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लोकतंत्र के मंदिर में गुम हो रही है ‘लोक’ की आवाज

संसद के मानूसन सत्र में हंगामे की बलि चढ़ रही आम जन की भावना, नेता मस्त जनता पस्त

Gyan Ranjan

Ranchi : संसद का मॉनसून सत्र 19 जुलाई से शुरू है. कोरोना की दूसरी लहर की विभीषिका के बाद संसद के इस सत्र से देश की जनता को बड़ी उम्मीदें थी. जनता को उम्मीद थी कि पिछले तीन महीने में पूरे विश्व के साथ भारत ने भी जो त्रासदी देखी है उसपर देश की सर्वोच्च पंचायत में चर्चा होगी. भविष्य में इस तरह की विभीषिका को कैसे रोका जाये इसपर सम्यक समाधान का रास्ता निकालने पर संसद में विचार होगा, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कुछ नहीं हुआ. पिछले तीन दिनों से यह देखा जा रहा है कि लोकतंत्र में मंदिर में ‘लोक’ की आवाज ही गुम होती जा रही है. आम जनता की भावना हंगामे की बलि चढ़ रही है. नेता मस्त हैं और जनता पस्त है.

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कैबिनेट के सहयोगियों का परिचय तक नहीं कराने दिया गया

सोमवार और मंगलवार को संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही नहीं चली. लगातार हंगामा होता रहा. यहां तक कि देश के प्रधानमंत्री को कैबिनेट के सहयोगियों का परिचय तक नहीं कराने दिया गया. जिस मुद्दे को लेकर विपक्ष हंगामा कर रहा है और लगातार सदन की कार्यवाही को बाधित कर रहा है, उसपर गौर किया जाये तो देश की 135 करोड़ जनता को उससे कोई लेना देना नहीं है. चंद लोगों, नेताओं,जजों और पत्रकारों के मामले को लेकर जनता की गाढ़ी कमाई से प्रतिदिन करोड़ों रुपये बर्बाद किया जा रहा है.

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संसदीय समिति से जासूसी प्रकरण की जांच कराने की मांग

संसद के दोनों सदनों में पेगासस जासूसी विवाद सियासी संग्राम का रूप ले चूका है. विपक्ष ने नेताओं, जजों और पत्रकारों समेत प्रमुख हस्तियों के फोन टैप कराए जाने का आरोप लगाते हुए सरकार पर हमला बोला. विपक्ष इस मुददे पर संसद में तत्काल चर्चा कराने के साथ संयुक्त संसदीय समिति से जासूसी प्रकरण की जांच कराने की मांग कर रहा था. वहीं सरकार यह साफ कर चुकी है कि जासूसी कराने के दावे निराधार हैं.

सरकार और विपक्ष के बीच जासूसी प्रकरण पर छिड़े इस संग्राम के चलते लोकसभा की कार्यवाही पूरे दिन नहीं चल पायी और सदन के भीतर ही नहीं बाहर भी विपक्षी दलों ने आक्रामक विरोध प्रदर्शन किया. मंगलवार को भी संसद की बैठक शुरू होते ही कांग्रेस की अगुआई में तमाम विपक्षी दलों ने दोनों सदनों में इजरायली साफ्टवेयर पेगासस के जरिये सरकार पर जासूसी करने का आरोप लगाया और इस पर तत्काल बहस कराने की मांग की.

लोकसभा में कार्यवाही शुरू होते ही कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, सपा आदि के सदस्य पोस्टर-बैनर लेकर अध्यक्ष के आसन के समीप पहुंच गए. इन पोस्टर-बैनरों पर पेगासस के जरिये विपक्षी नेताओं से लेकर जजों के फोन की जासूसी किए जाने को लेकर सरकार पर निशाना साधा गया था. लेकिन इस दरम्यान कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी सदस्यों को कोरोना महामारी से देश में हुई त्रासदी नजर नहीं आई. पिछले तीन महीने में जिस तरह से लाखों लोग काल की गाल में समा गए इसपर किसी की नजर नहीं गयी. एक भी सांसद ने सरकार और सदन पर इस बात को लेकर दवाब नहीं बनाया कि कोरोना के कहर पर सदन में चर्चा हो.

जनता से जुड़े हुए मुद्दे चाहे वो महंगाई हो, किसान आन्दोलन हो या कोरोना के कारण बेपटरी हुई शिक्षा व्यवस्था को कैसे पटरी पर लाया जाये पर चर्चा कराने की बात किसी भी माननीय ने नहीं उठाया.

पूरे विश्व में कोरोना की तीसरी लहर दस्तक दे रही है. भारत में भी इसको लेकर अलर्ट जारी किया गया है. अभी कुछ दिनों पहले ही सभी ने कोरोना की दूसरी लहर की विभीषिका को देखा है. कैसे लोग ऑक्सीजन के बिना मर रहे थे. पूरे देश में त्राहिमाम की स्थिति थी. लाखों जानें गंवाकर किसी तरह हम इस त्रासदी से उबरे ही हैं कि तीसरी लहर दरवाजे पर खड़ी है. लेकिन जनता ने जिसे अपना रहनुमा बनाकर लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत में भेजा है, उन्हें इस बात की तनिक भी परवाह नहीं है. उनके लिए यह ज्वलंत मुद्दा नहीं है. इसपर सदन में चर्चा कराकर कोई निष्कर्ष निकाला जाय, इसकी परवाह उन्हें नहीं है. उन्हें चिंता है चंद नेताओं, जजों, पत्रकारों के फ़ोन टेपिंग की.

सही मायने में देखा जाय तो पिछले तीन दशक से लोकतंत्र में सबसे बड़े मंदिर को हमारे द्वारा चुने गए माननीयों ने हंगामे की महफ़िल बना कर रख दिया है. सदन में जब कोई विषय आता है, उसपर सार्थक चर्चा होती है तो जनता के हित में कुछ निकलकर सामने आता है. लेकिन अब तो ऐसा लगने लगा है कि यह पुरानी चीज हो गयी हो और हंगामा कर चेहरा चमकाना नेताओं की फितरत बन गयी हो.

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