न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

सरकार के लिए चेतावनी है किसान और मजदूरों की एकजुटता

संदर्भः 8-9 जनवरी की दो दिवसीय हड़ताल

2,453

FAISAL  ANURAG

यह पहला अवसर है कि देश भर के मजदूर और किसान, एक साथ दो दिवसीय हड़ताल में शामिल हो अपनी  एकजुटता का परिचय दिया है और राजनीतिक नजरिये से सरकार के खिलाफ इन तबकों के आक्रोश को प्रकट किया है. किसने बनाया हिंदुस्तान, देश के मजदूर और किसान के नारे ने एक ऐसे राजनीतिक नरेटिव का संकेत दिया है, जिसमें मोदी सरकार की कारपोरेटपरस्त नीतियों का प्रतिरोध आनेवाले चुनाव के संदर्भ में अनेक संकेत देता है. 2004 में वाजपेयी सरकार जब शाइनिंग इंडिया के साथ दोबारा जीत का सपना बुन रही थी, तब मजदूर और किसानों ने उसे एक करारी हार में बदल दिया था. 2019 के पहले मजदूरों और किसानों की नाराजगी और उनकी राजनीतिक एकजुटता अनेक संकेत दे रही है.

मजदूरों और किसानों के आंदोलन का देश के कई राज्यों में व्यापक असर हुआ तो कई राज्यों में हड़ताल औसत ही रही है. मजदूर संगठनों की 12 सूत्री मांग को लेकर भाजपा के निकट के मजदूर संगठन को छोड़  कर सभी ट्रेड यूनियनों ने इसका आह्वान किया था. इसमें सबसे प्रमुख मांग उन श्रम विरोधी नीतियों और कानूनों और प्रस्तावित कानूनों के विरोध में है, जिससे न केवल मजदूरों के काम के अवसर और हालात प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि जिसके कारण सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान अपनी मूल चेतना और मकसद से वंचित किये जा रहे हैं. जब से देश में ग्लोबलाइजेशन की नीतियों को अपनाया गया है, तब से सार्वजनिक क्षेत्र खतरे में हैं. आर्थिक सुधार के नाम पर उन पर संकट के बादल छाये हैं.

पिछले कुछ सालों में मजदूरों के लिए स्थितियां खराब हुई हैं. खासकर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है. सार्वजनिक क्षत्रों में भी रोजगार के अवसर न केवल सीमित हुए हैं बल्कि कार्यरत मजदूरों को अनेक तरह की परेशानियों से गुजरना पड़ रहा है. कल तक जो प्रतिष्ठान बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे, निजी घरानों के हवाले किये जाने की चर्चा में हैं. एचएएल का आर्थिक संकट बता रहा है कि दुनिया में विमान बनाने वाला एक बेहतरीन संस्थान किस तरह आज वेतन भुगतान के लिए ओवरड्राफ्ट ले रहा है और उस पर एक हजार करोड़ का कर्ज हो गया है. जबकि बाजार में उसका 20 हजार करोड़ बकाया है. यही हाल दूसरे अनेक प्रतिष्ठानों को झेलना पड़ रहा है. मजदूरों का यह आंदोलन बता रहा है कि मजदूर अब राजनीतिक आर्थिक पहलू पर सवाल उठा रहे हैं और उसके खतरों को बेहतर तरीके से पहचान रहे हैं.

इसी तरह किसानों का आंदोलन भी अब उस दौर में पहुंच गया है, जहां केवल कर्ज माफी या फसल का दाम दो गुना करना ही मांग नहीं रह गयी है. किसान अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए बेताब दिख रहे हैं. किसानों का नारा भी यही कह रहा है कि देश का निर्माण उन लोगों ने किया है. लेकिन क्रोनी पूंजीपति देश की संपदा हडप रहे हैं. आर्थिक सुधार के नाम पर इन्हें ही संतुष्ट किया जा रहा है. मजदूरों और किसानों को महसूस होता है कि आर्थिक सुधार का अर्थ केवल यही रह गया है कि किस तरह मेहनतकश तबकों के अधिकार सीमित किये जायें. पिछले अनेक सालों में मेहनतकश तबकों के भीतर इसे लेकर चेतना का प्रसार हुआ है. दुनियाभर के मेहनतकश तबकों में आंदोलन तेज हो रहा है. यूरोप के अनेक देशों में किसानों और मजदूरों का आंदोलन लगातार तीखा होता जा रहा है. उन आंदोलन ने भी ग्लोबलाइजेशन की पूरी प्रकिया और प्रवृति को चुनौती दे कर उसे मेहनतकश तबकों के लिए घातक बताना शुरू कर दिया है. उन आंदोलनों ने यह भी बताया है कि दुनिया में आर्थिक क्षेत्र में बढती विषमता अब एक बडा मुद्दा बनती जा रही है. आर्थिक क्षेत्र की विषमता अब सामाजिक क्षेत्रों में भी विषमता के नए तत्व यूरोप में पैदा कर रही है. यूरोप के 11 देशों में येलो वेस्ट आंदोलन का विस्तार हो चुका है और इस आंदोलन का तेवर लगातार तीखा होते हुए राजनीतिक बदलाव पर केंद्रित होता जा रहा है. येलो वेस्ट आंदोलन का मुख्य स्वर अब आर्थिक विषमता के खिलाफ एक समानतामूलक समाज की मांग पर कंद्रित होता जा रहा है. येलो वेस्ट से उभरे सवालों की दस्तक और असर अफ्रीका, उत्तरी व दक्षिणी अमरीका और एशिया के अनेक देशों में भी महसूस की जाने लगी है. भारत के विभिनन तबकों के आंदोलन का स्वर भी, जिस तरह राजनीतिक हुआ है, उसका असर राजनीतिक बदलाव पर भी पड़ सकता है. खास कर किसान, मजदूर और युवओं के आंदोलन इस दिशा का संकेत दे रहे हैं.

किसान और मजदूरों के दो दिनी हड़ताल राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में बदलाव की व्यापक मांग को उजागर कर रही है. तीन दशकों का आर्थिक तानाबाना इससे प्रभावित होता हुआ नजर आ रहा है. भारत में जिस तरह कल्याणकारी राज्य की प्रतिबद्धता से राजनीतिक किनारा कर लिया गया है, उसके खिलाफ भी इन तबकों में बात में की जाने लगी है. सरकार की कल्याण योजनाओं के कारपोरेट हित को उजागर करते हुए  मजदूर किसान प्रतिनिधि मुखर हुए. इस का असर यह होगा कि भारतीय समाज में यही विमर्श तेज होगा.

इसे भी पढ़ेंः मोदी का नया नरेटिव कितना कारगर होगा

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Comments are closed.

%d bloggers like this: