज्ञान के नामी प्रोफसर हैं. इस पुस्तक में जो बातें कही गयी हैं उसमें भारत का संदर्भ तो नहीं है. लेकिन उसमें जो कुछ कहा गया है वह भारत के यथार्थ से बहुत अलग भी नहीं है.

लेखक लिखते हैं कि ज्यादातर लोकतंत्र धीमी गति से मुश्किल से दिखने वाली से मौत मरते हैं. लोकतांत्रिक तरीके से चुने गये शासक आमतौर पर कानूनी उपायों का ही उपयोग करते हुए गैर लोकतांत्रिक व्यवहार और सत्ता हासिल कर लेते हैं.

तानाशाही वाले देशों की तुलना में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गये नेताओं की एकाधिकरवादी प्रवृति खतरनाक तरीके से कानूनों का इस्तेमाल कर नागरिक अधिकारों का हनन करती है. इस किताब में ज्यादातर उदाहरण तो यूरोपत्र अमरीका,दक्षिण अमरीका और अफ्रीकन नेताओं का उदाहरण दिया गया है कि किस तरह उन्होंने अपनी चुनी हुई ताकत का इस्तेमाल कर एकाधिकारवाद हासिल कर लिया.

स्य के पंतिन हों या अर्बान का हंगरी इसका बडा उदाहरण है. कोरोना संकट के बीच तो अर्बान ने संविधानगत अधिकारों के स्थगन तक की बात कर दी.

कोविड संकट के बीच एकाधिकारवादी प्रवृतियों की चर्चा भारत में तेज हो गयी है, जब राज्य और केंद्र के बीच के संबंधों में तनाव महसूस होने लगा है. यही नहीं भारत में जिस तरह चुने हुए प्रतिनिधियों का इस्तीफा देकर दलबदल कराने की प्रवृति तेज है, उसके भी खतरनाक परिणाम दिखने लगे हैं. इमरजेंसी में तो नागरिक अधिकारों के स्थगन की बात की गयी थी, लेकिन पिछले तीन साल के भारत में नागरिक अधिकारों को धीमी मौत के गड्ढे में धकेल दिया गया है.

इमरजेंसी की त्रासदी को याद करने का वास्तविक लक्ष्य लोकतंत्र और संविधान के प्रति समर्पित होना है और हर एक तानाशाही प्रवृति के खिलाफ आवाज बुलंद करना.

 

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