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उपराष्ट्रपति ने कहा,  न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ा है…कुछ अदालती फैसले यही इशारा करते हैं…

विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका संविधान के तहत परिभाषित अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत काम करने के लिए बाध्य हैं.

Ahmedabad : उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने बुधवार को गुजरात के केवडिया में कहा कि कुछ फैसलों से लगता है कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ा है. उन्होंने कहा कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका संविधान के तहत परिभाषित अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत काम करने के लिए बाध्य हैं.
उपराष्ट्रपति ने पटाखों पर अदालत के फैसले और जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका को भूमिका देने से इनकार करने का उदाहरण देते हुए यह बात कही.

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कई न्यायिक फैसले किये गये जिसमें हस्तक्षेप का मामला लगता है

बता दें कि एम वेंकैया नायडू विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सौहार्दपूर्ण समन्वय – जीवंत लोकतंत्र की कुंजी’ विषयक अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के 80वें सम्मेलन में बोल रहे थे. श्री नायडू का मानना था कि तीनों अंग एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप किये बगैर काम करते हैं और सौहार्द बना रहता है.

उपराष्ट्रपति के अनुसार इसमें आपसी सम्म्मान, जवाबदेही और धैर्य की जरूरत होती है. उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से ऐसे कई उदाहरण हैं जब सीमाएं लांघी गयीं.  ऐसे कई न्यायिक फैसले किये गये जिसमें हस्तक्षेप का मामला लगता है.

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सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों पर दूरगामी असर हुआ

उपराष्ट्रपति ने कहा, स्वतंत्रता के बाद से सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों ने ऐसे कई फैसले दिए जिनका सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों पर दूरगामी असर हुआ. इसके अलावा इसने हस्तक्षेप कर चीजें ठीक कीं. लेकिन कभी चिंताएं भी जताई गयी कि क्या वे कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं? उन्होंने कहा, ‘इस तरह की बहस है कि क्या कुछ मुद्दों को सरकार के अन्य अंगों पर वैधानिक रूप से छोड़ दिया जाना चाहिए.

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कई बार विधायिका ने भी रेखा लांघी है

नायडू ने उदाहरण देते हुए कहा कि दिवाली पर पटाखों को लेकर फैसला देने वाली न्यायपालिका कलीजियम के माध्यम से जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका को भूमिका देने से इनकार कर देती है.  कहा कि कुछ न्यायिक फैसलों से प्रतीत होता है कि हस्तक्षेप बढ़ा है. इन कार्रवाइयों से संविधान की तरफ से तय रेखाओं का उल्लंघन हुआ जिससे बचा जा सकता था.

हालांकि श्री नायडू ने यह भी माना कि कई बार विधायिका ने भी रेखा लांघी है. इसे लेकर उन्होंने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के चुनाव को लेकर 1975 में किये गये 39वें सविधान संशोधन का जिक्र किया.   नायडू ने कहा कि लोकतंत्र के मंदिर की शालीनता, गरिमा और शिष्टाचार  तभी बरकरार रखा जा सकता है जब तीन डी बहस (डिबेट), चर्चा (डिसकस) और फैसला (डिसाइड) का पालन हो.

 

 

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