LITERATURE

नाटक ‘हमेशा देर कर देता हूं मैं’ का तीसरा शो, भटके कश्मीरी युवा के जद्दोजहद को आकार देने की कोशिश

मुंबई के वर्षोवा आरामबाग में एम्ब्रोज़िया थियेटर ग्रुप का नाटक ‘हमेशा देर कर देता हूं मैं’ का तीसरा शो 28 दिसंबर को होने जा रहा है. पहले दो शो को लोकप्रियता मिलने के बाद ग्रुप का यह तीसरा आयोजन है. मनोज वर्मा के कंसेप्ट और निर्देशन में तैयार किये गये इस नाटक को क्रिटिक्स ने भी सराहा है. नाटक के लेखक प्रियंका और शाहबाज हैं. नाटक की मुख्य भूमिकाओं में गरिमा गोयल (आफरीन), मनीषा अरोड़ा (गीत), किशोर सोनी (अहमद), विष्णु वर्धान (इकबाल) औऱ रौशन सिंह (जाहरान) ने अभिनय किया है.

थीम   

यह नाटक आज के आम कश्मीरियों की रोज की जद्दोजहद और वहां की जड़ों में फैली आतंकवाद की समस्या को एक नए आयाम से दिखाने की एक कोशिश है. इस प्ले में कश्मीर की फिजाओं में घुले बारूद की बदबू के पीछे का सच दिखाने का प्रयास हुआ है. साथ ही आतंक के जहर ने किस तरह कश्मीरियों, वहां के युवाओं को खोखला करने की कोशिश की, इसे भी बताया गया है. ये एक मुस्लिम लड़की, उसकी हिंदू दोस्त और तीन आंतकी की कहानी है.

 

शुरूआत   

प्ले की शुरुआत एक लड़की आफरीन (लीड कैरेक्टर) के निकाह से पहले होने वाली मेहंदी की रस्म की खुशियों से होती है. आफरीन की हिंदू सहेली गीत उसके हाथों में मेहंदी लगा रही है, और दो दोस्तों के बीच हंसी-ठिठोली का खुशनुमा माहौल है. लेकिन इस खुशनुमा माहौल के बीच कहानी में पहला ट्विस्ट तब आता है, जब अचानक तीन आतंकी (जहारान, इकबाल और अहमद) होने वाली दुल्हन के घर में घुस जाते हैं और उसे बंधक बना लेते हैं. तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच एक आतंकी (जाहरान) सेना की गोली से मारा जाता है.

फिर शुरू होता है आतंकी खौफ से लड़ती एक जांबाज लड़की का संघर्ष. आफरीन अपनी समझदारी और तार्किक बहस से आतंकियों को यह समझाने की कोशिश करती है कि वह किस कदर राह भटक गए हैं, जिहाद के नाम पर कैसे उन्हें गुमराह किया जा रहा है.

क्लाइमैक्स       

प्ले में क्लाइमैक्स तब आता है, जब आफरीन की बातों से प्रभावित होकर दूसरा आतंकी (इकबाल) हथियार डालने को तैयार हो जाता है. और उसकी बगावत को देख तीसरा आतंकी (अहमद) उसे रोकने की हर कोशिश करता है. इसी दौरान अपना आपा होते हुए अहमद, इकबाल पर गोली चला देता है.

दहशत, तनाव, हकीकत, भावनाओं के इतने उतार-चढ़ाव के बीच भी आफरीन हिम्मत नहीं हारती और अंत तक बचे हुए आतंकी (अहमद) को समझाने और सही राह पर लाने की कोशिश करती है. धीरे-धीरे उसे भी समझ में आता है कि उसने जिहाद के नाम पर अपनी और अपने परिवार की जिंदगी जहन्नुम बना डाली. लेकिन जब तक वह यह समझ पाता तब तक बहुत देर हो चुकी है. उसके हाथ से चीजें यू निकल गई मानो बंद मुट्ठी से रेत.

 

 

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