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#Congress का दायित्व धर्मनिरपेक्षता की हिफाजत है न कि परम हिंदुत्व का रास्ता

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Faisal Anurag

मोदी रिजिम के सौ दिनों को देश के जानेमाने थिंकर प्रताप भमु मेहता ने सर्वसत्ता का प्रदर्शन,  नेशनलिस्ट जोश और सोशल कंट्रोल की संज्ञा दी है. वास्तव में ऐसे दौर में जो सर्वसत्ता और वर्चस्ववादी रुझान के साथ लोकतंत्र में विपक्ष पर निरंतर हमलावर है, और उसे डिमोनाइज करने का हर तरह से प्रयास कर रहा है, उसके समर्थन में बोलने की प्रवृति चरम पर है.

इसका परिणाम यह है कि विपक्ष अपने कोर मुद्दों पर भी बात करने से परहेज कर रहा है. कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने इस संदर्भ को उठाते हुए बहस को गति दी है. उन्होंने कहा है कि कांग्रेस का दायित्व धर्मनिरपेक्षता की हिफाजत है न कि परम हिंदुत्व का रास्ता.

इस बहस में उन्होंने हिंदू धर्म की उदारता की भी चर्चा की है. और हिंदुत्व के रास्ते को उसके खिलाफ बताया है. उनकी नई किताब इसी हिंदू फेनोनिमा के सवाल पर है, जो बाजार में अभी-अभी आयी है.

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लोकसभा के चुनाव के दौरान कांग्रेस की दिशा को ले कर बहसें तेज हुर्ह थीं. लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों ने नरम रास्ता पकड़ना तय किया था. कांग्रेस के भीतर और उसके समर्थकों के बीच इस रास्ते को ले कर नारजगी थी. कांग्रेस ने लंबे समय तय धर्मनिरपेक्षता के पक्ष को बुलंदी से उठाया है. लेकिन पिछले कुछ दशकों में उसने अपनी इस भूमिका को संजीदगी के साथ कमजोर ही किया है.

भारतीय जनता पार्टी के उभार के दौर में कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता आया है कि उसे भी अपनी धर्मनिरपेक्षता की लाइन ही उनकी हार का कारण बनता रहा है. भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस सुनियोजित तरीके से सेकुलरवाद को मुस्लिमपरस्त साबित करती आ रही है. और 90 के दशक में उसने छद्म धर्मनिरपेक्षता का शगूफा छोड़ कर इस पूरी अवधारणा को कमजोर करने में अपनी रणनीतिक कामयाबी हासिल की है.

भारत की आजादी की लड़ाई में सेकुलरवाद एक प्रभावी धारा रही है. बावजूद भारत की वह त्रासदी नहीं रोकी जा सकी जो एक खूनी विभाजन बन कर उभरी. इसका दंश इतना गहरा है कि आज तक की भारतीय राजनीति और समाज उससे मुक्त नहीं हो सके हैं. इतिहास की इस परिघटना के अस्तित्व को स्वीकार करने में भारत की नाकामयाबी का ही कारण वह अलगावबोध है जो भारत में अनेक समस्याओं की जड़ में क्रियाशील है.

बावजूद इसके कांग्रेस ने लंबे समय तक आजादी की विरासत के अनुकूल भारत के निर्माण की अपनी भूमिका का निर्वाह किया है. जिसमें अकलियतों के लिए बराबर के अवसर और अधिकार की गारंटी रही है. भारत के संविधान का आर्टिकल 29 और 30 इस अधिकार को गारंटी भी प्रदान करता है.

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राजीव गांधी के जमाने में ही कांग्रेस अपने अनेक मूलभूत विचारों से अलग होने लगी थी, जिसे नरसिम्हराव के जामाने में गति मिली. नेहरू के सामाजिक आर्थिक नजरिये को केवल चर्चा में रखते हुए कांग्रेस की पूरी दिशा को ही बदल दिया गया. इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस तेजी से अपने सामाजिक आधारों के बीच ताकत खोने लगी और वह देश में एजेंडा सेट करने के बजाय भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे और आरोपों का बचाव करती दिखने लगी.

इस हालत से उबारने का दायित्व नेतृत्व को ही था. जो स्वयं कांग्रेस की वैचारिकता  के प्रति ज्यादा सजग नहीं था. 2014 की हार यह बताने के लिए काफी थी कि कांग्रेस की बदली हुई लाइन भारत के वोटरों के लिए आकर्षण का कारण नहीं रही गयी है. 2019 ने इसे ओर भी मजबूती से उजागर कर दिया है.

यदि कांगेस के कुछ नेता विचारों से प्रस्थान को ले कर सजग नहीं हैं तो इससे जाहिर होता है कि पार्टी अभी भी इन सवालों पर गंभीरता से विचार नहीं कर रही है. और कांग्रेस के रणनीतिकार न तो किसी पुराने और न ही किसी नये  विचारों को पार्टी की दीवार लांघने दे रहे हैं. कांग्रेस पर काबिज हुए जमीनविहीन नेताओं के वर्चस्व के कारण ही यह हो रहा है. राहुल गांधी ने इसमें दरार डालने की कोशिश जरूर की. लेकिन उन्हें भी जड़ नेताओं ने कब्जे में ले लिया और राहुल गांधी को पार्टी नेतृत्व से अलग होना पड़ा.

हालांकि राहुल गांधी के बारे में धारणा है कि वे कांग्रेस के इस संकट के प्रति सचेत हैं और यही मठाधीश कांग्रेसियों को पसंद नहीं है. पीढियों के इस टकराव से बाहर निकल कर ही कांग्रेस के भविष्य का रास्ता बनता है और इस रास्ते पर उसे अपने इतिहास की जमीन पर भविष्य के लिए खड़ा होने की चुनौती है. शशि थरूर ने वैचारिक  सवाल उठा कर बहस को गति प्रदान किया है. हालांकि कांग्रेस के खत्म होने की बातें खारिज हो सकती हैं बशर्तें कांग्रेस अपने सही रास्ते पर चलने का संकल्प ले.

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