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आरजेडी छोड़ बीजेपी आयी अन्नपूर्णा के सामने कई रोड़े, जीत का समीकरण आसान नहीं!

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  • नाराज है आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव के समर्थक
  • वर्तमान बीजेपी सांसद और मंत्री भी नहीं दिख रहे खुश
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Nitesh ojha

Ranchi:  लोकसभा चुनाव 2019 के पांचवें चरण यानी 6 मई को राज्य की चार संसदीय सीटों (कोडरमा, खूंटी, रांची और हजारीबाग) पर चुनाव होना है. इसमें कोडरमा सीट पर भी बीजेपी ने उसे अपना उम्मीदवार बनाया है, जो एक माह पहले तक कहती थी कि जुमलेबाजी वाली बीजेपी सरकार से जनता को सावधान रहना है. हालांकि बीजेपी में शामिल होने के बाद अन्नूपूर्णा देवी पीएम मोदी और सीएम रघुवर दास का भी गुणगान करने ही लगी हैं. राजनीति गलियारों में चर्चा है कि कोडरमा सीट के ही शर्त पर उन्होंने बीजेपी में शामिल होने का मन बनाया था. अब वह महागठबंधन के उम्मीदवार बाबूलाल मरांडी को कड़ी टक्कर देने में लगी हैं. टक्कर देने के पीछे वह इस सीट पर अपनी जनाधार और पार्टी के 5 विधायकों पर भरोसा कर रही हैं. लेकिन दूसरी तरफ यहां पर उपजे कई फैक्टर उनकी जीत में रोड़ा बनने को तैयार हैं. इसमें जातीय समीकरण तो पहले स्थान पर है ही, साथ ही आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद का साथ छोड़ने से यादवों की नाराजगी, भाजपा नेताओं का भीतरधात और महागठबंधन के घटक दलों का बाबूलाल को समर्थन उनके जीत के समीकरण को कठिन बना सकता है.

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जातीय समीकरण ने बढ़ा ऱखी है कोडरमा की चुनावी गर्मी

अन्नपूर्णा देवी के उम्मीदवार बनाए जाने के बाद से ही यहां के जातीय समीकरण ने इस सीट पर चुनावी गर्मी को काफी तेज कर दिया है. 2014 की तुलना में इस बार के चुनाव में बीजेपी और महागठबंधन दोनों ने यहां अपना उम्मीदवार बदला है. दोनों ही उम्मीदवार अपने जातीय समर्थक के भरोसे जीत का स्वाद लेना चाहते है. इस सीट पर कई जाति के वोटर लाखों की संख्या में है. इसमें 2.5 लाख यादव, 2.5 लाख मुस्लिम, 2 लाख कोइरी, 1.5 लाख भूमिहार, 1 लाख महुरी वैश्य, 1 लाख आदिवासी सहित 2 लाख अन्य जाति ( धोबी कुम्हार बढ़ई) शामिल है. इनमें पार्टियों की पकड़ के देखें, तो सभी जातियों की एक बड़ी आबादी बाबूलाल मरांडी के पक्ष में है.

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बीजेपी में जाने से नाराज हैं आरजेडी समर्थक

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बात अगर यादवों की करें, तो 2.5 लाख की आबादी इस सीट पर अपना दबादबा बनाए हुए है. अन्नपूर्णा देवी की कोडरमा सीट से चार बार विधायक बनने के पीछे यहां के यादवों का समर्थन ही प्रमुखता से रहा है. लेकिन अब आरजेडी प्रमुख लालू यादव को छोड़ बीजेपी में शामिल होने से यही कट्टर आरजेडी समर्थक यादव उनसे जरूर ही नाराज होंगे. वहीं भाकपा माले के टिकट पर भाग्य आजमा रहे धनवार विधायक राजकुमार यादव को भी यादवों का समर्थन है. 2014 के मोदी लहर पर में दूसरे स्थान पर रहने के पीछे इनका समर्थन प्रमुखता से रहा था.

भाजपा नेता भी कर सकते हैं भीतरघात

2014 के चुनाव के बाद कोडरमा सीट पर बीजेपी का काफी दबदबा रहा है. यहां के 6 विधायकों में 5 (कोडरमा से नीरा यादव, गांडेय से जयप्रकाश वर्मा, बरकट्टा से जानकी प्रसाद यादव, जमुआ से केदार हाजरा और बगोदर से नाग्रेंद प्रसाद) पर बीजेपी का कब्जा है, तो संसदीय सीट पर रविंद्र राय (भूमिहार जाति के हैं) बड़े अंतर से सांसद चुने गये थे. इस बार टिकट नहीं मिलने का मलाल उनको है. ऐसे में अपने 1.5 लाख भूमिहार के समर्थन पर वे भी बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसके पीछे का एक और कारण बाबूलाल के साथ उनकी पुरानी नजदीकियां भी हैं. कुछ दिन पहले एक मंदिर में दोनों के मुलाकात के कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. इसी तरह विधायक और राज्य सरकार में मंत्री नीरा यादव से उनकी राजनीतिक प्रतिदंद्विता विधानसभा चुनाव के समय से ही है. मंत्री नीरा यादव ने ही 2014 के विधानसभा चुनाव में अन्नपूर्णा देवी को हरा कर उन्हें राजनीति में पहला झटका दिया था. उस वक्त अन्नपूर्णा देवी आरजेडी की एक कद्दावार नेता थी.

घटक दल के होने से अन्य जाति भी बाबूलाल के पक्ष में 

जेवीएम उम्मीदवार बाबूलाल मरांडी को इस बार महागठबंधन के अऩ्य घटक दलों (कांग्रेस, जेएमएम और आरजेडी) का समर्थन हासिल है. इन तीनों ही दलों का मुस्लिम वर्ग सहित आदिवासी, कोइरी, महुरी वैश्य, धोबी, कुम्हार, बढ़ई पर अच्छा-खासा प्रभाव रहा है. कांग्रेस के आलमगीर आलम, फुरकान अंसारी, इरफान अंसारी, मन्नान मलिक, जेएमएम के हाजी हुसैन असांरी इस वर्ग पर काफी पकड़ रखते है. तो आरजेडी के मजबूती में एम-वाई समीकरण शुरू से ही मजबूत रहा है. ऐसे में इस क्षेत्र में दबादबा रखने वाली 2.5 लाख मुस्लिम वोटरों की एक बड़ी संख्या बाबूलाल के पक्ष में दिख रही है. स्वंय आदिवासी समाज से जुड़े होने के कारण बाबूलाल का इनसे समर्थन लेने में कोई परेशानी नहीं होगी.

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