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उम्मीदों को हर बार निराशा में बदल देने का कारनामा भारतीय राजनीति का पर्याय बन चुका है

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Faisal Anurag

उम्मीदों को हर बार निराशा में बदल देने का हुनर भारतीय राजनीति का पर्याय बन गया है. राजनीतिक दल और नेता तो जैसे वोटरों को इगनोर करने में माहिर हो गये हैं. दलबदल की परिघटना इसी का हिस्सा है.

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झारखंड उन राज्यों की सूची में अव्वल है जहां नेताओं का दलबदल आम बात हो गयी है. झारखंड में दलबदल करने के पीछे की मंशा भी कम चिंताजनक नहीं है. झारखंड में सरकार चाहे जिसने भी बनायी हो राजनीतिक स्थिरता भले ही दिखती हो, पार्टियों और नेताओं की स्थिरता संदेहास्पद बनी ही रहती है.

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इस सिलसिले में झारखंड विकास मोर्चा की परिघटना तो नायाब ही है. झारखंड में नयी सरकार बनने के बाद से ही झाविमो के नेता बाबूलाल मरांडी के पाला बदलने की बात जोरों पर है. मीडिया में इस बाबत हर दिन खबर छप रही है.

लेकिन बाबूलाल मरांडी चुप्पी साध कर इस तरह की बातों को हवा दे रहे हैं. विधानसभा चुनाव के समय भी जब उन्होंने अमित शाह के साथ बंद कमरे में बात की थी, तब से उनकी राजनीतिक स्थिरता सवालों के घेरे में है.

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बाबूलाल मरांडी ने विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद हेमंत सोरेन सरकार को बिना शर्त समर्थन का एलान किया. लेकिन विधानसभा के पहले सत्र के बाद ही उनके भारतीय जनता पार्टी में जाने की बात होने लगी. बाबूलाल मरांडी के समर्थक दावा करते हैं कि मरांडी की राजनीति उसूलों पर आधारित है.

और वे अपनी छवि को लेकर बेहद चिंतित हैं. कुछ इसी तरह की बात बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर भी फैलायी जाती रही है. नीतीश कुमार ने भाजपा के खिलाफ चुनाव जीता और फिर उसी से हाथ मिला लिया.

जनादेश का इस तरह के हनन की मिसाल भारत के इतिहास में कम ही है. हरियाणा के कुछ उदाहरण जरूर इससे मिलते जुलते हैं. लेकिन हरियाणा की कहानी इस अर्थ में अलग है कि वहां की राजनीति में व्यावहारिकता की चर्चा ज्यादा होती है उसूल की नहीं.

झाविमो तो विकल्प की राजनीति के वायदे से मैदान में रहा है. अचानक एक चुनाव की हार के बाद इस तरह  की बातें यदि सामने आ रही हैं, तो उसकी राजनीतिक मजबूरी की कहानी और ही होगी. जिसकी ओर अभी ध्यान नहीं गया है.

देरसबेर इस बारे में भी तथ्य उजागर होंगे ही. झामुमो तो 2014 में भी कई बड़ा चमत्कार नहीं कर पाया था. और जब उसके आठ में छह विधायक भाजपा में चले गए तो बाबूलाल मरांडी ने उसूलों की राजनीति का मुद्दा खूब उछाला.

बाबूलाल मरांडी तब किसी दबाव में नहीं आये. लेकिन 2019-20 में ऐसी क्या मजबूरी है कि यह उनके शुभचिंतकों को परेशान किए हुए है. लोकतंत्र में इस तरह की स्तरहीनता कई अर्थों में खतरनाक है.

झारखंड को बारबार इस शर्म से क्यों गुजरना पड़ रहा है. इसका जवाब तो राजनेताओं को ही देना चाहिए. लेकिन सुविधा और अवसर के लिए जिस तरह की जोड़तोड़ झारखंड की राजनीति में दिखती है, वह भविष्य की भयावहता की ओर ही इशारा करती है.

अविश्वास की जो गहरी लकीर इन घटनाओं से खींची जाती है उसका दूरगामी असर पडता है. राजनीति में दलबदल करने वाले नेता या छोटे दल, जितना इसके लिए जिम्मेदार हैं उससे कहीं अधिक वे बड़े दल जिम्मेदार हैं जो तमाम उसूलों को दरकिनाकर कर इस तरह के घटनाक्रम को बढ़ावा देते हैं.

भारतीय राजनीति जहां खड़ी है, वहां उसे अपनी साख के संकट से गुजरना पड़ रहा है. यदि देश का एक तबका प्रधानमंत्री तक की बातों का भरोसा नहीं कर रहा है तो जमीन पर की बेचैनी और उससे उत्पन्न बेचैनी को भी महसूस किया जाना चाहिए.

दिल्ली के रामलीला मैदान से प्रधानमंत्री मोदी ने देश के लोगों से कहा कि एनआरसी की कोई चर्चा नहीं है. लेकिन आंदोलन कर रहे समूहों के बीच उनकी यह बात भरोसा नहीं पैदा कर पायी. कथनी और करनी के राजनीतिक फर्क ने ही इस तरह के हालात पैदा किये हैं.

दलबदल की घटनाएं इस फर्क को और चौड़ा ही कर रही हैं.

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