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सरना कोड पर धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने कहा- कब तक आदिवासी अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखे जायेंगे

Ranchi : 2021 में जनगणना होनी है. इसके लिए प्रक्रिया भी चल रही है. अभी तक आदिवासियों को उनका अलग कोड नहीं मिल पाया है. जबकि सरना कोड की मांग लंबे समय से चल रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि हम आदिवासी कब तक अपने मौलिक अधिकारों से वंचित रखे जायेंगे. ये बातें धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने न्यूज विंग से बातचीत में कहीं. उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लेख है पर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आदिवासियों को उनके धार्मिक अधिकारों से वंचित करने की कोशिश की जा रही है. ऐसा करना घोर अन्याय और पक्षपात है.

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हमारी संस्कृति को सरना के नाम से स्वीकार किया गया है

बंधन तिग्गा ने कहा कि भारत के आदिवासी प्रकृति के पूजक हैं. हम प्रकृति में विश्वास करते हैं. इस पूजा पद्धति एवं संस्कृति को सरना धर्म के नाम से स्वीकार एवं प्रचलित किया गया है. प्रकृति पूजा में हम सूरज, चांद, धरती, पर्वत, नदी, पेड़-पौधे, जीव-जंतु आदि की आराधना करते हैं, क्योंकि इनसे जीवन शक्ति प्राप्त होती है. इस प्रकार आदिवासी जीवन पद्धति प्रकृति और पर्यावरण के संतुलन की एक अनोखी प्रणाली भी है.

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कम जनसंख्या वाले पंथ को कोड मिल सकता है तो हमें क्यों नहीं?

उन्होंने कहा कि हम आदिवासी हैं, क्योंकि प्रकृति पूजा व संस्कृति से जुड़े हैं. अत: हम न हिंदू हैं और न ही ईसाई. हमारे बीच वर्ण व्यवस्था, दहेज प्रथा, ऊंच-नीच आदि संस्कार नहीं हैं. दूसरे धर्मों के साथ जुड़ना हमारे स्वभाव और संस्कृति के खिलाफ है. जब इस देश में जैन और बौद्ध को कम जनसंख्या में रहते हुए भी कोड मिल सकता है तब करोड़ों की जनसंख्यावाले सरना को धर्मकोड क्यों नहीं मिल सकता?  क्या यह पक्षपातपूर्ण नहीं है. क्या सरकार हमें भी जबरन हिंदू, मुसलिम, ईसाई आदि बनने पर मजबूर करना चाहती है?

इधर झारखंड के कुछ आदिवासी संगठन सरना धर्म से अलग आदि धर्म या आदिवासी धर्म की मांग कर रहे हैं. पर ऐसा कर वे समाज को भ्रम में डाल रहे हैं. हमारा आंदोलन सरना कोड के लिए है और इसके लिए प्रयास जारी रहेगा.

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