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भाई बहन का अटूट प्रेम प्रतिबिम्बित करता है करम

विश्व कल्याण की भावना से यहां के आदिवासी पूरी श्रद्धाभाव से अपने आराध्य की उपासना करते हैं

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Raj Kumar Minz

त्योहार लोगों को अपनी परंपरा और आदर्शों से जोड़कर रखते हैं. करमा उत्सव (करम परब) में भी यह बात सच साबित होती है. विश्व कल्याण की भावना से यहां के आदिवासी पूरी श्रद्धाभाव से अपने आराध्य की उपासना करते है. और उल्लास व उमंग की छटा बिखेरते हुए नृत्य-वाद्य यंत्रों के सहारे ईश्वर से एकाकार होने का प्रयास करते हैं.

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हर वर्ष भाद्रपद एकादशी को करम पर्व मनाया जाता है. करम पर्व प्रकृति की पूजा है और झारखंड के आदिवासियों एवं मूलवासियों की संस्कृति का प्रतीक भी है. यूं तो करम देव की पूजा की तैयारी एकादशी से सात दिन पूर्व ही शुरु हो जाती है. जब युवतियां बांस की बनी नई टोकरी में पास के नदी से बालू भर कर लाती है. साथ ही नेक-नियम के साथ सात प्रकार के बीज जैसे- धान, जौ, मकई, चना, उड़द, खुखरी-बटुरी तथा सुरगुजा को मिला कर उस बालू भरी टोकरी में जावा उगाने के लिए रखती हैं. प्रत्येक दिन प्रात: काल स्नान इत्यादि के बाद उसमें जल अर्पण करती हैं. कुछ दिनों बाद उन बीजों पर पौधे निकल आते हैं. जिसे ‘जावा फूल’ कहते हैं.

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करम पूजा के लिए करम वृक्ष के तीन डाल को काट कर ‘अखरा’ में स्थापित किया जाता है. पूजा के दिन युवतियां दिनभर निर्जला व्रत रखती है. तथा संध्या को ‘पहान’ द्वारा पूजा-विधान के पश्चात ही प्रसाद खाती है. व्रतधारी जिन्हें ‘करमईत’ कहा जाता है. अपने साथ पूजा की सामग्रियों के रुप में फूल, दीप, धूप-धूवन, अगरबत्ती, खीरा, पकवान, जावा, सिन्दूर, हल्दी से रंगे नये कपड़े का टुकड़ा, एक लोटा जल इत्यादि ले कर अखरा जाती है. वहां पूजा के पश्चात करम राजा की कहानी सुनाई जाती है. जिसमें धन और धर्म की लड़ाई में आखिर-धर्म की जीत होती है ऐसा बताया गया है. करम राजा को कथा का सार यह है कि मनुष्य का अपने कर्म के प्रति निष्ठा, दूसरे मनुष्यों के प्रति भाईचारा एंव व्यवहार कुशलता अन्य जीव-जन्तुओं के प्रति श्रध्दा ही धर्म है.
इस पर्व मे भाई बहन का अटूट प्रेम प्रतिबिम्बित होता है. बहनें अपने भाईयों की सुख-समृध्दि के लिए उपवास रखती है. पूजा-अर्चना के पश्चात अखरा में नृत्य-संगीत का दौर चलता है. करमा पर्व के गीतों में प्रेम-श्रृंगार के साथ ही जीवन के अनेक गतिविधियों की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है. करम नृत्य अति सुन्दर नृत्य होता है. जिसमें मूल वाद् यंत्र मांदर की धुन पर नृत्य किया जाता है. पर्व के दूसरे दिन करम डाल का विसर्जन किया जाता है.

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करम पर्व मनाने की परंपरा झारखंड के अनेक जनजातियों में है. जैसे-उरांव, मुंडा, पहाड़िया, खड़िया इत्यादि. आदिवासियों के साथ रहने वाले झारखंड के मूलवासी जैसे- साहू, कुरमियों में भी करमा पर्व बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है.
पर्व के मौके पर बैगाओ,पहान,पुजारी के द्वारा समाज के रीति-रिवाज से विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी. इसके अलावा समाज के लोग पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर मांद, झांझ, नगाड़े की थाप पर रात भर लोक नृत्यों में थिरकते रहेंगे.

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