Opinion

जिस राज्य में आह निकालवानेवाली व्यवस्था हो, वह राज्य विकास की ओर अग्रसर या विनाश की ओर

Dr Prabhakar Kumar

प्रतिभावाले, योग्य अभ्यर्थियों की जिंदगी बर्बाद की गयी, वह आह में, किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रखे गये, सामाजिक तिरस्कार से पीड़ित, कई अभ्यर्थियों के माता-पिता सदमे से मौत के शिकार, अयोग्यता का दंश देकर पागलों की कतार में खड़े कर दिये गये.

बेचारे गरीब, कमजोर, निरीह, बेबस करते भी क्या, गरीब का कौन है. सिविल सेवा में धांधली कर अयोग्यों ने, रसूखदार लोगों ने सामाजिक चांदी काटी, दहेज व्यवस्था को चार चांद लगाये, समाज में इन व्यक्तियों की ही पूछ होने लगी.

दामाद बनाने के लिए आभिजात्य समाज में होड़, किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि कैसे चयनित हुए. BDO, CO, Dy. SP व अन्य पद. लड़के दहेज व्यवस्था व भौतिकवादी चीजों से परिपूर्ण. विवाह में मध्यस्थता करनेवाले लोगों की भी चांदी.

रसूखदार, पैरवी पुत्र, गलत यत्नों से पैसे कमाये लोगों को यह लगने लगा कि पैसे की चमक से कुछ भी कर सकते हैं. वहीं योग्य व्यक्तियों को सामाजिक तिरस्कार, बेइज्जती, मूर्ख की उपाधि.

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झारखंड राज्य बनने के बाद प्रथम व्याख्याता नियुक्ति में भी JPSC ने इसी गलत परंपरा को बल देते हुए पुनः पदों का क्रय-विक्रय किया, जिसमें समाज के आभिजात्य वर्ग, पैरवी पुत्र, विश्विद्यालय प्रबंधन के चहेते, लालफीताशाही वर्ग के संबंधी, चहेते, JPSC के अध्यक्ष, सदस्य व आयोग के कर्मी, मंत्री वर्ग के खासमखास, जिन्होंने JPSC में अध्यक्ष व सदस्य के लिए नामित किया था. विषय विशेषज्ञों ने भी बहती गंगा में लाभ लिया, सभी ने अपने-अपने चहेतों को पद दिया. अयोग्य योग्य की श्रेणी में आ गये.

यहां भी योग्य, नैसर्गिक प्रतिभावानों JRF , NET , Ph D किये अभ्यर्थियों को बलि का बकरा बना कर, स्वर्णपदक अभ्यर्थियों की समाज में जगहंसाई करवायी.

2006 में व्याख्याता प्रथम, पात्रता परीक्षा ली. जिसमें झारखंड राज्य से 706 अभ्यर्थियों ने विभिन्न विषयों में लिखित पात्रता परीक्षा उतीर्ण की. यहां 300 से अधिक लोगों को डुप्लीकेट प्रमाण पत्र निर्गत JPSC ने करवाया जिन्होंने परीक्षा दी ही नहीं थी या लिखित परीक्षा में अनुत्तीर्ण थे.

JPSC ने एक समय वेबसाइट पर लिखित परीक्षा के अंक डाले थे. उस समय कई पैरवी पुत्र, JPSC के अध्यक्ष व सदस्य के करीबी के अंकपत्र में मिले अंक में असफल बाद में जॉब में देखे गये.

इस नियुक्ति में आभिजात्य वर्ग में शामिल सभी रसूख वर्ग अपने अपने वार्डों को व्याख्याता बनाने में सफल हुए. वहीं योग्य अभ्यर्थियों की प्रतिभा को कुचल दिया गया. उनकी आह निकलती रही, निकलती रही.

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JRF, NET, PhD किये योग्य अभ्यर्थियों की जिंदगी बर्बाद की गयी. कई लड़कियां जो व्याख्याता बन बिना दहेज, सामाजिक कुरीति पर चोट कर अपनी प्रतिभा पर अपने जीवन व परिवार को आयाम दे पातीं, उनके स्वप्न को तार तार किया गया. लड़के भी अपनी प्रतिभा के अनुकूल जीवनसाथी तलाश करते, उनके स्वप्नों को तोड़ा गया.

अयोग्य की फिर चांदी हुई, योग्य व्यक्तियों का हक मार कर उनके पद पर काबिज हो गये और प्रतिभा का मुखौटा पहन कर प्रतिभावानों की कतार में खड़े होने का दंभ भरने लगे.

योग्य, योग्यता होने के बाबजूद मुहं छिपाये, आह व बद्दुआ के साथ चुप.

कितना तिरस्कार वाला जीवन, योग्य होते हुए जलील सा जीवन. दूसरी तरफ अयोग्य होते हुए योग्य, पैसा, रसूख योग्यता पर भारी.

सिर्फ आह निकलती हुई, राज्य में किसी को परवाह नहीं

इसके बाद तो आयोग की चल पड़ी. जिला सहकारिता पदाधिकारी, बाजार पर्यवेक्षक समेत 18 प्रतियोगी परीक्षाएं. पैसा दोगे, तभी सफल अन्यथा प्रतिभा जाये जूते लेने.

पैसे से पद की खरीद-बिक्री

जो अभिभावक यहां ईमानदारी की रोटी खाते रहे या गरीब प्रतिभावान या अन्य राज्यों के प्रतिभावान भी, जो पैसा पैरवी रसूख के मानकों पर खरे नहीं उतरते थे, सभी अयोग्य होते गये.

राज्य में पैसा, पैरवी, रसूख की ही पूछ रह गयी. यहां प्रतिभा से कोई मतलब नहीं रखा गया. ऐसे अभ्यर्थियों की जगह योग्य उम्मीदवारों का चयन किया जाता तो राज्य की दशा व दिशा कैसी रहती.

नैसर्गिक प्रतिभावानों की आह ली गयी. बद्दुआ ली गयी. यह आह उन लोगों को फर्श तक अवश्य ले जायेगी, जिन्होंने प्रतिभा का सरेआम कत्ल किया.

इस अनीति में शामिल एक-एक व्यक्ति काल के गाल में समाने के वाजिब हकदार हैं. इनकी करनी कई जन्म जन्मान्तरों तक प्रारब्ध स्वरूप पीछा करेगी. ऐसे गलत आचरण व प्रतिभा को पैसे-पैसे के लिए मोहताज करनेवाले और सामाजिक तिरस्कार में सम्मिलित करनेवाले सभी पापियों के संतति भी उतने ही जवाबदेह हैं.

ऐसी अनीति में शामिल लोगों में अयोग्य व्यक्ति भी उतने ही जवाबदेह हैं जितना गलत करनेवाले. योग्य व्यक्तियों का हक मार कर लगातार यातना देते रहे हैं व प्रतिभा का झूठा दंभ भी.

अर्श से फर्श की ओर बढ़ रहे, जहां कभी भी इसकी भरपाई नहीं

2008 में प्रथम व्याख्याता नियुक्ति के उपरांत 2017 में पहली बार कॉन्ट्रैक्ट असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति सभी विश्वविद्यालयों से हुई. जहां योग्यता का मापदंड UGC नियम को पूर्णरूपेण लिया गया. पर सैलरी व्यवस्था घंटी आधारित. यह व्यवस्था भी अर्श से फर्श की ओर की ही है.

प्रतिभा को इतना भी कुंद मत करिए कि वह आग स्वरूप प्रतिरोध की ज्वाला न बन जाये.

2008 नियुक्ति में छल का शिकार बने. सिविल सर्विस में व अन्य JPSC की नियुक्तियों में छल का शिकार बने आजीविका हेतु कॉन्ट्रैक्ट असिस्टेंट प्रोफेसर वर्ग को इतना भी मत सताइये कि आह, बद्दुआ से फर्श तक के रास्ते पर प्रशस्त होने लगिये.

सम्पूर्ण भारत UGC की मार्गदर्शिका के आदेशों का वरण करता है.

अंत में,  शिक्षा ( EDUCATION ) को परिभाषित करते हुए, E-Etiquette शिष्टाचार, D-Dispiline अनुशासन, U-Universal Brotherhood विश्व बंधुत्व, C-Creative सृजनात्मकता, A-Awarness जागरुकता, T-Transformation रूपांतरण, I-Integrity एकात्मकता, O-Optimist आशावादी, N-Nobility सज्जनता.

” Education is a liberating force , and in our age it is also a democratic force , cutting across the barriers of caste and class , something our inequalities , imposed by birth and other circumstances ” .

डॉ राधाकृष्ण के शब्दों में , ” Education , to be complete , must be humane , it must include not only the training of the intellect but the refinment of heart and the discipline of the spirit . No education can be regarded as complete if it neglects the heart and the spirit ” .

लेखक झारखंड सहायक प्राध्यापक अनुबंध संध के प्रदेश सचिव हैं.

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