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#Congress की अंदरूनी लड़ाई से कहीं झारखंड में दोहरायी न जाये कर्नाटक की कहानी!

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  • मनिका विधानसभा में पूर्व आरजेडी विधायक को शामिल करने से कार्यकर्ता हो रहे हतोत्साहित
  • कांग्रेस में गुटबाजी एकबार फिर से हावी

Nitesh Ojha

Ranchi :  झारखंड कांग्रेस में एक बार फिर कर्नाटक जैसी कहानी दोहराने का प्लॉट तैयार हो रहा है. जिस तरह से मनिका विधानसभा में आरजेडी के पूर्व विधायक रामचंद्र सिंह को कांग्रेस में शामिल कराया गया है, पार्टी कार्यकर्ताओं में इस बात की बड़ी चर्चा है. रामचंद्र सिंह को पार्टी में शामिल कराने के शीर्ष नेतृत्व के निर्णय से मनिका विधानसभा के कई कार्यकर्ताओं में भारी निराशा है.

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कार्यकर्ताओं का कहना है कि 2014 के विधानसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी तीसरे स्थान पर थे, जबकि आरजेडी दूसरे स्थान पर. कार्यकर्ताओं का कहना है कि बीजेपी विधायक से हार का अंतर काफी कम था. ऐसे में आरजेडी नेता को पार्टी में शामिल कर शीर्ष नेतृत्व स्थानीय कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित कर रहा है.

चर्चा यह भी जोरों पर है कि पूर्व विधायक ने कांग्रेस की सदस्यता चुनावी टिकट की शर्त पर ही ली है. यह स्थिति ठीक उसी तरह है, जैसी कर्नाटक विधानसभा में गैर कांग्रेसियों को टिकट देकर पार्टी को निराशा हाथ लगी थी.

पहले भी कांग्रेस छोड़ चुके हैं बागी विधायक

कांग्रेस सूत्रों की मानें, तो कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पूर्व वहां कई अऩ्य दलों के (गैर-कांग्रेसियों) नेताओं को पार्टी में शामिल कर चुनावी टिकट दिया गया था. इनमें से कुछ ने चुनाव भी जीता. कुछ दिन सत्तारूढ़ कांग्रेस के साथ रहने के बाद जब बीजेपी के येदियुरप्पा की सरकार बनाने की बात आयी, तो कुछ कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हो गये.

इसी तरह की स्थिति गोवा में भी देखी गयी. बात अगर झारखंड विधानसभा की करें, तो आजसू नेता रहे नवीन जायसवाल भी चुनावी टिकट के लिए जेवीएम में शामिल हुए थे. जेवीएम के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद सत्ता में आने के लिए वे बीजेपी में शामिल हो गये.

पूर्व प्रदेश अध्य़क्ष डॉ अजय कुमार भी जेवीएम छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए थे. बाद में उनके और सुबोधकांत गुट में जैसा संघर्ष देखा गया, उससे कार्यकर्ताओं में जबरदस्त नाराजगी हुई. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने अजय कुमार पर लोकसभा चुनाव के दौरान सीट बेचने का आरोप तक लगाया था. हाल में वे कांग्रेस छोड़ आम आदमी पार्टी (आप) में शामिल हो गये.

रामेश्वर और सुखदेव खेमे की लड़ाई का असर मनिका पर

वैसे तो सभी दलों में आपसी गुटबाजी हावी होती रही है. बीजेपी में भी कई बड़े नेताओं के बीच धुरी बनती बिगड़ती रहती है. डॉ अजय कुमार और सुबोधकांत खेमे के बीच का संघर्ष भी जगजाहिर है. अब फिर से कांग्रेस के अंदर दो खेमों के बीच संघर्ष चरम पर है.

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नये खेमे में रामेश्वर उरांव और सुखदेव भगत अप्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने हैं. उनके संघर्ष का असर मनिका विधानसभा में देखा जा रहा है. कांग्रेस के अंदर यह चर्चा जोरों पर है कि रामेश्वर उरांव समर्थक धीरज साहू ने आरजेडी के जिस पूर्व विधायक को पार्टी में शामिल कराया है, उससे मनिका के स्थानीय कार्यकर्ताओं में काफी नाराजगी है.

2014 में काफी कम वोटों का अंतर था आरजेडी और कांग्रेस में

2014 के मनिका विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें, तो बीजेपी के हरिकृष्ण सिंह केवल 1083 वोटों से चुनाव जीते थे. उन्होंने आरजेडी प्रत्याशी रामचंद्र सिंह (वर्तमान में कांग्रेस में शामिल) को हराया था. बीजेपी प्रत्याशी को 31,583 और आरजेडी प्रत्याशी को 30,500 वोट मिले थे.

वहीं कांग्रेस प्रत्याशी मुनेश्वर उरांव (वर्तमान में लातेहार जिला अध्य़क्ष) को करीब 28,000 वोट मिले थे. ऐसे में आरजेडी और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर काफी कम था.

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रामेश्वर उरांव लड़ चुके हैं मनिका से चुनाव

सूत्रों का दावा है कि आरजेडी के पूर्व विधायक को पार्टी में शामिल कराने के पीछे दरअसल रामेश्वर उरांव और सुखदेव भगत गुट के बीच का संघर्ष है. 2009 में लोकसभा चुनाव हराने के बाद कांग्रेस प्रत्याशी रामेश्वर उरांव नवंबर-दिसम्बर में मनिका से विधानसभा चुनाव लड़े थे.

उस वक्त मुनेश्वर उरांव बंधु तिर्की की पार्टी झारखंड जनाधिकार मंच से चुनाव लड़े थे. उस दौरान कांग्रेस दूसरे और मुनेश्वर उरांव तीसरे स्थान पर थे. माना गया था कि रामेश्वर उरांव के हारने के पीछे मुनेश्वर उरांव का चुनाव लड़ना प्रमुख कारण था.

बाद में जब सुखदेव भगत प्रदेश अध्य़क्ष बने थे, तो उनकी उपस्थिति में मुनेश्वर उरांव कांग्रेस में शामिल हुए. उनकी मजबूत स्थिति देख पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय कुमार ने उन्हें लातेहार जिला अध्यक्ष बनाया था. बता दें कि रामेश्वर उरांव से सुखदेव भगत और डॉ अजय कुमार की दूरी हमेशा देखी जाती रही है.

इसकी पुष्टि ऐसी भी होती है कि लोकसभा चुनाव के दौरान जहां सुखदेव भगत के टिकट दिये जाने पर डॉ अजय कुमार की भूमिका काफी थी, वहीं रामेश्वर उरांव चुनावी दौरे से नदारद रहे थे.

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