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122 करोड़ के टेंडर में ‘कोहिनूर कंपनी’ का पेंच, इसलिए 6.5 लाख विद्यार्थियों को नहीं मिली साइकिल

  • 2021-22 में दी जानी है साइकिल
  • ST/SC/OBC और अल्पसंख्यक वर्ग के बच्चों को दी जाती है साइकिल
  • 6.5 लाख बच्चों को टेंडर की वजह से नहीं मिल सका है साइकिल

Ranchi : झारखंड सरकार के कल्याण विभाग की ओर से कक्षा 8वीं और 9वीं में पढने वाले विद्यार्थियों को साइकिल दी जाती है. यह हर साल के एकेडमिक सत्र में दी जाती है. पर बीते दो साल से स्टूडेंट्स को यह साइकिल नहीं मिल रही है. वित्तीय वर्ष में 122 करोड़ रुपये से दोनों क्लास में पढने वाले लगभग साढ़े छह लाख स्टूडेंट्स को साइकिल दी जानी है. पर टेंडर फाइनल नहीं हो पाने की वजह से स्टूडेंट्स अब तक साइकिल से वंचित है. कल्याण विभाग की ओर से एसटी, एससी, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग के बच्चों को साइकिल दी जाती है.

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 “कोहिनूर कंपनी” की पेंच से नहीं मिल रही साइकिल

बताते चलें कि एसटी, एससी, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग के बच्चों को साइकिल देने के लिए विभाग की ओर से सितंबर माह में टेंडर निकाला गया था. लेकिन तब एक ही कंपनी ने हिस्सा लिया. इसके बाद फिर से टेंडर निकाला गया. दोनो ही बार कोहिनूर नाम की कंपनी ने ही हिस्सा लिया. दो बार के टेंडर में एक ही कंपनी के आने से टेंडर फाइनल नहीं हो सका. बताते चलें कि वित्तीय वर्ष 2020-21 में कोरोना की वजह से स्टूडेंट्स को साइकिल नहीं मिल सका. वही वर्तमान वितीय वर्ष में एक ही कंपनी के आने से टेंडर फाइनल नहीं हो पाया.

टेंडर पर उठ चुके हैं सवाल

कल्याण विभाग की ओर से वित्तीय वर्ष 2021-22 में 122 करोड़ रुपये की साइकिल खरीदने को लेकर निकाले गये टेंडर पर सवाल उठ चुके हैं. लुधियाना की साइकिल बनाने वाली कंपनी रॉक स्टॉर इंडस्ट्री ने टेंडर प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए आदिवासी कल्याण आयुक्त और मुख्य सचिव को पत्र लिखा था. पत्र में कंपनी ने पूरी टेंडर प्रक्रिया पर आपत्ति जतायी है. कंपनी ने कहा है कि किसी एक व्यक्ति-कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए टेंडर की पूरी प्रक्रिया में गड़बड़ी की गयी है. कंपनी ने आरोप लगाया था कि टेंडर में यह बात स्पष्ट नही है कि एक वित्तीय वर्ष में वैसी कंपनी जो 30 हजार साइकिल बनाती है या बीते तीन साल में तीस हजार साइकिल बनाया है. वहीं, 2013-14 में जो बिड प्रोसेस था उसमें 25000 साइकिल सप्लाई प्रतिवर्ष बीते पांच साल में करने का था, इसमें क्लाइंट सर्टिफिकेट भी दिया जाना था,लेकिन इस बार क्लांइट सर्टिफिकेट नहीं मांगा गया है. इसके अलावा टेंडर भरने वाली कंपनी के टर्न ओवर की शर्त पर भी कंपनी के आपत्ति दर्ज की है.

4500 रुपये प्रति साइकिल तय है दर

विभाग की ओर से निकाले गये टेंडर में एक साइकिल की कीमत 45 सौ रुपये राखी गयी थी. वहीं 3.49 लाख साइकिल खरीदने की बात कही गयी थी. जो अब तक संभव नहीं हो पाया है. बताते चलें कि इससे पहले डीबीटी के माध्यम से स्टूडेंट्स के खाते में साइकिल का पैसा भेज दिया जाता था. पर हेमंत सोरेन की सरकार ने साइकिल खरीद कर स्टूडेंट्स को देने का निर्णय लिया गया. जब स्टूडेंट्स के खाते में साइकिल का पैसा जाता था टबी साइकिल की कीमत 3500 रुपये प्रति साइकिल थी लेकिन साइकिल खरीद कर देने का निर्णय लेते ही साइकिल की कीमत प्रति साइकिल 45 सौ रुपये हो गयी.

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